वर्ण व्यवस्था के तहत समाज को 4 वर्गों में बांटा गया है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति कैसे हुई, इसके संबंध में कई सिद्धांत हैं. गुण सिद्धांत के अनुसार वर्णों की उत्पत्ति गुणों के आधार पर हुई है. इस सिद्धांत के अनुसार कोई व्यक्ति किस वर्ण का होगा यह इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि वह किस परिवार या वर्ण में पैदा हुआ है, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें किस प्रकार के गुण पाए जाते हैं. आइए इसी क्रम में जानते हैं कि ब्राह्मण के अंदर कितने गुण होते हैं.
धर्म शास्त्रों में विभिन्न वर्णों के लिए अलग-अलग गुणों की व्याख्या की गई है. कोई व्यक्ति किन गुणों के आधार पर ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी बनता है, इस विषय में अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग बातें कही गई हैं. महाभारत के वनपर्व में सर्परूपधारी नहुष और युधिष्ठिर के बीच संवाद का उल्लेख मिलता है. सर्परूपधारी नहुष युधिष्ठिर से अनेक प्रश्न करते हैं, जिनमें से एक प्रश्न यह है कि ब्राह्मण कौन हैं? युधिष्ठिर इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते हैं- जिस व्यक्ति में सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, क्रूरता का अभाव, तपस्या और दया दिखाई देती है, वह व्यक्ति ब्राह्मण है. अर्थात युधिष्ठिर के अनुसार ब्राह्मण होने के लिए व्यक्ति में उपरोक्त सात गुणों का होना आवश्यक है. इसी प्रकार अन्य विद्वानों ने भी ब्राह्मणों के विभिन्न गुण बताए हैं.
आमतौर पर यह माना जाता है कि ब्राह्मणों में 9 गुण पाए जाते हैं. इसका आधार श्रीमद्भगवद्गीता है. श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 42 में ब्राह्मणों के गुणों का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार है-
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥42॥
अर्थ- शान्ति, संयम, तपस्या, शुद्धता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक तथा परलोक में विश्वास-ये सब ब्राह्मणों के के 9 स्वाभाविक गुण हैं. अर्थात इन 9 गुणों से संपन्न व्यक्ति ही ब्राह्मण होता है.
References:
•श्रीमद्भगवद्गीता
•महाभारत-अरयण्कपर्व
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