बैरवा या बेरवा (Bairwa or Berwa) भारत में पायी जाने वाली एक जाति है. इन्हें राजस्थान का मूल निवासी माना जाता है. रीति रिवाज और परंपराओं में यह मीणा जनजाति के समान है. जीवन यापन के लिए परंपरागत रूप से कृषि, पशुपालन और भवन निर्माण से जुड़े कार्यों पर निर्भर हैं. किसान और पशुपालक होने के कारण इस जाति को एक मेहनतकश जाति माना जाता है. अपेक्षाकृत कम आबादी होने के बावजूद बेरवा एक प्रभावशाली जाति है. उच्च जातियों द्वारा शोषण के खिलाफ यह जाति गरीब और किसानों के सामाजिक अधिकारों के संघर्ष में शामिल रही है. यह शिक्षा को प्रगति का महत्वपूर्ण साधन मानते हैं, इसीलिए यह अपने बच्चों की शिक्षा पर बहुत जोर देते हैं. राजनीति के दृष्टिकोण से भी राजस्थान में इस जाति का व्यापक प्रभाव है. राजस्थान विधानसभा के 75 से ज्यादा सीटों पर यह हार जीत का फैसला करते हैं. अब तक राजस्थान में ऐसा कोई मंत्रिमंडल नहीं हुआ जिसमें बेरवा जाति के तीन-चार मंत्री ना हों. इस समाज के बनवारी लाल बेरवा (19 जनवरी 1933- 22 जुलाई 2009): कांग्रेस पार्टी के नेता, लोकसभा सांसद और राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं.आइये जानते हैैं बैरवा समाज का इतिहास, बैरवा की उत्पति कैैैसे हुई?
भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था आरक्षण के अंतर्गत इन्हें राजस्थान और मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (Scheduled Caste, SC) में शामिल किया गया है. दिल्ली में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class, OBC) में रखा गया है. यह मुख्य रूप से राजस्थान में पाए जाते हैं.. 2001 की जनगणना में राजस्थान में इनकी जनसंख्या 12,60,685 दर्ज की गई थी और जनसंख्या के मामले में यह राजस्थान में दूसरी सबसे बड़ी जनजाति थी.राजस्थान में यह मुख्य रूप से टोंक, कोटा, बूंदी और जयपुर जिलों में केंद्रित हैं. राजस्थान के अलावा, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी इनकी अच्छी खासी आबादी है. मध्यप्रदेश में यह मुख्य रूप से इंदौर और उज्जैन जिले में पाए जाते हैं. यह हिंदू धर्म का पालन करते हैं. यह भैरव, दुर्गा माता, काली माता, वैष्णो माता, बालाजी, शिवजी, तेजाजी महाराज समेत अन्य हिंदू देवी देवताओं की पूजा करते हैं. यह डिंगल और हिंदी भाषा बोलते हैं.
Last updated: 05/06/2022 1:07 pm
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