Ranjeet Bhartiya 23/03/2022
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Last Updated on 23/03/2022 by Sarvan Kumar

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गांवों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. मुख्यधारा के इतिहासकारों द्वारा नजरअंदाज किए जाने के कारण ऐसे कई गांव हैं जिनका जिक्र इतिहास के किताबों में नहीं मिलता. इसके कारण हम में से अधिकांश लोग ऐसे कई गांवों के ऐतिहासिक महत्व से अनजान हैं. इस क्रम में जानते हैं बघेलखंड में स्थित पिंडरा गांव की कहानी जिसका अपना ही एक अलग इतिहास है. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मातृभूमि की आजादी के लिए पिंडरा गांव के लगभग 150 ग्रामीण अंग्रेजो के खिलाफ वीरता पूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गए थे.

शहीद ग्राम –  पिंडरा गांव

पिंडरा मध्यप्रदेश के सतना जिले के मझगवां तहसील में स्थित एक गांव है. यह सतना जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर दूरी पर स्थित है. इस गांव को शहीद ग्राम का दर्जा प्राप्त है. वर्तमान में इस गांव की आबादी बढ़कर लगभग 10,000 हो गई है. यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि इस गांव में निवास करने वाले अधिकांश लोग शहीदों की पीढ़ी हैं. गांव में शायद ही ऐसा कोई घर होगा जिसके पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया हो.

अंग्रेजों ने गांव में लगा दी थी आग

इस गांव की पावन मिट्टी आज भी अपने भीतर अतीत के गौरवशाली इतिहास को समेटे हुई है. इस गांव के लोग बताते हैं कि आज भी अगर पिंडरा गांव में घर बनाने और अन्य निर्माण कार्य के लिए नींव खोदी जाती है तो तीन चार-फीट नीचे कोदो के भूसी की राख मिलती है, जो अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी कहती है. 1857 में पिंडरा गांव की जनसंख्या लगभग 4,000 थी. यह गांव तत्कालीन बरौंधा राज्य के अंतर्गत आता था. तब पिंडरा गांव 300-400 घर हुआ करते थे. इसमें से 150 घर बहेलिया जाति के लोगों के थे, जो स्वभाव से काफी बहादुर और दुस्साहसी थे. गांव में क्रांतिकारियों को युद्ध कला सिखाने और क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए गुरुकुल चलाया जाता था, जहां बहेलियों समेत गांव के अन्य लोग भी ट्रेनिंग लेते थे. ग्रामीणों की माने तो जब इस बात की खबर अंग्रेजों को लगी तो उन्होंने मामले की पड़ताल करने के लिए अपने सैनिकों को यहां भेजा. दुस्साहसी बहेलियों ने अंग्रेज सैनिकों में से 3 को इमली के पेड़ में लटकाकर कील ठोक दिया. इससे अंग्रेज आग बबूला हो गए. यह खबर भी पुख्ता हो चुकी थी कि गांव में आजादी के लड़ाको को प्रशिक्षण दिया जाता है. फिर अंग्रेजों ने गांव में आग लगा दिया. कहा जाता है कि उस समय अंग्रेजों ने पिंडरा गांव को तीन बार चलाया था.

इस गांव के 150 लोगों ने दिया मातृभूमि के लिए बलिदान

जब 1857 में मंगल पांडे ने मेरठ में आजादी के लिए विद्रोह कर दिया तो क्रांति की चिंगारी जंगल में आग की तरह चारों तरफ फैलने लगी. इसका व्यापक असर पिंडरा गांव पर भी पड़ा. ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, 1857 में मनकहरी के ठाकुर रणमत सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने के लिए क्रांतिकारी बाबू वीर कुंवर सिंह और उनके छोटे भाई बाबू अमर सिंह को बिहार से बुलाया था. वो अपनी पूरी तैयारी के साथ पिंडरा गांव आए. उनके आने से पिंडरा गांव के लोगों में आजादी के लिए नई जागृति पैदा हुई. उन्होंने नए जोश और जुनून के साथ मातृभूमि को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिए संकल्प लिया. अमर सिंह के नेतृत्व में ग्रामीणों को छापामार युद्ध में प्रशिक्षित किया गया और उन्हें युद्ध की रणनीतियों के बारे में बताया गया. गांव में क्रांतिकारी दल का गठन किया गया. पिंडरा के भरत कुंवर अमर बहादुर सिंह और ठाकुर रणमत सिंह की अगुवाई में ग्रामीणों ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया. लेकिन जब लड़ाई शुरू हुई तो कम प्रशिक्षित और न्यूनतम हथियारों के साथ लड़ रहे ग्रामीण पूरी तरह से प्रशिक्षित और हथियारों से लैस अंग्रेेजो से ज्यादा देर तक मुकाबला नहीं कर पाए. अंग्रेजों ने चारों तरफ से गांव को घेर लिया. फिर अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए ग्रामीणों ने पायस्विनी नदी को पार करके अंग्रेजों पर जोरदार हमला किया. इस हमले में कई अंग्रेज सैनिक मारे गए और उस दिन ग्रामीणों की जीत हुई. अंग्रेजी सेना सकते में आ गई और ग्रामीणों का नरसंहार करना शुरू कर दिया. कई लोगों को जिंदा पकड़़ा गया और उन्हें यातनाएं देकर मौत के घाट उतार दिया गया. अंग्रेजों के इस अमानवीय हरकत से क्रांतिकारी दल में आक्रोश फैल गया और उन्होंने छापामार हमले को और तेज कर दिया. अंग्रेजों के लिए स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई. क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए इलाहाबाद से सेना की एक टुकड़ी बुलाकर गांव पर भीषण गोलीबारी की गई जिसमें अनगिनत स्त्री, पुरुष और बच्चे मारे गए. इस लड़ाई में 135 शहीदों के नाम ही खोजे जा सके हैं, जबकि अन्य बलिदानियों के नाम आज आज भी गुमनामी के अंधेरे में दफन हैं. हालाँकि, एक लंबी लड़ाई के बाद, अंत में जीत ग्रामीणों की हुई.

पिंडरावासियों की शौर्य गाथा का उल्लेख

इस छापामार युद्ध में पिंडरावासियों से मिली शर्मनाक हार के कारण जनरल लुगार्ड को काफी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा‌ और वह त्यागपत्र देखकर लंदन भाग गया. पिंडरावासियों की शौर्य गाथा अंतरराष्ट्रीय अखबारों में भी छपी. The New York Times ने 1 अक्टूबर 1858 के अंक में ‘भारत में विद्रोह’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था. इस लेख में पिंडरा गांव के लोगों के युद्ध कौशल और बहादुरी की प्रशंसा की गई थी. लेख में जिक्र किया गया था कि विद्रोह के समय सभी ग्रामीणों के घरों को अंग्रेजों द्वारा जला दिया गया था.

पिंडरावासियों के शहीदों के नाम

पिंडरा गांव के पास चित्रकूट सतना जाने वाली प्रमुख सड़क के चौराहे पर एक स्मारक बनाया गया है. गांव के प्रवेश द्वार पर बने इस कीर्ति स्तंभ पर ऐतिहासिक घटना के उल्लेख के साथ देश की आजादी की लड़ाई में भाग लेने वाले 135 शहीदों के नाम अंकित हैं. शहीद स्मारक पर अंकित कुछ शहीदों के नाम इस प्रकार हैं-ठाकुर रणमत सिंह, सिंह,‌भारत कुंवर बहादुर सिंह, पं अयोध्या प्रसाद, बाबू राम बहेलिया, धाकर बहेलिया, शंकर सोनी, बुद्धि काक्षी, कुंज बाबू रामककल्ला नाई, जदली भूमिहार, गंधर्व सिंह, भादवा कोल, कटाहा ढीमर, कल्लू बहेलिया, रंजीत पिंडारी, हनुमान प्रसाद भूमिहार, आदि.


References;

https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/chitrakoot/109-villagers-of-pidra-village-were-martyred-for-the-country-s-independence-chitrakutt-news-knp5406652101

https://zeenews.india.com/hindi/india/bihar-jharkhand/people-of-pindra-of-mp-gave-tough-fight-to-britishers-in-1857-revolt/562601

https://www.dnaindia.com/india/report-india-s-independence-struggle-built-on-the-backs-of-forgotten-bravehearts-2781905

https://www.gaonconnection.com/madhya-pradesh/majan-pindara-baghelkhand-madhya-pradesh-freedom-fighters-50344

https://www.patrika.com/satna-news/jallianwala-bagh-massacre-in-satna-district-of-madhya-pradesh-4973589/

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