सैनी भारत में रहने वाली एक बहादुर जाति है. वैसे तो यह समुदाय परंपरागत रूप से किसान और जमींदार रहा है, लेकिन इनका अपना गौरवशाली सैन्य इतिहास रहा है. अंग्रेजों ने यादव, राजपूत, गुर्जर, जाट, मीणा जैसी योद्धा जातियों के साथ इन्हें भी एक लड़ाकू जाति (Martial race) के रूप में वर्गीकृत किया था.सैनी समाज ने देश और दुनिया को ऐसे कई वीर दिए हैं जिन्होंने मानवता के लिए और शांति स्थापित करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है. आइए इसी क्रम में जानते हैं परमवीर चक्र विजेता कैप्टन गुरबचन सिंह
सलारिया के बारे में.
गुरबचन सिंह सलारिया (Gurbachan Singh Salaria) का जन्म 29 नवंबर 1935 को जामवाल, शकरगढ़, पंजाब, ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान में) के पास एक गाँव में एक सैनी परिवार में हुआ था. वह मुंशी राम और धन देवी की पांच संतानों में से दूसरे थे.माता धन देवी एक साहसी महिला थीं. उनके पिता को पहले ब्रिटिश भारतीय सेना में हॉडसन हॉर्स रेजिमेंट के डोगरा स्क्वाड्रन में शामिल किया गया था. पिता के बहादुरी के किस्सों ने गुरबचन सिंह को फौजी जिंदगी के प्रति आकर्षित किया. सलारिया राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के संयुक्त सेवा विंग में शामिल हो गए. 1956 में एनडीए से स्नातक होने पर, उन्होंने 9 जून 1957 को अपनी पढ़ाई पूरी करते हुए भारतीय सैन्य अकादमी में दाखिला लिया. उन्हें 9 जून 1957 को 1 गोरखा राइफल्स में कमीशन दिया गया था और वह देश सेवा में जुट गए. बेल्जियम के कांगो छोड़ने के बाद, कांगो में गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई. जब संयुक्त राष्ट्र ने स्थिति को पुनः प्राप्त करने के लिए सैन्य हस्तक्षेप का फैसला किया, तो भारत ने संयुक्त राष्ट्र बल में 3000 पुरुषों की एक ब्रिगेड का योगदान दिया. गुरबचन सिंह सलारिया संयुक्त राष्ट्र शांति सेना का हिस्सा थे. जानकारों का मानना है उनकी नेतृत्व क्षमता को देखते हुए मार्च 1961 में कैप्टन सलारिया को इंडियन पीस कीपिंग फोर्स का नेतृत्व करने के लिए दक्षिण अफ्रीका भेजा गया था. 5 दिसम्बर 1961 को वहाँ उनका सामना विद्रोहियों से हुआ. इस लड़ाई में उन्होंने अपने सैनिकों के साथ मिलकर 40 विद्रोहियों को मार गिराया.
हमले के दौरान, कैप्टन सलारिया को गर्दन में दो बार गोली लगी और अंत में बहादुरी से लड़ते हुए, विदेशी धरती पर भारत के शौर्य का परचम लहराते हुए शहीद हो गए. कैप्टन सलारिया को युद्ध के दौरान अपनी जान की परवाह न करते हुए, असाधारण नेतृत्व, साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया.
References
•Stories of Heroism
PVC & MVC Winners
By B. Chakravorty · 1995
•People of India, National Series Volume VI, India’s Communities N-Z, p 3091, KS Singh, Anthropological Survey of India, Oxford University Press, 1998
•Mehta, Raj (15 April 2018). “When the will became a weapon”. The Tribune. Retrieved 13 September 2020.
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