चेरो (Chero) भारत में निवास करने वाली एक जाति है. अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है. पलामू में इन्हें बाराहजारी, दक्षिणी छोटानागपुर में पच्चासी, तो बिहार में इन्हें चारवा या चूरू के नाम से जाना जाता है. झारखंड में निवास करने वाले चेरो मुख्य रूप से किसान हैं, इनमें से कई पहले बड़े जमींदार थे. आइए जानते हैं चेरो जनजाति का इतिहास, चेरो शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?
उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में इन्हें अनुसूचित जाति (Scheduled Caste, SC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. लेकिन सोनभद्र और वाराणसी जिलों में इन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe, ST) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. बिहार और झारखंड में इन्हें अनुसूचित जनजाति में रखा गया है. उड़ीसा में इन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का जाति का दर्जा प्राप्त है.
यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में पाए जाते हैं. यह मूल रूप से कई आदिवासी समुदायों, जैसे भर, पासी और कोल आदि, में शामिल हैं जो उत्तर प्रदेश राज्य के दक्षिणी-पूर्वी कोने में पाए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से सोनभद्र, मिर्जापुर और वाराणसी जिलों में निवास करते हैं. झारखंड में यह मुख्य रूप से रांची, गुमला, खूंटी, सिमडेगा और पश्चिमी सिंहभूम आदि जिलों में पाए जाते हैं. बिहार में यह रोहतास, किशनगंज और कटिहार जिलों में पाए जाते हैं.
धर्म: यह मुख्य रूप से हिंदू और सरना धर्म को मानते हैं. हिंदू देवी देवताओं के साथ-साथ यह कई आदिवासी देवताओं जैसे सैरी-मां, गंवर भभानी और दूल्हा देव आदि की पूजा करते हैं.
इनके प्रमुख विभाजन हैं- बाराहजारी, तेरहहजारी,पच्चासी, रौतिया और खखरा कूचा रौतिया. हिंदू धर्म को मानने के कारण इन्हें रौतिया कहा जाता है. केकड़ा को मारने के कारण छोटा नागपुर में पाए जाने वाले चेरो जनजाति के लोगों को खखरा कूचा रौतिया कहा जाता है.
उपनाम: चेरो जनजाति के लोगों के प्रमुख उपनाम हैं- राय, साय, रौतिया, महतो और सिंह.
प्रमुख पर्व: इनके प्रमुख पर्व हैं- सोहराई, करम, फागुन, कादोलेटा, जनी शिकार, सरहुल, खुट, पाट, नवाखनी और सरना पूजा.
भाषा: यह हिंदी, ठेठ नागपुरी, मगही, भोजपुरी और मैथिली भाषा बोलते हैं.
इस जाति के लोग मूल रूप से आदिवासी क्षत्रिय होने का दावा करते हैं. इस समुदाय के अन्य सदस्य नागवंशी होने का दावा करते हैं. एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह भृगु ऋषि के पुत्र च्यवन ऋषि के वंशज होने का दावा करते हैं. राजपूत शासकों और ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन से पहले यह उत्तर प्रदेश, बिहार और पलामू क्षेत्र के पारंपरिक शासक और जमींदार हुआ करते थे. इनका इतिहास गौरवशाली है. झारखंड में चेरो राजवंश का 300 वर्षों से अधिक वर्षों तक राज रहा. पलामू दुर्ग आज भी इस बात का प्रमाण है. मेदनीराय चेरो राजवंश के प्रसिद्ध शासक थे.
पलामू भारत के झारखंड राज्य में स्थित एक जिला है. झारखंड के उत्तर-पश्चिमी भाग में आने वाला यह जिला पलामू प्रमंडल के अंतर्गत आता है. मेदिनीनगर, पलामू जिला तथा पलामू प्रमंडल का प्रशासनिक मुख्यालय है.
चेरोस पलामू में सबसे प्रमुख शासक जाति रही,
चेरो परंपरा के अनुसार मुगल बादशाह भागवत राय (Bhagwat Rai ) ने लगभग 1613 ई. में पलामू में चेरो शासन की स्थापना की
मुग़ल काल में पलामू अपनी वीरता के लिए विख्यात रहा. यहां के शासकों ने कई बार मुगलों से लोहा लिया.
बेतला राष्ट्रीय उद्यान आने वाले लोग पलामू किला घुमना नहीं भूलते. अद्वितीय स्थापत्य सुविधाओं वाले ये 17वीं शताब्दी के खंडहर झारखंड की विरासत का हिस्सा हैं और पलामू में चेरो राजाओं के अंतिम अवशेष हैं. यह किला मुगलों और अंग्रेजी हुकूमत के साथ चेरो राजाओं के संघर्ष स्वाभिमान और शहादत की याद दिलाता है.
कभी इन किलों का अपना सौन्दर्य और ठाठ था, लेकिन आज ये पूरी तरह से खंडहर बन चुके हैं.
इतिहासकार बताते हैं कि पलामू पर चेरो राजवंश का राज 1613 से 1813 तक रहा. भगवंत राय से लेकर चुडामन राय तक पलामू के राजा रहे. 1661 ई में राजा मेदिनी राय राजा हुए, जो काफी लोकप्रिय थे. उन्हीं के द्वारा शत्रुओं के आक्रमण के हमले से बचने व सैन्य शक्ति को समृद्ध करने के उद्देश्य से किले का निर्माण कराया गया,
चेरो राजा भागवत राय से रक्सेल राजपूतों से पलामू को अपने कब्जे में लिया था.
पलामू में चेरो शासन की शुरुआत के समय, चेरो के परिवारों की संख्या बारह हजार और खरवारों की संख्या अठारह हजार थी. कुछ साक्ष्य हैं कि पलामू में चेरो शासन 1613 ई. से बहुत पहले स्थापित किया गया था.
महरता चेरो ( Maharta Chero) सोलहवीं शताब्दी के मध्य में पलामू का शासक थे और शेरशाह द्वारा रोहतास क्षेत्र से निष्कासित किए जाने के उन्होंने पलामू पर कब्जा कर लिया होगा. इस प्रकार, 1613 में चेरो राजवंश कीस्थापना से पहले , चेरो लगभग आधी शताब्दी तक पलामू में रह चुके थे. कहा जाता है की चेरो राजा के पास एक सफेद हाथी था जिसका नाम श्याम सुंदर था. इसी हाथी को प्राप्त करने के उद्देश्य से शेरशाह ने चेरो राज्य पर हमला किया था.
1589 में मान सिंह बिहार का कार्यभार ग्रहण करते हैं और पलामू पर हमला कर देते हैं. चेरो राजा भागवत राय को हराकर पटना लौट जाते हैं. मुगल के आधीन भागवत राय शासक बने रहते है.1605 में अकबर की मृत्यु हो जाती है. इसका फायदा उठाकर चेरो अपने आप को आजाद कर लेते हैं. तब तक भागवत राय की भी की मृत्यु हो जाती है. अनंत राय अब नए राजा बनते हैं वे जहांगीर को समकालीन होते हैं.
चेरो परंपरा के अनुसार 1631 से 1661 तक 31 साल तक अनंत राय का शासन रहा. तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकार इसका उल्लेख नहीं किया है.
चेरो परंपरा के अनुसार एक और चेरो राजा सहबल राय का नाम आता हैं जो जहांगीर के समकालीन थे.
सहबल राय का उल्लेख मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा कहीं नहीं किया गया है. सहबल राय बहुत शक्तिशाली शासक प्रतीत होते हैं है। उसने चौपारन (हजारी-बाग जिले में ग्रैंड ट्रंक रोड पर) तक अपना प्रभुत्व बढ़ाया.सहबल राय शाही कारवां लूट लिया करते थे और बंगाल से आने-जाने वाले मुगल वाणिज्य के प्रवाह को बाधित कर दिया. इसने जहाँगीर के क्रोध को आमंत्रित किया जिसके अधिकारियों ने सहबल राय को हरा दिया और उसे कैदी के रूप में दिल्ली ले गए. ये सभी तथ्य चेरो परंपरा पर आधारित हैं और जहाँगीर के शासनकाल के मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा शायद ही इसकी पुष्टि की गई हो। तुजुक-ए-जहाँगीरी में भी सहबल राय के विरुद्ध इस अभियान का कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन चेरो परंपरा में वर्णित सहबल राय की मृत्यु की परिस्थितियाँ इन घटनाओं की संभावना का पुरजोर समर्थन करती हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक कैदी के रूप में सहबल राय को जहांगीर के पास लाया जाता है. मजबूत कदकाठी के सहबल से जहांगीर बहुत प्रभावित होते हैं और सम्राट के मनोरंजन के लिए उन्हें अकेले ही एक बाघ से लड़ने का आदेश दिया गया। बाघ के साथ इस लड़ाई में उनकी मृत्यु हो जाती है.
प्रताप राय एक शक्तिशाली राजा साबित हुए, हालाँकि उनके शासनकाल के मध्य में बड़े पैमाने पर मुगल आक्रमण हुए। पुराना पलामू किला, , ऐसा प्रतीत होता है पुराना पलामू किला का निर्माण उनके समय के दौरान किया गया था.
चेरो साम्राज्य की राजधानी, काफी समृद्ध जगह थी। किले के चारों ओर घनी आबादी वाले और जीवन से गुलजार समृद्ध बाज़ार थे।
चेरो साम्राज्य अपने आप में काफी व्यापक था, और पादशाहनामा के अनुसार, पलामू की उत्तरी सीमा पटना से केवल 25 ‘कोस’ (71 मील) दक्षिण में थी. कन्हार नदी पलामू के चेरो साम्राज्य की दक्षिण-पश्चिमी सीमा बनाती थी. कोठी, कुंडा और देवगन किले ने चेरो साम्राज्य की सीमा चौकी बनाई और इसे बिहार के मुगल प्रांत से अलग कर दिया।
आगे चलकर एक और वीर चेरो राजा हुए जिनका नाम था मेदिनी राय .
भारत में एक से बढ़कर एक राजा-महाराजा हुए। सबकी अपनी-अपनी खासियत है। इन्हें याद कर आज भी राज्य क्षेत्र और देश की जनता खुद गौरवान्वित महसूस करती है। इसी श्रेणी में जनजातीय समुदाय से आने वाले राजा मेदिनी राय किसी से कम नहीं थे। ये अपने समय से बहुत आगे थे। इन्हें न सिर्फ जनजातीय समाज बल्कि पूरे झारखंड के लिए गौरव कहा जा सकता है।
पलामू के राजा मेदिनी राय का साम्राज्य दक्षिण गया, हजारीबाग और सरगुजा तक फ़ैला हुआ था। चेरो वंश से संबंध रखने वाले राजाओं में मेदिनी राय का इतिहास सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। इनका शासनकाल सन 1658 से 1674 तक ( 16 वर्षों तक) रहा. मेदिनी राय वीर योद्धा थे. इतिहास में इसका जिक्र है. इन्होने
डोइसा में रघुनाथ शाह को पराजीत किया जो कि नागवंशी राजा थे. इस जीत की खुशी में मेदिनी राय ने पलामू में एक दुर्ग का निर्माण करवाया. वे यहीं पर नहीं रुके, उन्होंने एक के बाद एक कई छोट और बड़े राजाओं को पराजित किया जिनमें बेलुंजा सिरिस, जपला, कुटुंबा थे. शेरघाटी समेत जैसे राज्यों को अपने अधिकार में कर लिया। इनके समय में प्रजा खुशहाल थी। दूध दही की नदियां बहती थी. कहा जाता है कि धनि धनि राजा मेदनिया घर घर बाजे मल्हनीया अर्थात मेदनी राय के शासन काल में सभी घरों में दही मथा जाता था.
Last updated: 27/05/2024 3:17 pm
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