भारत के मध्यकालीन इतिहास में कछवाहा राजपूतों की बहुत प्रसिद्धि है. इस राजपूत वंश में राजा मानसिंह जैसे परम पराक्रमी और शक्तिशाली योद्धा हुए. लेकिन क्या आप जानते हैं मूलतः कछवाहा राजपूत ग्वालियर और नरवर के थे. आमेर और जयपुर से पहले इस वंश की शाखाएँ ग्वालियर, दुबकुण्ड और नरवर में शासन करती थीं. जयपुर (आमेर) का कछवाहा वंश ग्वालियर के कच्छपघातों से सम्बन्धित था. आइए ग्वालियर के कछवाहा राजपूतों के बारे में विस्तार से जानते हैं-
कछवाहा वंश की उत्पत्ति भगवान राम के पुत्र कुश से मानी जाती है. श्री राम के वंशज होने के नाते इनका संबंध सूर्यवंश से है. जयपुर की स्थापना से पहले तक आमेर के कछवाहा वंश की राजधानी हुआ करती थी. आमेर के किले में 1612 का एक शिलालेख है जिसमें कछवाहा शासकों को रघुकुल तिलक या रघुवंश तिलक बताया गया है. महाराज रघु श्री राम के पूर्वज और प्रतापी सूर्यवंशी राजा थे. विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय, मैडिसन (University of Wisconsin, Madison) के इतिहास के प्रोफेसर आंद्रे विंक (André Wink) भारत के मध्यकाल और प्रारंभिक आधुनिक काल (700 से 1800 सीई) पर अपने अध्ययन के लिए जाने जाते हैं. “Al-hind: The Making of the Indo-islamic World” नामक पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि कछवाहा कच्छपघातों (Kachchhapaghatas) के वंशज हैं.
नरवर और ग्वालियर के राजाओ के मिले कुछ संस्कृत शिलालेखों में इन्हें कच्छपघात कहा गया है. मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पास वर्तमान पद्मपवैया (पवाया) नामक स्थान ही प्राचीन काल का पद्मावती नगर था. कहा जाता है कि कुश के वंशजो की एक शाखा बिहार के रोहताशगढ से चलकर पद्मावती (वर्तमान ग्वालियर) पहुंचीं. ग्वालियर-नरवर के पास का प्रदेश कच्छप प्रदेश कहलाता था. उस समय कच्छप प्रदेश पर कच्छप नामक नागवंशी क्षत्रिय शाखा का राज था. कछवाहों के पूर्वजों ने कच्छपों को हराकर इस पूरे क्षेत्र को अपने कब्जे में ले लिया. कच्छपों को पराजित करने के कारण यह “कच्छपघात” कहलाए. कच्छपघात शब्द कालांतर में विकृत होकर “कच्छपहा” हो गया और आगे चलकर कछवाह(कुशवाहा) कहलाने लगा. सर हेनरी मियर्स इलियट (Sir Henry Miers Elliot) एक अंग्रेजी सिविल सेवक और इतिहासकार थे. “Memoirs on the History, Folk-Lore, and Distribution of the Races of the North Western Provinces of India” नामक पुस्तक में उन्होंने कच्छपघात वंश के बारे में लिखा है. इलियट के अनुसार, कच्छपघात” का अर्थ होता है- “कच्छप को मारने वाला”. यह वंश पहले गुर्जर-प्रतिहार राजवंश और चन्देल राजवंश के सामंत (जागीरदार) थे. कुछ समय पश्चात दोनों राजवंशों की स्थिति कमजोर हो गई. कहा जाता है कि चंदेल राजा विद्याधर की मृत्यु के पश्चात, बार-बार मुस्लिम आक्रमणों से चंदेल साम्राज्य बहुत कमजोर हो गया. इस स्थिति का लाभ उठाते हुए, कच्छपघाटों ने चंदेलों के प्रति अपनी निष्ठा छोड़ दी. उन्होंने स्वयं को उनसे अलग कर लिया और स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे. यह 10वीं शताब्दी के अंत तक शक्तिशाली हो गए. कच्छपघातों ने ग्वालियर राज्य की स्थापना की और मध्य भारत के बड़े भूभाग पर काफी समय तक शासन किया. ग्वालियर के साथ साथ नरवर राज्य की भी स्थापना की गई जो की बहुत प्रसिद्ध राज्य रहा. यही नरवर राज्य से वर्तमान ग्वालियर के आसपास चंबल में कछवाहों ने अपना स्वतंत्र राज्य इंदुरखी की स्थापना की. इनकी एक शाखा ने कालांतर में आमेर और जयपुर राज्य की स्थापना की.
References;
Al-hind: The Making of the Indo-islamic World
By André Wink
Memoirs on the History, Folk-Lore, and Distribution of the Races of the North Western Provinces of India
By Sir Henry Miers Elliot
Ahmed Ali (2005). Kachchhapaghāta Art and Architecture. Jaipur: Publication Scheme. ISBN 9788181820143.
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