भारतीय सेना में जाति और समुदायों के नाम पर बनी रेजीमेंट आज भी मौजूद हैं. उदाहरण के तौर पर राजपूत रेजीमेंट, डोगरा रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट, जाट रेजीमेंट, मराठा लाइट इन्फ़ेन्ट्री, महार रेजिमेंट, गोरखा राइफल्स, आदि. आपको यह जानकार के हैरानी होगी कि अंग्रेजों के जमाने में ब्रिटिश इंडियन आर्मी में चमार रेजिमेंट (Chamar Regiment) नाम की एक फौजी टुकड़ी हुआ करती थी जिसे बाद में भंग कर दिया गया था. आइए जानते हैं चमार रेजिमेंट की स्थापना के बारे में.
प्राचीन काल में कर्म, गुण और स्वभाव के आधार पर समाज को 4 वर्णों में बांटा गया था. कालांतर में इसमें कठोरता आती चली गई और वर्ण का आधार कर्म ना होकर जन्म हो गया. इससे कई जातियों का जन्म हुआ. इस तरह से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कुल में पैदा हुए लोग अपने आप को उसी वर्ण का मानने लगे. लेकिन इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहां आवश्यकता पड़ने पर क्षत्रिय कुल में जन्मे व्यक्ति ब्राह्मण हो गए तथा शूद्र कुल में जन्मे व्यक्ति ने क्षत्रिय वर्ण को धारण किया. अग्रेजों द्वारा भी जातियों को योद्धा (Martial) और गैर-योद्धा (Non-martial) वर्ग में वर्गीकृत किया गया था. योद्धा वर्ग में उन जातियों को शामिल किया गया था जो अंग्रेजों के अनुसार शारीरिक रूप से मजबूत और बहादुर थे. अहीर, यादव, डोगरा, जाट, गुर्जर, मीणा, राजपूत, सैनी, गोरखा, भूमिहार ब्राह्मण, मराठा, मुगल और पठान आदि जातियों को मार्शल जाति माना गया था. लेकिन ऐसा कई बार हुआ जब ब्रिटिशों ने आपदा के समय तथाकथित अछूत जातियों को मार्शल जाति का दर्जा दिया और आपातकाल की समाप्ति के बाद उन्हें फिर से गैर-मार्शल जाति की श्रेणी में डाल दिया गया. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, जब सैनिकों के रूप में भर्ती के लिए सक्षम पुरुषों की कमी थी, महार रेजिमेंट का गठन किया गया था, जिसे बाद में भंग कर दिया गया था. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, फिर से महार रेजिमेंट का गठन किया गया. इस बार महार रेजिमेंट को भंग नहीं किया गया और यह आज भी मौजूद है. इसी तरह, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सैन्य सेवा में तत्काल आवश्यकता को पूरा करने के लिए चमार रेजिमेंट का गठन किया गया था, जिसे युद्ध के बाद भंग कर दिया गया.चमार रेजिमेंट द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों द्वारा बनाई गई एक पैदल सेना रेजिमेंट थी. 1 मार्च 1943 को स्थापित, रेजिमेंट को शुरू में 268वीं भारतीय इन्फैंट्री ब्रिगेड को सौंपा गया था.1946 में रेजिमेंट को भंग कर दिया गया था. 1943 से 1946 यानी सिर्फ तीन साल ही अस्तित्व में रही चमार रेजीमेंट और उसके बहादुर सैनिकों ने अंग्रेजों की ओर से 1944 में जापानियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. इस लड़ाई को इतिहास की सबसे भयानक लड़ाइयों में से एक माना जाता है. उस समय दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना जापान की मानी जाती थी, जिसे हराने के लिए अंग्रेजों ने चमार रेजिमेंट का इस्तेमाल किया. कोहिमा के मोर्चे पर इस रेजिमेंट ने जिस अदम्य साहस और बहादुरी का परिचय दिया इसके लिए इन्हें बैटल ऑफ़ कोहिमा अवार्ड से नवाजा गया. भारत में अंग्रेजों ने कैप्टन मोहनलाल कुरील (Mohan Lal Kureel) के नेतृत्व में चमार रेजिमेंट को आजाद हिंद फौज से मुकाबला करने सिंगापुर भेजा. जब कैप्टन कुरील ने देखा कि अंग्रेज चमार रेजीमेंट का इस्तेमाल अपने ही देशवासियों को मरवाने के लिए कर रहे हैं तो उन्होंने चमार रेजीमेंट के बहादुर सैनिकों के साथ मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया और आईएनए में शामिल होकर अंग्रेजो के खिलाफ युद्ध करने का निर्णय लिया. बाद में अंग्रेजों ने अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए चमार रेजीमेंट को भंग कर दिया.
References;
•Emancipation of Dalits and Freedom Struggle
By Himansu Charan Sadangi · 2008
•The Routledge Handbook of Indian Defence Policy
Themes, Structures and Doctrines
2020
•Recruiting, Drafting, and Enlisting
Two Sides of the Raising of Military Forces
2013
•https://hindi.news18.com/amp/news/knowledge/know-all-about-chamar-regiment-demanded-by-bhim-army-chief-chandrashekhar-azad-lok-sabha-election-2019-bsp-sp-dlop-1845499.html
Last updated: 19/10/2022 1:02 pm
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