ब्राह्मण और राजपूत भारत में रहने वाली दो प्रमुख सवर्ण जातियाँ हैं. इन दोनों जातियों ने सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा में, विदेशी आक्रमणकारियों से भारत की रक्षा में, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में, देश के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उपरोक्त कारणों से आज भी भारतीय समाज में ब्राह्मणों और राजपूतों का सम्मान है. ये दोनों समुदाय न केवल ऐतिहासिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, बल्कि इन दोनों की वर्तमान स्थितियां भी कमोबेश एक जैसी हैं. आइए इसी क्रम में ब्राह्मण और राजपूत के बारे में विस्तार से जानते हैं.
धर्म शास्त्रों में वर्णित वर्ण व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की उत्पत्ति सृष्टि के रचयिता ब्रह्म के मुख से तथा क्षत्रिय की भुजा से बताई गई है. इस व्यवस्था के अन्तर्गत ब्राह्मणों को समाज में सर्वोच्च दर्जा दिया गया है. वर्णानुक्रम में ब्राह्मण के बाद क्षत्रिय का स्थान आता है. परंपरागत रूप से समाज में ब्राह्मणों की पहचान पुजारियों, आध्यात्मिक गुरुओं और और बौद्धिक नेताओं के रूप में रही है. वहीं, क्षत्रिय वर्ण से संबंध रखने वाले राजपूतों की पहचान एक शासक और योद्धाओं की जाति के रूप में रही है. धर्म शास्त्रों में ब्राह्मणों के मुख्य 6 कर्म माने गए हैं – पठन-पाठन, यज्ञ करना और कराना तथा दान लेना और देना. वहीं क्षत्रिय वर्ण का कार्य समाज की रक्षा करना बताया गया है. धर्म शास्त्रों के अनुसार, विकट परिस्थिति में ब्राह्मण जीवन यापन के लिए वर्णेतर कर्म कर सकते हैं. अर्थात प्रतिकूल परिस्थितियों में ब्राह्मण क्षत्रिय कर्म भी अपना सकता है.
इतिहास में ऐसे कई अवसर आए जब ब्राह्मणों ने मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए क्षत्रिय धर्म का पालन किया. इतिहास की पुस्तकों में कई ब्राह्मण शासकों का उल्लेख मिलता है. यदि राजपूतों की बात करें तो राजपूत शब्द की उत्पत्ति सर्वप्रथम 6वीं शताब्दी ईस्वी में हुई थी. यहां एक दिलचस्प सवाल उठता है कि क्या राजपूतों की उत्पत्ति ब्राह्मणों से हुई है. या यूँ कहें कि क्या ब्राह्मण और राजपूत एक ही हैं. इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं है. राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध में सिद्धांत हैं और विभिन्न इतिहासकारों के अपने-अपने मत हैं. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजपूत ब्राह्मण थे जो शासक बन गए. ‘Origin of Rajputs’ नामक पुस्तक के लेखक जय नारायण असोपा (Jay Narayan Asopa) भी राजपूतों की उत्पत्ति के इस सिद्धांत का समर्थन करते हैं.
ब्राह्मणों और राजपूतों ने हमेशा एक दूसरे का सम्मान किया है. देश और धर्म की रक्षा के लिए राजपूतों और ब्राह्मणों ने अनेक बलिदान दिए हैं. इसीलिए आज भी इन दोनों जातियों का भारतीय समाज में प्रभाव और सम्मान है. लेकिन अगर वर्तमान परिस्थितियों की बात करें तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आजादी के बाद सरकारों की तुष्टीकरण की नीतियों के चलते इन दोनों समुदायों का एक बड़ा वर्ग बड़ी तेजी से हाशिए पर जा रहा है. इसलिए समय की मांग है कि ब्राह्मणों और राजपूतों को सामाजिक एकजुटता के माध्यम से अपनी खोई हुई गरिमा को पुनः प्राप्त करने के लिए सार्थक प्रयास करना चाहिए.
References:
•Jai Narayan Asopa (1976). Origin of the Rajputs. Bharatiya Publishing House. p. 6.
Last updated: 28/06/2023 9:53 am
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