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झांसी का किला किसने बनवाया था? रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी किले की रोचक बातें

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक इमारतों का महत्वपूर्ण योगदान है. ये स्मारक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं के गवाह देते हैं और आज भी हम भारतीयों को इस बात की याद दिलाते हैं कि देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने के लिए हमें क्या-क्या झेलना पड़ा है और हमने क्या-क्या कुर्बानियां दी हैं. आइए जानते हैं झांसी के किले (Jhansi Fort) के बारे में कुछ रोचक बातें-

Photograph of Jhansi Fort taken in 1882 by Lala Deen Dayal, from the Lee-Warner Collection: ‘Scenes and Sculptures of Central India, Photographed by Lala Deen Diyal, Indore
Image Wikimedia Commons

झांसी के किले की जानकारी

बुंदेलखंड के महत्वपूर्ण स्थलों में से एक, झांसी के किले का निर्माण 17 वीं शताब्दी में ओरछा के राजा बीर सिंह जूदेव (Raja Bir Singh Ju Deo,1606-27) ने 1613 में करवाया था. यह भव्य और विशाल किला बलवंतनगर (वर्तमान झांसी) शहर में बंगरा नामक एक चट्टानी पहाड़ी पर बनाया गया था. इस किले के गिनती भारत के सबसे ऊंचे किलों में होती है. अपने प्रारंभिक वर्षों से हीं इस किले का सामरिक महत्व रहा है. यह किला ओरछा (Orchha) के चंदेल राजाओं की सेना के लिए एक सुरक्षित गढ़ का काम करता था. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह किला झांसी की रानी लक्ष्मीबाई और अंग्रेजी फौज के बीच हुई भीषण लड़ाई का गवाह है. जब झांसी की रानी युद्ध में पराजित हो गई तो अंग्रेजों ने इस किले पर कब्जा कर लिया और बाद में इसे ग्वालियर महाराजा जियाजी राव सिंधिया के हवाले कर दिया. किले के अंदर भगवान गणेश और भगवान शिव के मंदिर बने हुए हैं, जो मराठा स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं. किले के अंदर अनेक ऐतिहासिक महत्व के दर्शनीय स्थल हैं, जिनमें प्रमुख हैं- गुलाम गौस खान द्वारा संचालित प्रसिद्ध तोप ​​करक बिजली (Karak Bijli) और मोती बाई द्वारा संचालित भवानी शंकर (Bhawani Shankar); जिसे 1857 के विद्रोह में प्रयोग किया गया था. साथ ही यहां रानी झांसी गार्डन तथा गुलाम गौस खान, मोती बाई और खुदा बख्श का मजार है. कहा जाता है कि गौस खान और मोती भाई ने रानी झांसी बाई के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी. यहां एक संग्रहालय (museum) है जो पहले शाही निवास हुआ करता था. इस म्यूजियम में 9वीं ईस्वी पूर्व की मूर्तियों समेत कई ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रह है जो आगंतुकों को बुंदेलखंड के समृद्ध इतिहास में झांकने का अवसर प्रदान करता है. इस किले में कुल 10 दरवाजे हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- खंडेरो गेट (Khandero Gate), दतिया दरवाजा (Datia Darwaza),  उन्नाव गेट (Unnao Gate), झरना गेट (Jharna Gate), लक्ष्मी गेट (Laxmi Gate), सागर गेट (Sagar Gate), ओरछा गेट (Orchha Gate), Sainyar Gate (सैनयार गेट), भंडारी गेट और चांद गेट (Chand Gate). 1857 के विद्रोह में किले की महत्वपूर्ण भूमिका थी. इस किले का संबंध रानी लक्ष्मीबाई से हैं जिन्होंने अपने नागरिकों और मातृभूमि के स्वाभिमान के रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था. यह किला 15 एकड़ में फैला हुआ है. इसकी चौड़ाई 225 मीटर और लंबाई 312 मीटर है. किले की ग्रेनाइट की दीवारें 16 से 20 फीट मोटी है.

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