Religion

कातकारी समुदाय का इतिहास, कातकारी समुदाय की उत्पत्ति कैसे हुई?

Share
Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।

कातकारी समुदाय (Katkari Community) भारत में पाया जाने वाला एक जनजातीय समुदाय है. इन्हें काठोढ़ी (Kathodi) के नाम से भी जाना जाता है. पारंपरिक रूप से यह कत्था बनाने और बेचने का कार्य करते थे. आजादी के बाद वन विभाग द्वारा खैर के पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने के बाद इनके पारंपरिक व्यवसाय में गिरावट दर्ज की गई है. रोजगार के नए विकल्पों की तलाश में इन्हें पहाड़ियों और अपने पैतृक क्षेत्रों को छोड़कर मैदानी इलाकों में पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. वर्तमान में यह अपने जीवन यापन के लिए विभिन्न प्रकार की गतिविधियों पर निर्भर हैं, जैसे- कत्था बनाना और बेचना, लकड़ी का कोयला बनाना और बेचना, जलावन और वन उत्पादों को इकट्ठा करना और बेचना, मछली पकड़ना, जानवरों और पक्षियों का शिकार करना, खेती करना और कृषि श्रमिक के रूप में काम करना. यह हिंदू धर्म का पालन करते हैं.यह कातकारी, मराठी-कोंकणी और हिंदी भाषा बोलते हैं. भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की प्रणाली आरक्षण के अंतर्गत इन्हें अनुसूचित जनजाति (Schedule Tribe, ST) वर्ग में शामिल किया गया है.आइये जानते हैं कातकारी समुदाय का इतिहास, कातकारी समुदाय की उत्पति कैसे हुई?

कातकारी समुदाय की वर्तमान स्थिति

वर्तमान में कातकारी एक एक बिखरा हुआ खंडित समुदाय है. इनमें से ज्यादातर भूमिहीन मजदूर हैं, जो जीविका और रहने के लिए दूसरों पर अत्यधिक निर्भर हैं. जीवन यापन के लिए ईट भट्ठों और चारकोल इकाइयों में काम करते हैं. कहीं-कहीं इन्हें बंधुआ मजदूर के रूप में भी काम करना पड़ता है. साथ ही इन्हें छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करना पड़ता है. जन्म और मृत्यु दर के आंकड़ों में इस जनजाति की आबादी में लगातार गिरावट दर्ज की गई है. अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यह लुप्त हो सकते हैं. इसीलिए, महाराष्ट्र में इन्हें विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (Particularly Vulnerable Tribal Groups- PVTGs) में शामिल किया गया है.

कातकारी समुदाय की जनसंख्या

यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र में पाए जाते हैं. महाराष्ट्र में यह मुख्य रूप से नासिक, पुणे, धुले और रायगढ़ जिलों में निवास करते हैं. साल 2001 की जनगणना में महाराष्ट्र में, मुख्य रूप से रायगढ़ और थाने जिलों में, इनकी आबादी लगभग 2,35,022 दर्ज की गई थी. गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक में भी इनकी थोड़ी बहुत आबादी है.

कातकारी समुदाय की उत्पत्ति कैसे हुई?

कातकारी नाम इनके वन आधारित गतिविधि में शामिल होने से लिया गया है. खैर के पेड़ से कत्था बनाने और बेचने के पारंपरिक कार्य के कारण इस समुदाय का नाम कातकारी पड़ा. यह जाति अपनी बहादुरी और निडरता के लिए जानी जाती है. कातकारी जनजाति के बारे में मराठी में एक कहावत प्रचलित है, इसका हिंदी रूपांतरण है- “हम भारत के मुंह में हाथ डालते हैं, जबरी खोलते हैं, और बाघ के दांत गिनते हैं एक समय में इस जनजाति के लोग महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट के जंगलों में रहा करते थे. वन्यजीवों जैसे बाघ आदि से इनका विशेष संबंध था. वाघमारे कातकारी समुदाय द्वारा प्रयोग किए जाने वाला एक आम उपनाम है, जिसका अर्थ होता है- “बाघ को मारने वाला”.

This website uses cookies.

Read More