अरख / अर्कवंशी (Arakh / Arakvanshiya) भारत में पाई जाने वाली एक जाति है. ब्रिटिश भारत के मध्य प्रांत के लिए नृवंशविज्ञान के अधीक्षक के रूप में अपनी भूमिका के लिए प्रसिद्ध ब्रिटिश सिविल सेवक रॉबर्ट वेन रसेल (8 अगस्त 1873 – 30 दिसंबर 1915) ने इन्हें मध्य भारत के एक शिकारी जाति के रूप में वर्णित किया है. रसेल के अनुसार, अरख किसानों और श्रमिकों की एक जाति है, जो कई अन्य इलाकों में भी फैली हुई है.आइए जानते हैं अरख समाज का इतिहास, अरख की उत्पति कैसे हुई?
वर्तमान परिस्थिति (कैटेगरी): भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था आरक्षण के अंतर्गत इन्हें उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class, OBC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.
पॉपुलेशन, कहां पाए जाते हैं?: यह मुख्य रूप से मध्य भारत में निवास करते हैं. उत्तर प्रदेश में इनकी अच्छी खासी आबादी है. उत्तराखंड और महाराष्ट्र में भी इनकी उपस्थिति है.
धर्म: अधिकांश अरख / अर्कवंशी सनातन हिंदू धर्म में आस्था रखते हैं और हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं. यह हिंदू त्योहारों जैसे शिवरात्रि, होली, जन्माष्टमी, रक्षाबंधन, दशहरा और दिवाली आदि को बड़े धूमधाम से श्रद्धा पूर्वक मनाते हैं.
अरख/अर्कवंशी समाज उत्पत्ति के बारे में अनेक मान्यताएं हैं जिसके बारे में विस्तार से नीचे बताया गया है. अरख/अर्कवंशी समाज के लोग इस बात का दावा करते हैं कि अर्कवंश भारतीय मूल का एक प्राचीन क्षात्रिय वंश है. अर्कवंश सूर्यवंश का पर्यावाची शब्द है, जिसका प्रयोग प्राचीन काल से ही सूर्यवंशी क्षत्रियों के लिए किया जाता रहा है. अर्कवंशी क्षत्रिय सूर्य को अपना कुलदेवता मानते थे और सूर्य के उपासक थे. कालांतर में अर्कवंशी राजाओं की वंश परम्पराए सूर्यवंश की समानांतर शाखाओं के रूप में विकसित हो गई और इनके वंशज अर्कवंशी क्षत्रिय के नाम से जाने जाने लगे.
1901 की भारत की जनगणना के लिए जनगणना संचालन के अधीक्षक (Superintendent of Census Operations) के रूप में कार्य करने वाले रॉबर्ट वेन रसेल (Robert Vane Russell) ने अपनी किताब “The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Volume II” में अरख जाति की उत्पत्ति के बारे में निम्न बातों का उल्लेख किया है-
1. अरखों को पासी (Pasi) या शिकारियों और चिड़ीमारों
की बहेलिया जाति (Bahelia caste) की एक शाखा माना जाता है.
2. ब्रिटिश प्राच्यविद् (orientalist) और प्रशासनिक अधिकारी विलियम क्रुक (William Crooke) ने अरखों की उत्पत्ति के बारे में दो पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया है. क्रुक के अनुसार, इनकी सभी परंपराएं उन्हें पासियों और भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम से जोड़ती हैं.
3. एक कथा के अनुसार, एक बार जब भगवान परशुराम समुद्र में स्नान कर रहे थे तो उनके पैर में एक जोंक ने काट लिया और उससे खून बहने लगा. भगवान परशुराम ने खून को दो भागों में बांटा; एक भाग से उन्होंने ‘पहले पासी “को बनाया और दूसरे से ”पहले अरख’ को उत्पन्न किया.
4. एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान परशुराम ने पासियों को अपने पसीने से उत्पन्न किया था. एक बार जब भगवान परशुराम दूर थे तो पासियों ने धनुष बाण से कुछ जानवरों की हत्या कर दी. इससे भगवान परशुराम क्रोधित हो गए और उन्होंने पासियों को शाप दिया कि उनके वंशज सूअर पालेंगे. इससे पासियों की सामाजिक स्थिति में पतन हुआ. इसके बाद, भगवान परशुराम ने अपने एक युद्ध में मदद करने के लिए कुछ पासियों को भेजा; परन्तु वे भागकर अरहर के खेत में छिप गए, और इस कारण वे “अरख” कहलाए.
5. किट्स (Kitts) ने अरखों के बारे में लिखा है: “अरख बहेलिया के समान एक जाति हैं. इनका नियमित पेशा पक्षी पकड़ना और शिकार करना है. यह अपने विवाह में हिंदू रीति-रिवाजों का पालन नहीं करते हैं. यह पासी जनजाति की एक शाखा प्रतीत होते हैं, और इन्हें आदिवासियों के एक अर्ध-हिंदू वर्ग के रूप में वर्णित किया गया है.”
महाराष्ट्र के चंद्रपुर ज़िले (भूतपूर्व नाम चांदा ज़िला) में अरख गोंड जनजाति के साथ निकटता से जुड़े हुए हैं, जैसा कि उनकी बहिर्विवाह की प्रणाली से स्पष्ट होता है. यहां यह मतिया, टेकम, टेस्ली, गोदम, मडई, सयाम और चोरलियू कुलों या गोत्रों में विभाजित हैं; जो क्रमशः तीन, चार, पांच, छह, सात, आठ और बारह देवताओं की पूजा करते हैं. जो लोग एक ही संख्या में देवताओं की पूजा करते हैं, वे आपस में विवाह नहीं कर सकते.
देवताओं की अलग-अलग संख्या के अनुसार विभाजन की यह व्यवस्था मध्य प्रांतों में केवल गोंडों और बैगा जैसे एक या दो अन्य जनजातियों के बीच पाई जाती है, जिन्होंने इसे गोंडों से अपनाया है. ऊपर उल्लेख किए गए कुछ नाम भी गोंडी शब्द हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि निस्संदेह हीं चंदा के अरख बड़े पैमाने पर गोंड वंश के हैं.
अर्कवंशी क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंजीनियर आर ए सिंह के दावे के अनुसार, “सन 1370 के लोह गाजर युद्ध में महाराजा साल्हीय सिंह अर्कवंशी के साथ इस समाज के लोगों को सैय्यद मखदूम अलाउद्दीन ने मौत के घाट उतार दिया था. थोड़ी-बहुत संख्या में जो बचे रह गए, वह समाज में अपनी पहचान कायम नहीं रख सके. इस तरह से अर्कवंशी समाज अपने इतिहास से दूर होता चला गया और आज वह अरख जाति के नाम से जाने जाते हैं. आज इस बात की आवश्यकता है कि हम अरख न लिख कर अर्कवंशी क्षत्रिय लिखना चाहिए”.
References;
The Tribes and Castes of the Central Provinces of India (Volume II)
Author: R. V. Russell
https://m.jagran.com/lite/uttar-pradesh/sidharth-nagar-11782110.html
https://arkvanshikshatriya.blogspot.com/2018/04/blog-post_20.html
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arkwanshi kshtriya is oldest kshtriya Raj gharana so pls dont add to pasi cast pls see the kshtriya wanshaward
Yes, Arakvanshiya is belongs to kshtriya Samaj.