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मल पहाड़िया लोगों का इतिहास, जनसंख्या, कहाँ पाए जाते हैं?

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मल पहाड़िया (Mal Paharia) भारत में पाया जाने वाला एक आदिवासी जनजातीय समुदाय है. यह राजमहल पहाड़ियों के मूल निवासी हैं, जिसे आज झारखंड में संथाल परगना डिवीजन के रूप में जाना जाता है. जीवन निर्वाह के लिए यह मुख्य रूप से कृषि, वन उत्पादों, पशुपालन और मजदूरी पर निर्भर है. यह वन उत्पादों जैसे जलावन, बॉस, फल-फूल, जड़ी-बूटी, कंदमूल आदि का संग्रह करके स्थानीय बाजारों में बेचते हैं. आमतौर पर यह मांसाहारी होते हैं, लेकिन गौ मांस का सेवन नहीं करते हैं. मल पहाड़िया लोगों का इतिहास, जनसंख्या, कहाँ पाए जाते हैं?

मल पहाड़िया किस कैटेगरी में आते हैं?

भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था (आरक्षण) के अंतर्गत इन्हें झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार में अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe, ST) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

मल पहाड़िया जनसंख्या, धर्म, भाषा , कहां पाए जाते हैं?

यह मुख्य रूप से झारखंड और पश्चिम बंगाल में पाए जाते हैं. झारखंड में यह मुख्यतः संथाल परगना में निवास करते हैं. थोड़ी बहुत संख्या में यह ‌पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम, लोहरदगा और अन्य जिलों में भी रहते हैं. 2011 की जनगणना में भारत में इनकी कुल आबादी 1,82,560 दर्ज की गई थी. इनमें से 1,35,797 झारखंड में, 44,538 झारखंड में और 2,225 बिहार में निवास करते हैं.

धर्म
इनके धार्मिक रीति-रिवाजों पर हिंदू धर्म का प्रभाव है. यह काली माता आदि हिंदू देवताओं के साथ-साथ, स्थानीय देवताओं जैसे धारमेर गुसाईं (सूर्य देवता), बड़ा देवता और आत्माओं की पूजा करते हैं.

भाषा
यह माल्टो, मल पहाड़िया, बंगाली और हिंदी भाषा बोलते हैं.

मल पहाड़िया लोगों का इतिहास

बंगाल में मुस्लिम शासन के दौरान, मल पहाड़िया बहादुर योद्धा थे, जिन्होंने खुद को मुस्लिम शासकों के अधीनता से स्वतंत्र रखा था. स्थानीय जमींदारों से इनके अच्छे संबंध थे. एक समझौते के तहत, यह मैदानी लोगों के किलो और पहाड़ियों की ओर जाने वाले रास्तों और चौकियों की पहरेदारी किया करते थे. बदले में इन्हें मैदानी लोगों द्वारा एक निश्चित मात्रा में जमीन दी जाती थी. बाद में मल पहाड़िया स्थानीय जमींदारों से अपनी स्वतंत्रता का प्रयास करने लगे. इसके कारण स्थानीय जमींदारों के साथ उनके संबंध बिगड़ गए और इनके कई सरदारों की हत्या कर दी गई. इसके बाद वह मैदानी इलाकों के हमलावर बन गए. अंग्रेजी हुकूमत के दौरान यह ब्रिटिश दूतों को भी लूट कर उनकी हत्या कर दिया करते थे. अंग्रेजों ने इन्हें दबाने का कई प्रयास किया, लेकिन असफल रहे. अंततः 1778 में, अंग्रेजी हुकूमत ने एक शांति योजना के तहत इन्हें ब्रिटिश सेना में भर्ती कर लिया गया जो बेहद प्रभावी साबित हुआ।

Last updated: 13/01/2022 3:51 pm

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