बरई (Barai) भारत और नेपाल में पाई जाने वाली एक हिंदू जाति है. इन्हें तंबोली (Tamboli), पंसारी (Pansari) और चौरसिया (Chaurasia) के नाम से भी जाना जाता है. परंपरागत रूप से यह पान के पत्तों (Betel leaves) के उत्पादकों और विक्रेताओं की जाति है. बदलते हुए समय के साथ इन्होंने अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर सामान्य कृषि, दूसरे व्यवसायों तथा अन्य आधुनिक नौकरी-पेशा को अपना लिया है. वर्तमान में यह विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जहां यह अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं. M. A. Sherring ने अपनी किताब “Hindu Tribes and Castes as Represented in Benares” में इन्हें बनारस में एक बहुत ही समृद्ध और बहुसंख्यक जाति के रूप में वर्णित किया है, जो विशेष रूप से पान बेचने के लिए समर्पित है, जिसे सभी वर्गों के निवासियों द्वारा खाया जाता है.आइए जानते हैं बरई (Barai) जाति का इतिहास, बरई की उत्पति कैसे हुई?
रॉबर्ट वेन रसेल (R. V. Russell) के अनुसार, भारत के मध्य प्रांतों (छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश) तथा महाराष्ट्र के इलाकों में इन तीनों शब्दों; बरई, तंबोली और पंसारी; का परस्पर प्रयोग किया जाता है, हालांकि इनके अर्थ में कुछ भिन्नता भी देखी गई है. बरई शब्द का प्रयोग विशेष रूप से उनके लिए किया जाता है जो पान उगाते हैं. तंबोली पान के तैयार पत्तों के विक्रेता (थोक व्यापारी) होते हैं. शब्द-व्युपत्ति से पंसारी का अर्थ भी पान के पत्तों का व्यापारी होता है. लेकिन आमतौर पर सामान्य अर्थों में पंसारी शब्द का प्रयोग किराना दुकानदार (Grocer) या औषधि-विक्रेता (Druggist) के लिए किया जाता है.रसेल के अनुसार, बंगाल में पान के पत्ते उगाने और बेचने का व्यवसाय अलग अलग किया जाता है. इसीलिए यहां बरई और तंबोली अलग-अलग जातियाँ हैं. 1901 की भारत की जनगणना सारणी में उन्हें विभिन्न जातियों के रूप में दर्शाया गया था.
वर्तमान परिस्थिति (कैटेगरी): भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव (Positive Discrimination) की व्यवस्था आरक्षण Reservation के अंतर्गत इन्हें बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, चंडीगढ़ और दिल्ली में अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class, OBC) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.
पॉपुलेशन, कहां पाए जाते हैं? यह मूल रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र के निवासी हैं. यह मुख्य रूप से उत्तर भारत और मध्य भारत के राज्यों में पाए जाते हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली और छत्तीसगढ़ में इनकी अच्छी खासी आबादी है. इसके अलावा यह गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, चंडीगढ़ और दिल्ली में भी निवास करते हैं. मध्य प्रदेश के सागर, जबलपुर और (दामोह); तथा महाराष्ट्र के अमरावती, बुलढाणा, नागपुर और वर्धा जिले में इनकी महत्वपूर्ण मौजूदगी है.
धर्म: बरई सनातन हिंदू धर्म को मानते हैं और हिंदू देवी देवताओं की पूजा करते हैं. यह हिंदू त्यौहारों जैसे-शिवरात्रि, बसंत पंचमी, रक्षाबंधन, दिवाली और दशहरा, आदि को बड़े धूमधाम से मनाते हैं. लेकिन नाग देवता में इनकी विशेष आस्था है. इसीलिए यह नाग पंचमी का त्यौहार बड़े श्रद्धा भाव से मनाते हैं.
बरई समाज अनेक उप समूहों में विभाजित है, जैसे-
चौरसिया, पनागरिया, महोबिया, मगैहिया, तमौली, फुहिहारा, आदि इस जाति के सदस्य अपने उपनाम (Surname/Title)
के रूप में मुख्य रूप से “चौरसिया” का प्रयोग करते हैं.
“बरई” शब्द की उत्पत्ति संभवत: हिंदी भाषा के शब्द “बारी”; बाड़ा, बाड़ या घेरा; से हुई है, जिसका सीधा अर्थ है- “माली“. एक और व्युत्पत्ति के अनुसार, “बरई” शब्द की उत्पत्ति
बरना (Barana), हेल नेट (Hail Net), से हुई है, जिसका प्रयोग किसान अपने फसलों को ओलावृष्टि से बचाने के लिए करते हैं. “तम्बोली” संस्कृत भाषा के शब्द “ताम्बुल” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है- “पान”. पान शब्द संस्कृत के शब्द “पर्ना” से बना है, जिसका अर्थ होता है- “पत्ती”. इस प्रकार से, “पंसारी” शब्द का अर्थ होता है- “पान के पत्तों का व्यापारी”.
“चौरसिया” शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “चतुरशीतिः” से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- “चौरासी”. इसका मतलब यह है कि चौरसिया समाज 84 गोत्रों से मिलकर बना है.
बरई जाति की उत्पति के बारे में अनेक मान्यताएं हैं, इसके बारे में विस्तार से नीचे बताया जा रहा है.
भारतीय समाज में पान को शान शौकत का प्रतीक माना जाता है. इस तथ्य के कारण कि इस समाज के लोग उच्च वर्गों के आहार में शामिल शायद सबसे सम्मानित विलासी खाद्य पदार्थ का उत्पादन करते हैं, बरई समुदाय की सामाजिक स्थिति समाज में हमेशा अच्छी रही है. एक किवदंती के अनुसार, इनके पूर्वज ब्राह्मण थे. कहा जाता है कि पहला बरई एक ब्राह्मण था, जिसे भगवान ने अपने भाई से झूठ बोलते हुए पकड़ा. उसके पवित्र धागे (जनेऊ) को जप्त कर लिया गया और जमीन में रोपने के बाद पान की पहली बेल उत्पन्न हुई, जिसे प्रथम बरई को देखभाल करने के लिए कहा गया.
एक अन्य मान्यता के अनुसार, पहले पृथ्वी पर पान की बेल नहीं थी. जब पांडवों ने कौरवों को हराकर हस्तिनापुर जीत लिया तो उन्होंने एक बड़े अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ के लिए उन्हें पान के पत्तों की आवश्यकता हुई. इसीलिए उन्होंने अपने दूतों को पृथ्वी के नीचे नागों के राजा के निवास स्थान पाताल लोक भेजा, ताकि पान के पत्तों को प्राप्त किया जा सके. नागों के राजा बासुकी (Basuki) ने अपनी छोटी उंगली का ऊपरी जोड़ काटकर दूतों को दे दिया. इसे लाया गया और पृथ्वी पर बोया गया, और पान लताएँ जोड़ (joint) से निकलीं. यही कारण है कि पान की लता में फूल या बीज नहीं होते, परन्तु लताओं के जोड़ों को काटकर नए सिरे से बोया जाता है. पान की लताओं को नागबेल या सर्प-लता या नागवल्ली कहा जाता है. नागबेल की रक्षा और खेती के लिए बरई समाज को चुना गया. यही कारण है कि बरई/चौरसिया समाज महाभारत काल के साक्षी भी कहा जाता है.
इस समाज में अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने जन्म लिया है जिन्होंने राजनीति, संगीत, कला और पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देकर अपने समाज और देश का नाम रोशन किया है.
हरिप्रसाद चौरसिया, भारतीय संगीत निर्देशक और बांसुरी वादक
गंगा प्रसाद चौरसिया, सिक्किम के राज्यपाल
राकेश चौरसिया, भारतीय बांसुरी वादक
दीपक चौरसिया, भारतीय पत्रकार
सोनी चौरसिया, भारतीय कथक नर्तकी
अजय कुमार चौरसिया, नेपाली राजनीतिज्ञ
आलोक कुमार चौरसिया, भारतीय राजनीतिज्ञ
रामेश्वर चौरसिया, भारतीय राजनीतिज्ञ
संजीव चौरसिया, भारतीय राजनीतिज्ञ
Title: The Tribes and Castes of the Central Provinces of India, Volume II
Author: R. V. Russell
Hindu Tribes and Castes as Represented in Benares
Book by M. A. Sherring
http://www.ncbc.nic.in/User_Panel/CentralListStateView.aspx
https://www.naidunia.com/madhya-pradesh/hoshangabad-hoshangabad-news-1259238
Last updated: 03/04/2022 9:15 am
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