भारत पर विदेशी आक्रमणों का इतिहास पुराना है. सदियों तक विदेशी आक्रांताओं ने भारत पर आक्रमण किया और न केवल इसे लूटने का प्रयास किया बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, अस्मिता और गौरव को पूरी तरह नष्ट करने का भरसक प्रयास किया. ऐसे अनेक प्रयासों के बावजूद भारत का अस्तित्व अक्षुण्ण बना रहा और भारतीय संस्कृति की धारा अविरल प्रवाहित होती रही. यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि हर काल में भारत की पावन भूमि पर अनेक वीरों ने जन्म लिया जिन्होंने अपने त्याग और बलिदान से मातृभूमि और भारतीय संस्कृति की रक्षा की. आइए इसी क्रम में जानते हैं महाराजा सुहेलदेव राजभर के इतिहास के बारे में.
महाराजा सुहेलदेव भारतीय इतिहास के एक ऐसे नायक हैं जिनके बारे में बहुत कम ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध है. भले ही इतिहास की किताबों में इस वीर योद्धा के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिखा गया हो, लेकिन उत्तर प्रदेश के अवध और पूर्वांचल क्षेत्र की लोक कथाओं में राजा सुहेलदेव का उल्लेख होता रहा है. इन लोक कथाओं के माध्यम से महाराजा सुहेलदेव न केवल लोगों के मन में जीवित हैं, बल्कि उनका नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है. लोगों के मन में महाराजा सुहेलदेव की छवि एक ऐसे वीर योद्धा की है, जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों से मातृभूमि और हिन्दू धर्म की रक्षा की. महाराजा सुहेलदेव के इतिहास के बारे में बात करें तो लोक कथाओं, चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो की किताब एजाज-ए-खुसरवी, फिर 17वीं सदी में लिखी गई किताब मिरात-ए-मसूदी और महमूद गजनवी के समकालीन इतिहासकारों-उतबी और अलबरूनी के पुस्तकों के आधार पर अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों का पता चलता है. यहां हम इन्हीं महत्वपूर्ण स्रोतो के आधार पर महाराजा सुहेलदेव के इतिहास के बारे में जानेंगे.
•सुहेलदेव 11वीं सदी में श्रावस्त्री के राजा थे.
•अवध गजेटियर के अनुसार सुहेलदेव का जन्म माघ मास की बसंत पंचमी के दिन 990 ई. में बहराइच के महाराजा प्रसेनजित के पुत्र के रूप में हुआ था. मिरात-ए-मसूदी के अनुसार, वह श्रावस्ती के राजा मोरध्वज का बड़े पुत्र थे.
•किंवदंतियों के विभिन्न संस्करणों में सुहेलदेव को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे सकरदेव, सुहिरध्वज, सुहरीदिल, सुहरीदल-धज, राय सुहृद देव, सुसज, सुहरदल, सोहिलदार, शाहरदेव, सहरदेव, सुहर देव, सहर देव, सोहल देव और सुहेलदेव, आदि.
•अवध गजेटियर के अनुसार महाराजा सुहेलदेव का शासन काल 1027 से 1077 ई. तक माना गया है. उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार पूर्व में गोरखपुर और पश्चिम में सीतापुर तक किया था. वह नागवंशी भारशिव क्षत्रिय थे, जो आज भर या राजभर कहलाते हैं.
•हालांकि, सुहेलदेव की जाति को लेकर वर्तमान में कई जाति समूह दावा जताते हैं. मिरात-ए-मसूदी के बाद के लेखकों ने सुहेलदेव को भर, राजभर, बैस राजपूत, भारशिव या यहां तक कि नागवंशी क्षत्रिय के रूप में वर्णित किया है.
1001 ई. से 1025 ई. के बीच इस्लामिक आक्रांता महमूद गजनबी ने भारत को लूटने की दृष्टि से 17 बार भारत पर आक्रमण किया. वह सोमनाथ सहित भारत के अनेक अत्यंत समृद्ध मंदिरों को लूटने में सफल रहा. इन हमलों का उद्देश्य केवल धन लूटना नहीं था बल्कि भारत से मूर्ति पूजा को समाप्त करके भारत का इस्लामीकरण करना था. सोमनाथ के युद्ध में गजनवी के साथ उसके भांजे भतीजे सैयद सालार मसूद ने भी भाग लिया था. 1030 ई. में महमूद गजनबी की मृत्यु के बाद मसूद ने उत्तर भारत में इस्लाम के विस्तार का दायित्व अपने कंधों पर ले लिया. इसी इरादे से सालार मसूद दिल्ली, मेरठ, कन्नौज होते हुए एक विशाल कट्टरपंथी इस्लामी सेना लेकर बहराइच पहुंचा, जहां उसका सामना महाराजा सुहेलदेव से हुआ. 10 जून, 1034 को बहराइच की लड़ाई में सालार मसूद महाराजा सुहेलदेव के हाथों लाखों की संख्या वाली इस्लामिक सेना के साथ मारा गया. इस युद्ध के बाद विदेशी आक्रमणकारियों में भारत के वीरों के प्रति ऐसा भय उत्पन्न हो गया कि अगले डेढ़ सौ वर्षों तक किसी आक्रमणकारी का भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ. मातृभूमि, भारतीय संस्कृति, धर्म की रक्षा के इस कार्य के लिए महाराज सुहेलदेव हमेशा के लिए अमर हो गए.
Last updated: 13/03/2023 12:18 pm
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