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अघरिया भारत में पाई जाने वाली एक हिंदू जाति है. इन्हें कुशल कृषक माना जाता है. लेकिन बदलते वक्त के साथ केवल कृषि पर निर्भर नहीं रह कर यह लोग अन्य पेशे को भी अपनाने लगे हैं. इनकी नई पीढ़ी शिक्षा की ओर अग्रसर होकर प्रशासनिक सेवा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षा, न्यायिक सेवा, शोध, राजनीति, खेल, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं तथा प्रगतिशील सोच के साथ विकास की राह पर तीव्रता से अग्रसर है. स्वभाव से स्वाभिमानी अघरिया सोमवंशी राजपूत होने का दावा करते हैं. किसी के आगे सर झुकाना इनको पसंद नहीं है.इस समुदाय के लोग शारीरिक रूप से सुंदर, आकर्षक और मजबूत होते हैं. स्वभाव से यह उदारवादी, रचनात्मक, कर्मठ और मानवतावादी होते हैं. आइए जानते हैं अघरिया जाति का इतिहास, अघरिया शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
यह मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिमी उड़ीसा तथा छोटा नागपुर क्षेत्र में निवास करते हैं.
यह हिंदू धर्म को मानते हैं. अघरियों के कुलदेवता दूल्हा देव है, जो हर घर में मौजूद हैं. गायों के प्रति इनकी बहुत श्रद्धा है. शादी-विवाह और धार्मिक अनुष्ठान वैदिक रीति रिवाज से ब्राह्मणों द्वारा संपन्न कराए जाते हैं.
कहा जाता है कि इस जाति 84 गोत्र हैं, जिसमें से 60 पटेल, 18 नायक और 6 चौधरी की उपाधि धारण करते हैं. पटेल, चौधरी और नायक इनके प्रमुख उपनाम हैं.
इनके पूर्वज मूल रूप से आगरा के रहने वाले थे, जो ऐतिहासिक कारणों से विस्थापित होकर अन्य स्थानों पर बस गए. इस जाति का नाम इनके मूल स्थान निवास स्थान आगरा के नाम पर “अघरिया” पड़ा.
इनके उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि यह महाभारत के विदुर के दो पुत्रों बैरानु और पुरामने के वंशज हैं. इसीलिए इन्हें विदुर वंशीय क्षत्रिय भी कहा जाता है.विदुर वंशीय होने के कारण इस समुदाय के लोग भगवान श्री कृष्ण को अपना इष्टदेव मानते हैं और उनकी पूजा अर्चना करते हैं.
परंपराओं के अनुसार, इनके पूर्वज राजपूत थे और आगरा के पास रहते थे. वह केवल एक हाथ से और बिना सर झुकाए हुए दिल्ली के राजा को प्रणाम करने के आदी थे. राजा ने काफी लंबे समय तक झेलने के बाद इस अपमान के लिए उन्हें दंडित करने का फैसला किया और सभी अघरियों को अपने सामने पेश होने के लिए बुलाया. जिस दरवाजे से यह लोग राजा के सामने पेश होने वाले थे, उस पर गले की ऊंचाई तक तलवार
बंधवा दी गई. स्वाभिमानी अघरिया अपने सरों को ऊंचा किए दरवाजे पर आए और तलवार नहीं देख पाए. इस तरह से जो भी अघरिया उस दरवाजे से गुजरे, उनका सर कटता चला गया. लेकिन एक अघरिया जिसे दरवाजे पर तलवार बांधे जाने की खबर मिल गई, उसने कुछ अनुष्ठान करने का बहाना करके घर पर रहना ही बेहतर समझा. जब राजा को यह बात पता चली कि एक अघरिया दरबार में पेश नहीं हुआ है तो उसने फिर से बुलावा भेजा. अगरिया को दरबार में पेश होने की इच्छा नहीं थी, लेकिन राजा की आज्ञा का पालन न करना भी असंभव था. ऐसे में उसने अपने स्थान पर गांव के ही एक चमार जाति के व्यक्ति को यह कहते हुए दरबार में जाने के लिए कहा कि मृत्यु के बाद वह राजपूत बन जाएगा और उसे अघोरियों के वंशज हमेशा याद रखेंगे. चमार जाति के व्यक्ति ने अपने स्वामी के लिए स्वयं को बलिदान करने के यह राजी हो गया और राजा के सामने जाने पर दरवाजे पर उसका सिर कलम कर दिया गया. लेकिन इसके बाद अघरिया जाति के लोग, पूरे गांव के साथ, दिल्ली के राजा सिकंदर लोदी और और आदिल शाह के अत्याचार से प्रताड़ित होकर, दक्षिण की ओर भाग गए. फिर वह छत्तीसगढ़ पहुंचे और यहां उन्होंने अघरिया जाति के एक कबीले की स्थापना की. अघरिया जाति के लोग जब अपने पितरों का भोग लगाते हैं तो सबसे पहले उस चमार व्यक्ति के बलिदान के सम्मान में जमीन पर थोड़ा पानी डालते हैं.
एक अन्य मान्यता के अनुसार, अघरिया भागकर उड़ीसा पहुंचे. जहां उन्होंने गजपति राजा से उन्हें शरण देने तथा जीवन यापन को लेकर जगह देने का आग्रह किया. तब राजा ने उनके सामने दो विकल्प रखा, और चुनने को कहा-पहला रजत जड़ित तलवार और दूसरा स्वर्ण जड़ित लकड़ी का डंडा. तब अघरिया परिवार के मुखिया ने स्वर्ण जड़ित लकड़ी के डंडे को चुना. जिसके बाद राजा ने लकड़ी के हल के विकल्प के रूप में उन्हें कृषि कार्य करने का आदेश दिया. तब से इस जाति के लोग जीवन यापन के लिए कृषि का कार्य करते हैं.
Last updated: 13/01/2022 12:20 pm
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