पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनता पार्टी केे संस्थापक सदस्यो में से एक थे. उनके महान विचारों से हमें काफी प्रेरणा मिलती है.
बात तब की है जब दीनदयाल 8-10 साल के रहे होंगे.कुछ चोर उनके घर में घुस आये. बालक दीनदयाल को चोरो ने जमीन पर पटकते हुए कहा -“बता कहाँ है रुपये-पैसे और गहने?” नहीं बताने पर चोरो ने सबको जान से मार डालने की धमकी दी.बालक दीनदयाल नहीं डरे और बड़ी ही विनम्रतापूर्वक कहा-” मैंने तो चोरो के बारे में सुना है की वो गरीबो की रक्षा करते हैं. वे तो अमीर लोगो का पैसा लूटकर गरीबों में बाँट देते हैं.चोर उनके साहसिक बातो से काफी प्रभावित हुए और लौट गए.कुछ लोग इसलिए महान होते हैं की उनके विचार महान होते हैं. पंडित जी का राष्ट्र के बारे में, लोगों के बारे में अनमोल विचार लोगों को सही मार्ग दिखाने में काफी सहायक रहे.
मैट्रिक परीक्षा में अव्वल आने के कारण सीकर के महाराज बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने यंग दीनदयाल से पूछा -“तुम्हे क्या चाहिए?
तो उस पर उन्होंने कहा- “मुझे तो केवल आपका आशीर्वाद चाहिए.”
महाराज काफी प्रसन्न हुए और दीनदयाल जी को 250 रुपये नकद और 10 रूपए की मासिक छात्रवृत्ति प्रदान की.
एक बार उनके मामा क्षय रोग (T.B) के कारण काफी बीमार हो गए. गावं के वैध ने कहा इन्हे इलाज के लिए लखनऊ ले जाना होगा पर कोई भी रिश्तेदार इसके लिए तैयार नहीं हुआ. क्योंकि T.B काफी संक्रामक रोग होता है. ऐसे में दीनदयाल अपने मामा को लखनऊ ले गए और काफी सेवा की जिससे उनके मामा की तबीयत में काफी सुधार आया.पंडित जी की उम्र उस समय सिर्फ 11 साल की थी !
उनके प्रतिभा से प्रभावित होकर मशहूर उदयोगपति घनश्याम दास ने उन्हें अपने कंपनी में अच्छी नौकरी का ऑफर दिया पर दीनदयाल जी ने उसे विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया.
प्रशासकीय सेवा के लिए आवेदन निकला और इच्छा नहीं होने के बाद भी वे रिश्तेदारों के कहने पर लिखित परीक्षा में बैठे और इंटरव्यू के लिए चुन लिए गए. इंटरव्यू में सूट पहनना अनिवार्य था पर पैसे के अभाव में वे सही समय पर सूट नहीं सिलवा सके. ऐसे में वो धोती कुरता पहनकर इंटरव्यू देने चले गए. बाकि उम्मीदवारों ने उनके इस ड्रेस के कारण मजाक उड़ाया और कहा -“देखो पंडित आया हैं इंटरव्यू देने!” यहीं से उनके नाम में पंडित जुड़ गया. आश्चर्य की बात ये रही की जब अंतिम रिजल्ट आया तो दीनदयाल प्रथम थे. दीनदयाल जी समाज सेवा के लिए समर्पित थे सरकारी नौकरी को लात मार दी.
वे कुछ पत्रिकाओं के संपादक भी थे. एक बार पत्रिका पहुँचाने वाला नहीं आया तो वो खुद ही साइकिल से पत्रिका पहुँचाने स्टेशन पहुंच गए. उनका कहना था कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता हैं.
आज कुछ पैसे हो जाने पर लोग विलासिता की जिंदगी जीने लगते हैं. महंगी से महंगी जगह खाना चाहते हैं, महंगी ड्रेस पहनना शुरू कर देते हैं पर दीनदयाल जी का जीवन सादगीपूर्ण था. जब उन्हें बाल कटवाना होता था तो वे महंगी सैलून में ने जाकर गुम्मा सैलून में जाते थे.
सड़क किनारे ईंटो पर बैठ कर आपने लोगों को बाल कटवाते जरूर देखा होगा इसी को गुम्मा सैलून कहते हैं.
एक बार वे काशी से बलिया जा रहे थे. गाड़ी में कोई सीट नहीं खाली थी. ऐसे में उनके प्रसंसक ने प्रथम श्रेणी में जगह दिला दी. दीनदयाल ने टिकट कलेक्टर को प्रथम श्रेणी के पूरे पैसे दंड के साथ देने चाहे पर टिकट कलेक्टर ने पैसा लेने से मना कर दिया. दीनदयाल जी ने उन्हें जबरदस्ती पैसे थमा दिये.
ऐसे कई सारे रोचक तथ्य दीनदयाल जी के बारे में भरे पड़े है. अफ़सोस की बात हैं की पंडित जी की असामयिक मृत्यु हो गयी और समाज उनके और भी अनमोल विचार से से वंचित रह गया.
आज भी पंडित जी की डेथ एक मिस्ट्री बन के रह गयी हैं
Last updated: 29/08/2020 8:41 am
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