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दोस्तों मेरा नाम पिंकी भारती है, मैं jankaritoday.com की Admin हूं।

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हमने ( जानकारी टुडे परिवार ने) एक बात महसूस किया है कि जो जातियां दलित और पिछड़ी मानी जाती है, वो हमेशा से ऐसे नही थे। उनका इतिहास गौरवशाली रहा है, अपने सही इतिहास नहीं जानने के कारण हम वर्तमान स्थिति को ही असली समझ लेते हैं। कहते हैं एक बड़ी इमारत मजबूत नींव पर ही खड़ी की जा सकती है। तो क्या वजह है कि समृद्ध पूर्वज के होते हुए भी आज हम गरीब लाचार और कमजोर हो गए। जातिगत व्यवस्था में  नीचे रखकर हमें शूद्र नाम दे दिया गया। हो सकता है हमारी भी कुछ कमजोरी रही हो, मातृभूमि से प्रेम करने वाले हमने अपना सबकुछ खोकर भी अपने खून पसीने से अपने धरती का मान बनाए रखा। धन दौलत , ऐशो आराम का महत्व न देकर हमने देश सेवा और मातृ सेवा को ही अपना प्रथम कर्तव्य समझा। शायद इसी वजह से हम पीछे रह गए हो। अब समय आ गया है कि जब हम अपने असली इतिहास को समझें और अपनी मेहनत से कुछ ऐसा करें कि हमारा देश हमें मिल जाए।

चेरो राजवंश एक ऐसी राजव्यवस्था थी जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी क्षेत्रों पर शासन किया, जो वर्तमान भारतीय राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड के अनुरूप है; उनका शासन 12वीं शताब्दी सीई से 19वीं शताब्दी सीई तक चला। चेरो समुदाय मूल रूप से कई आदिवासी समुदायों, जैसे भर, पासी और कोल आदि का समूह है। चेरों राजाओं ने मुगलो, राजपूतों और ब्रिटिश सरकारों को सामने घुटने नहीं टेके उन्हें नाको तले चने चबाने’ पर मजबूर कर दिया। आज जिस हथुआ स्टेट और गिद्धौर की समृद्धिता की बात की जाती है वह कभी पासवानों के अधीन थी। यादव, कुशवाहा और कुर्मी जातियों ने भारत-गंगा के मैदान की उपजाऊ मिट्टी को जोत दिया था और वे अपनी मेहनती प्रकृति और खेती के कौशल के लिए से अन्न पूजा कर मानव जाति का पेट भरती रही और हमारा देश विकसित होते गया।
यादव 60 वर्ष की आयु से पहले नहीं बुद्धि प्राप्त करते हैं”, चुटकुलों द्वारा सवर्ण जातियों ने उन्हे देहाती बेवकूफ लोगों के रूप में चित्रित किया। भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे नायक थे, जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया।1770 से सन 1800 ई0 तक अग्रंजों के विरुद्ध नोनिया विद्रोह हुआ था जिसका
इतिहास साक्षी है। इस विद्रोह में अगर दूसरे जातियों के लोगों ने भी साथ दिया होता तो हमें ब्रिटिश गुलामी का दंश नहीं झेलना पड़ता। स्वाभिमानी मूलनिवासी दलित और पिछड़ी जातियों ने  अपने मातृभूमि को विदेशी आक्रांताओं से बचाने का पूरा प्रयास किया।
लेकिन लेकिन भारतीय समाज के कुछ संपन्न लोगों ने क्रूर मुगल, ब्रिटिश शासकों के साथ मिलकर देश को गुलामी के अंधेरे में झोंक दिया। मुसलमान और ब्रिटिश शासकों के तलवे चाट कर यह लोग प्रकार प्राकृतिक संसाधनों को हथिया लिया और देश के असली मालिक दलितों और ओबीसी को भूमिहीन बना दिया। भोजन वस्त्र, आवास जैसे जरूरत की चीजें भी दलितों के लिए दुर्लभ कर दिये गये। अभावग्रस्त ओबीसी और दलित जब शैक्षणिक स्तर पर आगे नहीं बढ पाए तो उन्हें कम दिमाग होने का ठप्पा लगा दिया गया। ऐसा नहीं है कि हमारे पूर्वजों ने हमारे उत्थान के लिए प्रयास नहीं किया साहित्य, आंदोलनों, राजनीति से इन्होंने हमारी पहचान देने का प्रयास सैकड़ो सालो से करते आ रहे है। समस्या यह रही कि ऐसे लोगों की संख्या कम है जिससे हम अभी भी अपने असली इतिहास को सही से समझ नहीं पाए हैं। jankaritoday.com सभी जातियों, समुदायों और इतिहास में गुम हुए महान लोगों को इतिहास आगे लाने का प्रयास कर कर रही है। निवेदन है कि कृपया आप भी हमारे साथ आएं और तन, मन, धन से हमारा सहयोग करें।

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रंजीत कुमार भारतीय (MBA) चीफ एडिटर और लेखक

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