Ranjeet Bhartiya 12/06/2022
माता रानी ये वरदान देना,बस थोड़ा सा प्यार देना,आपकी चरणों में बीते जीवन सारा ऐसा आशीर्वाद देना। आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं। नव दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री देवी का है। ये माता पार्वती का ही एक रूप हैं हिमालयराज की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मां के शैलपुत्री रूप का पूजन होता है. Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 12/06/2022 by Sarvan Kumar

आमेर रियासत का संबंध कछवाहा राजवंश से है.
आमेर/जयपुर इंडिया कंपनी के शासन के दौरान और उसके बाद ब्रिटिश राज के तहत भारत में एक प्रसिद्ध रियासत थी. कछवाहा राजवंश की स्थापना दूल्हे राय (तेजकरण) ने 1137 ई. में किया था. कछवाहा वंश में अनेक प्रसिद्ध शासक हुए. स्वतंत्रता के बाद जयपुर रियासत भारत में शामिल हो गया और 1949 तक इसका भारत के साथ एकीकरण हो गया. लेकिन क्या आप जानते हैं आमेर के कछवाहा वंश का अंतिम शासक कौन थे? आइए जानते हैं आमेर (जयपुर) के कछवाहा वंश का अंतिम शासक के बारे में-

आमेर के कछवाहा वंश का अंतिम शासक

Sawai Man Singh II in early age.
Photo: Wikimedia Commons

सवाई मान सिंह द्वितीय (21 अगस्त 1912– 24 जून 1970) आमेर (जयपुर) के कछवाहा वंश के अंतिम शासक थे. उन्होंने 1922 से लेकर रियासत के भारत में विलय (1949) तक शासन किया. महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय एक दूरदर्शी शासक थे. जयपुर को राजस्थान के राजधानी के रूप में चुने जाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. अपनी सत्तारूढ़ शक्तियों को प्राप्त करने के बाद, उन्होंने जयपुर के आधुनिकीकरण, बुनियादी ढांचे का निर्माण और कई सार्वजनिक संस्थानों की स्थापना की. इसी के परिणामस्वरूप, जयपुर को राजस्थान की राजधानी चुना गया. 1947 में स्वतंत्रता के समय, महाराजा मानसिंह द्वितीय ने जयपुर रियासत को भारत में विलय करने के लिए काफी वक्त लिया. अंत में उन्होंने अप्रैल 1949 में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किया, जिसके बाद जयपुर रियासत राजस्थान राज्य संघ की हिस्सा बना. वह विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने वाले अंतिम भारतीय महाराजा थे. इतना ही नहीं, शुरू में उन्होंने आंतरिक सरकार की अपनी शक्तियों को बरकरार रखा. महाराजा 7 अप्रैल 1949 से अक्टूबर 1956 तक राजस्थान के स्टेट्स यूनियन के राजप्रमुख रहे. लेकिन 1956 में जब भारतीय राज्यों को फिर से संगठित किया गया तो राजप्रमुख के कार्यालय को समाप्त कर दिया गया. भारत के साथ एकीकरण होने पर, शासक को भारत सरकार द्वारा एक पेंशन (प्रिवी पर्स), कुछ विशेषाधिकार और जयपुर के महाराजा की उपाधि का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी. हालांकि इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान 1971 में संविधान में 26वें संशोधन द्वारा देशी राज्यों के भूतपूर्व नरेशों के विशेषाधिकारों, महाराजा की उपाधि का उपयोग तथा प्रिवीपर्स की सुविधाओं को समाप्त कर दिया गया. महाराजा की मृत्यु 24 जून 1970 को हुई. इस प्रकार से, मान सिंह द्वितीय अपनी मृत्यु तक महाराजा की उपाधि उपयोग करने, प्रिवी पर्स और अन्य विशेषाधिकारों के हकदार बने रहे.

सवाई मान सिंह द्वितीय के द्वारा किया गया सुधार कार्य

राजस्थान को एक पर्यटन एक पर्यटन स्थल (tourism destination) के रूप में विकसित करने में भी महाराजा मान सिंह द्वितीय की महत्वपूर्ण भूमिका है. बात 1958 की है. मानसिंह उन शासकों में से एक थे जिन्होंने राजस्थान में पर्यटन की क्षमता को महसूस किया, और रामबाग पैलेस को एक लक्जरी होटल में तब्दील कर दिया. उनके शासनकाल में सुधारों पर बहुत जोर दिया गया. उनके शासनकाल में भूमि सुधार के विभिन्न कानून सबसे पहले उनके राज्य में पेश किए गए, जैसे कि जयपुर काश्तकारी अधिनियम (Jaipur Tenancy Act). 1962 में उन्हें भारतीय संसद के उच्च सदन राज्य सभा के लिए चुना गया. हालांकि, राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यकाल पूरा होने से पहले हीं, 1965 में, उन्हें भारत सरकार ने स्पेन में भारत के राजदूत (Ambassador to Spain) के रूप में नियुक्त कर दिया. महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. उन्हें, विशेष रूप से, पोलो के एक उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में जाना जाता था. 1957 में उनके नेतृत्व में भारत ने पोलो खेल में विश्व का स्वर्ण कप जीता था.

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