Religion

मेघवाल (Meghwal) जाति का इतिहास, मेघवाल शब्द की उत्पति कैसे हुई?

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मेघ कितना प्यारा शब्द लगता है, अगर किसी से भी पूछा जाए मेघ का मतलब क्या होता है तो सब यही कहेंगे मेघ यानि बारिश (Rain) लेकिन क्या आपको पता है भारत में रहने वाली एक जाति है जिसका नाम है ‘मेघवाल’. मेघवाल शब्द मेघवार से आया है, मेघवार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “मेघ” और हिंदी के शब्द “वार” से हुई है. मेघ का अर्थ होता है-“बादल और बारिश”. वार का अर्थ होता है-“समूह, पुत्र और बच्चा”. इस तरह से, मेघवार का शाब्दिक अर्थ है-“बारिश और बादल का बच्चा या पुत्र यानि मेघों का समूह. अब सवाल उठता है मेघवाल शब्द में मेघ का अर्थ बारिश ही है या कुछ और. मेघवाल शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई , मेघवाल जाति का इतिहास क्या है. आइए एक- एक कर जानने का प्रयास करते हैं.

मेघवाल कहां पाए जाते हैं.

यह मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम भारत में निवास करते हैं. पाकिस्तान में भी इनकी छोटी आबादी है. भारत में यह मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में पाए जाते हैं. जीवन यापन के लिए यह अपने पारंपरिक व्यवसाय खेती, पशुपालन और बुनाई पर निर्भर हैं. मेघवाल समुदाय कढ़ाई और कपड़ा उद्योग में अपने योगदान के लिए जाना जाता है.

मेघवाल किस कैटिगरी में आते हैं?

आरक्षण प्रणाली के अंतर्गत इन्हें राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर में अनुसूचित जाति (Scheduled Caste, SC) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है.

मेघवाल जाति का इतिहास

The Tribes and Castes of Bombay Volume 3 जो कि 1922 में छपी थी के अनुसार मेघवाल कहने वाले लोगों की 1901 में कुल जनसंख्या 33,697 थी जिसमें 17,035 पुरुष और 16,662 महिलाएं थी. ये सारे लोग State of cutch (Kutch) यानि आज के गुजरात में रहते थे. वे गणेशिया, ऋषिया, रिखिया या राखिया ( Ganeshia, Rishia, Rikhia or Rakhia) नाम से भी जाने जाते थे. तब वह एक अछूत जाति मानी जाती थी. मेघवाल समाज की उत्पत्ति के बारे में कई सिद्धांत हैं. समुदाय के बुजुर्गों द्वारा कहा जाता है कि मेघवालों का जन्म सिंध क्षेत्र में हुआ था. प्राचीन काल में सिंध उत्तर में वर्तमान कश्मीर से दक्षिण में गुजरात तक और पश्चिम में अफगानिस्तान से पूर्व में उत्तर प्रदेश तक फैला हुआ था. इसे सप्तसिंधु क्षेत्र कहा जाता था. मेघवाल को कई नाम से जाना जाता है जैसे मेघरिख, रिखिया, मेघ, मेघवंशी, मेघवाल, बलाई भांबी, चान्दीर, चान्दौर जुलाहे, सालवी, चोपदार, कोटवाल, छड़ीदार, बुनकर, कोष्टी इत्यादि. अधिकांश मेघवाल हिंदू धर्म का पालन करते हैं. मेघऋषि, कबीर, रामदेव जी इनके प्रमुख देवी देवता हैं, जिनकी यह पूजा करते हैं. एक सिद्धांत के मुताबिक, भारत पर मुस्लिम आक्रमण के दौरान, राजपूत, चारण, ब्राह्मण और जाट सहित कई उच्च जातियों के लोग भांबी जाति में शामिल हो गए. इसके कारण, मेघवाल समुदाय पांच उप समूहों में विभाजित हो गया. मेघवालों के इन उप जातियों में सांस्कृतिक विभिन्नता पाई जाती है. हालांकि, अपनी पिछली पहचान के बारे में जागरूक होने के कारण, यह अपने पुराने रीति-रिवाजों, परंपराओं और प्रथाओं को बनाए रखे है.

मेघवाल के उत्पत्ति के पहला सिद्धांत-मेघऋषि के वंशज है मेघवाल

जातियों के नाम किसी न किसी कारणवश रखे गए और कोई नाम देना पड़ा. अब सोचना यह है कि मेघ जाति का मेघ नाम क्यों रखा गया? क्या यह कर्म पर या किसी और कारण से रखा गया? एक पुस्तक मेघवंश इतिहास (ऋषि पुराण) केअनुसार जो कि स्वामी गोकुल दास के द्वारा लिखी गई है ब्रह्मजी के पुत्र मेघऋषि से मेघवंश चला है. ब्रह्माजी के दस मानसी पुत्रों में से वशिष्ट, अत्रि, अंगिरा, अगस्त्य गौत्र इस जाति में अभी भी पाये जाते हैं .अतः यह स्पष्ट है कि इस जाति का मूल श्रोत इन्हीं ऋषियों से है और इसीलिये इस जाति की उपाधि ऋषि अर्थात रिष (रिख) प्राचीन काल से प्रचलित है. वशिष्ट ऋषि राजाओं और देवताओं के पुरोहित थे . पुरोहित ब्राह्मण भी ब्रह्मक्षत्रिय पुकारे जाते हैं. ब्रह्माजी के पुत्र मेघऋषि थे जिनसे मेघवंश चला ये ब्राह्मक्षत्रिय थे. इससे स्पष्ट है कि मेघवाल समाज ब्राह्मणों और क्षत्रियों का मिला हुआ समाज है क्योंकि इस जाति के कुछ प्राचीन वंश गौत्र ब्राह्मणों से और कुछ क्षत्रियों से मिलते हैं.

रिपोर्ट मरदुमशुमारी राज मारवाड़ 1891 पुस्तक अनुसार परमेश्वर ने अपने बदन के मैल से एक पुतला बनाया और उसको जिंदा करके “मेघचन्द” नाम रक्खा उसके चार बेटे हुए, रांगी, जोगा चंड और आदरा .इस पुस्तक में आगे यह भी लिखा है कि “बाजे मेघवालों ने यों भी लिखाया है कि मेघचन्द असल में ब्राह्मण थे और मेघऋषि कहलाते थे, उनकी औलाद मेघवाल है ”

मेघवाल के उत्पत्ति के दूसरा सिद्धांत-आर्यन आक्रमण सिद्धांत

आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र में बसे लोग ‘मेघ ऋषि’ जिसे ‘वृत्र’ भी कहा जाता है के अनुगामी थे या उसकी प्रजा थे. यह उल्लेख वेदों में आता है. आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष के रूप में मेघ नामधारी महापुरुष को मानते आए हैं. यह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता है. इसे सभी मेघवंशी मानते हैं. आर्यों का आगमन ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व माना जाता है और इस दौरान आर्यों के बड़ी संख्या में आने की शुरूआत हुई और इस क्षेत्र में मेघवंशियों के साथ लगभग 500 वर्ष तक चले संघर्ष के बाद आर्य जीत गए. आर्य आक्रमण सिद्धांत के अनुसार. मेघवाल भारतवर्ष के मूलनिवासी थे और सिंधु घाटी सभ्यता मे रहने वाले यही थे.

सिंधु घाटी सभ्यता अपने समय की सबसे बड़ी सभ्यता थी और विशाल क्षेत्र में फैला था. अपने चरम पर यह उत्तर में हिमालय और पूर्व में वियतनाम तक फैला हुआ था. लेकिन आर्यों के आक्रमण या पलायन के कारण, यह सभ्यता लुप्त हो गयी. इन भूमध्यसागरीयों के बारे में नवीनतम 20वीं शताब्दी की स्थिति से पता चलता है कि उन्हें मेड्स (Medes) उसके बाद ‘मेघ’ के रूप में जाना जाता था. सिंधु घाटी में रहने वाले लोग देश के अलग -अलग हिस्सों में चले गए. अलग -अलग पेशा अपनाने के कारण वे अलग -अलग नाम से जाने जाने लगे. जैसे भगत,भक्त, मेघवाल, Megh (मेघ) मेघोवाल, माहेश्वरी, , बलाई इत्यादि. कई तरह के पेशा चुनने के कारण वे कहीं क्षत्रिय, कहीं वैश्य कहीं ब्राह्मण बन गए.

मेघवाल का अर्थ ही होता है मेघों का समूह.

ऋग्वेद में देवताओं और राक्षसों के बीच एक बड़े युद्ध का जिक्र है. वो है देवताओं के राजा इंद्र और राक्षसों के राजा वृत्रासुर के बीच. मेघवाल शब्द की उत्पत्ति इसी लड़ाई से मानते हैं. कहा जाता है कि शुरु के लड़ाइयों में वृत्रासुर ने इंद्र को हरा दिया था. ऐसा संभव इसलिए हो पाता कि वृत्रासुर चारो तरफ से काफी सैनिकों के साथ हमला करता था जिसे मेघ की संज्ञा दी गई. आज भी मेघवाल मेघ ऋषि को अपना पितामह मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं. इस सिद्धांत को मानने वाले का कहना है वृत्रासुर ही मेघ ऋषि हैं.

मेघवाल समाज के प्रसिद्ध व्यक्ति
मारवाड़ का शहीद राजाराम मेघवाल:चन्दनमल नवल के अनुसार महात्मा गांधी जिन्हे हरिजन कहते थे और हम जिन्हे दलित के रूप में जानते है उन्हे डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान में अनुसुचित जाति के नाम से पहचाना है. यह वही ‘शूद्र’ है जिनके लिए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि जब वह जायेंगे और हम (उच्च वर्ग) द्वारा अपने प्रति किए गए शोषण को समझेंगे, तो अपनी एक फूंक से आप सबको उड़ा देंगे। मैने चन्दनमल नवल को बचपन से देखा है और पुलिस सेवा में भी उनके जातीय अलगाव को जाना है, इसलिए मैं कहता हूं कि सामाजिक परिवर्तन की प्रत्येक नींव में राजाराम से लेकर अदृश्य चन्दनमल नवल जैसे अनेक सपूत आज भी जाग रहे है, लेकिन कौन जानता है कि जोधपुर के ऐतिहासिक दुर्ग मेहरानगढ़ में एक दलित राजाराम और उनके माता-पिता का बलिदान ही नींव का पत्थर बना था। अतः चन्दनमल नवल के सृजन और संघर्ष का हम आदर करते है और उनके आत्म गौरव को प्यार करते है.

Last updated: 28/06/2023 9:56 am

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