Sarvan Kumar 21/09/2018

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Last Updated on 27/08/2020 by Sarvan Kumar

पं.दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर, 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में नगला चन्द्रभान ग्राम में एक सामान्य परिवार में हुआ था.उनके पिता का नाम भगवतीप्रसाद उपाध्याय था.वो ज्योतिषी थे और रेलवे में सहायक स्टेशन मास्टर थे.उनके माता का नाम राम प्यारी था जो काफी धार्मिक महिला थीं.

बचपन से ही शुरू हुआ ट्रेजेडी का सिलसिला

जब उनकी उम्र केवल तीन साल की थी उनके पिता की असामयिक मृत्यु हो गयी. 4 वर्ष पश्चात क्षय रोग के (T.B) के कारण उनके माता की भी मृत्यु हो गयी. इस दुःख भरी स्थिति में बालक दीनदयाल को उनके नाना चुन्नी लाल ने संभाला. उनके नाना ने रेलवे की नौकरी छोड़ के उनकी देखभाल करने की कोशिश की पर दुर्भाग्यवश जब दीनदयाल 9 साल के थे उनके नाना भी चल बसे. अब सारी जिम्मेदारी उनके मामा राधारमण पर आ गयी. दुःख का सिलसिला यहाँ रुका नहीं और उनके छोटे भाई शिवदयाल का भी टाइफाइड से मृत्यु हो गयी.

पं. दीनदयाल उपाध्याय एजुकेशन

बचपन में ही माता-पिता और नाना के मौत के कारण उनकी पढाई सही ढंग से नहीं हो पायी. जैसे-तैसे उन्होंने गंगापुर से आंठवी और नवमी की परीक्षा पास की. मैट्रिक की परीक्षा उन्होंने सीकर से पास किया. 1935 में राजस्थान के पिलानी से उन्होंने इंटरमीडिएट परीक्षा पास की और प्रथम स्थान पर रहे. 1939 में कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से उन्होंने B.A की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास किया.
आगरा के सेंट जोन्स कॉलेज में उन्होंने M.A (English) में एडमिशन लिया और पहले साल प्रथम श्रेणी से पास किया. दुर्भाग्यवश दूसरे साल नहीं पढ़ पाए. इसका कारण था उनके ममेरी बहन का बीमार पड़ जाना और संघ के कामो में व्यस्त होना.

प्रशासनिक सेवा को लात मार दिया

अपने मौसी के आग्रह पर उन्होंने सिविल सर्विसेज के लिए अप्लाई किया. लिखित परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वो इंटरव्यू के लिए चुन लिए गए. वे इस परीक्षा की परिणाम सूचि में प्रथम स्थान पर रहे.उन्होंने इस नौकरी को लात मार दिया और पूरी तरह से समाज सेवा में आ गए.

मेधावी होने के कारण मिली थी उनको छात्रवृत्ति

हर परीक्षा में अव्वल आने के कारण उनको दो छात्रवृत्ति भी मिली जिससे उनकी पढ़ाई सहज रूप से हो पाया.
1.सीकर के महाराजा कल्याण सिंह ने मैट्रिक परीक्षा में प्रथम आने से प्रसन्न होकर 250 रूपया नकद, स्वर्ण पदक और 10 रुपये मासिक  छात्रवृत्ति प्रदान किया था.
2. उद्योगपति घनश्याम दास बिरला ने मेधावी होने के कारण 250 रुपये,1 स्वर्ण पदक और छात्रवृत्ति प्रदान की.

संघ से कैसे जुड़े दीन दयाल पं. दीनदयाल उपाध्याय

1939 में जब वे कानपुर में  B.A की पढ़ाई कर रहे थे तब छात्रावास में उनकी मुलाकात बलवंत महाशब्दे तथा सुंदरसिंह भंडारी से हुई. बलवंत महाशब्दे के प्रयास से ही वो संघ की ओर आकर्षित हुए. 1939 में ही जब वो आगरा में M.A पढ़ने आये तो उनकी मुलाकात नानाजी देशमुख के साथ हुयी और उनके साथ मिलकर संघ के काम करने लगे.1942 में उन्हे संघ प्रचार के लिए लखीमपुर (उत्तर प्रदेश) में नियुक्त किया गया.1945 में वे उत्तर प्रदेश के सह प्रांत प्रचारक बन गये.

संघ के लिए योगदान

1. 1948 में महात्मा गाँधी नाथूराम गोडसे के हाथो मारे गए. नाथूराम गोडसे का संघ से जुड़े होने के कारण गाँधी के मौत का जिम्मेदार आरएसएस पर ठहरा दिया गया और आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इसके विरोध में पंडित दीन दयाल के नेतृत्व में पुरे देश में आंदोलन चलाया गया.
2. 21 अक्टूबर 1951 को जब भारतीय जन संघ (आज की भारतीय जनता पार्टी) की स्थापना हुई तो पंडित दीन दयाल का अहम् रोल था.
3.अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने के लिए उन्होंने तीन पत्रिकाएं निकालीं जिसमे ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक, ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक तथा ‘स्वदेश’  दैनिक थे.

भारतीय जन संघ  में पं. दीनदयाल उपाध्याय  का योगदान

1.1951 में प्रथम लोकसभा चुनाव में दीनदयालजी को उत्तरप्रदेश का कमान दिया गया. इस आम चुनाव में केवल डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी तथा दो और लोग चुने गए.

भारतीय जनससंघ की जिम्मेदारी ली 

2.डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के आकस्मिक मृत्यु के बाद सिर्फ 36 साल के उम्र में भारतीय जनससंघ की पूरी जिम्मेदारी दीन दयाल के कंधो पर आ गए. इस जिम्मेदारी को दीन दयाल उपाध्याय ने पूरी निष्ठा से निभाया. पुरे देश में घूम-घूम कर, रात दिन 1 कर लाखों को कार्यकर्ता बनाया. उनके अथक प्रयास से ही आज BJP वट वृक्ष का  रूप लिया है. इसीलिए तो  दीनदयाल को बीजेपी का गाँधी माना जाता है. आज लोगो को आरएसएस के स्वंत्रता आंदोलन में योगदान पर भले ही कोई शक हो पर बीजेपी दीनदयाल को महात्मा गांधी के ही समान्तर मानती है.
3.1953-1968 तक भारतीय जन संघ के महामंत्री पद में रहते हुए उन्होंने पार्टी को काफी मजबूती प्रदान की.
4.ग्वालियर में 11 अगस्त से 15 अगस्त 1964 तक चली जनसंघ की प्रतिनिधि सभा में जन संघ के सिद्धांतो का अंतिम रूप दिया गया था जिसे दीनदयाल ने स्वयं तैयार किया था.
5.दिसम्बर 1967 के कालिकट अधिवेशन में पंडित दीनदयालजी उपाध्याय भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष पद के लिए चुन लिए गए.

पं. दीनदयाल उपाध्याय डेथ मिस्ट्री

फरवरी 11, 1968 को मुगलसराय स्टेशन (अब पंडित दीनदयाल स्टेशन) से 150 गज की दूरी पर इलेक्ट्रिक पोल 1276 के पास उनकी लाश पायी गयी. पं.दीनदयाल उपाध्याय की डेथ मिस्ट्री अभी तक सुलझ नहीं पायी हालाँकि सरकार ने इसे एक रेलवे चोरी के दौरान हुई मौत बताती है.

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