ज्यादातर मुसहर भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं. अभाव और गरीबी के कारण इन्हें आज भी कभी-कभी जीवन यापन/जीवित रहने के लिए चूहे पकड़ने का सहारा लेना पड़ता है. यह भारत में सबसे अधिक हाशिए पर रहने वाली जातियों में से एक है. इन्हें दलितों में भी दलित ‘महादलित’ श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है. आजादी के बाद इनके स्थिति में सुधार जरूर हुई है जैसे कि कम से कम अब इन्हें बंधुआ मजदूर की तरह काम नहीं करना पड़ता. पहले इन्हें भूख मिटाने के लिए चूहा खाने को मजबूर होना पड़ता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. लेकिन सामाजिक भेदभाव, आर्थिक असमानता, अशिक्षा, अंधविश्वास, जागरूकता की कमी और राजनीतिक अनदेखी के कारण सदियों से हाशिए पर रहा है यह समाज आज भी हाशिए पर खड़ा है. समाज में शैक्षणिक और सामाजिक विकास की गति बहुत धीमी है. कम साक्षरता और कौशल के अभाव में इनके पास रोजगार के अवसर सीमित हैं. यह आज भी मुख्य रूप से खेतिहर मजदूर या निर्माण श्रमिक के रूप में काम करते हैं. ज्यादातर आबादी गांव में रहती हैं और सूखा बाढ़ की स्थिति में गांव में काम मिलना आसान नहीं होता. फिर इन्हें आजीविका की तलाश में पलायन करना पड़ता है. शहरों में जाकर यह कारखानों और निर्माण क्षेत्र में काम करते हैं. जन्म से मृत्यु तक गरीबी, भूखमरी, लाचारी, आजीविका संकट और संघर्ष इनके साथ चलती है. कहने को तो जमीदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानून को लागू किए हुए वर्षों बीत गए लेकिन सामंतवादी व्यवस्था और पंगु राजनीति इच्छाशक्ति के कारण खेतों को अपने खून पसीने से सींचने वाला यह समाज आमतौर पर भूमिहीन है. बिहार में 96.3% मुसहर भूमिहीन है. पिछड़ेपन के कारण इन्हें महादलित श्रेणी में रखा गया है. सरकार इनके लिए भोजन,आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं. लेकिन कतार में सबसे पीछे खड़े इस समाज के लिए यह सारी योजनाएं कागजों तक ही सीमित हैं. आइए जानते हैं मुसहर जाति के प्रमुख व्यक्ति कौन – कौन हैं?
माउंटेन मैन के नाम से मशहूर दशरथ मांझी का जन्म 14 जनवरी 1934 को बिहार के गया जिले के करीब गहलौर गांव में हुआ था. मजदूरी कर जीवन यापन करने वाले मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी का समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण 1959 में निधन हो गया. सही समय पर इलाज नहीं मिलने का कारण था- अस्पताल और गहलौर गांव के बीच खड़ा पहाड़. फिर उन्होंने पहाड़ से अपनी पत्नी की मौत का बदला लेने के लिए पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने का संकल्प लिया. उन्होंने केवल एक हथोड़ा और छेनी की मदद से 360 फुट लंबी, 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काटकर सड़क बना डाला. इस काम में उन्हें 22 साल लगे. दशरथ मांझी द्वारा बनाए गए इस सड़क ने अत्रि और वजीरगंज ब्लॉक की दूरी 55 किलोमीटर से 15 किलोमीटर कर दिया.
उनके जीवन पर आधारित फिल्म मांझी: द माउंटेन मैन के निर्देशक केतन मेहता ने उन्हें गरीबों का शाहजहां करार दिया. 17 अगस्त 2007 को मांझी 73 साल की आयु में दुनिया छोड़कर चले गए. लेकिन पीछे छोड़ गए पहाड़ पर लिखी अमिट कहानी जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को इंसानी जज्बे, ज़िद, जुनून और प्रेम का सबक सिखाती रहेगी.
जीतन राम मांझी बिहार की राजनीति में दलितों का एक बड़ा चेहरा हैं. इनका का जन्म 6 अक्टूबर 1944 को बिहार के गया जिले में हुआ था. मजदूरी से अपनी जीवन की शुरुआत करने वाले मांझी कभी डाक विभाग में क्लर्क हुआ करते थे. 12 साल नौकरी करने के बाद 1980 में ये नौकरी छोड़कर राजनीति के मैदान में उतरे और सत्ता के शिखर तक का सफर तय किया. उन्होंने 20 मई 2014 से 20 फरवरी 1915 तक बिहार के 23वे मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया. जीतन राम मांझी बिहार में दलित समुदाय से आने वाले तीसरे मुख्यमंत्री हैं.
मुसहर परिवार की बेटी भगवती देवी का जन्म 6 नवंबर 1936 को बिहार के औरंगाबाद जिले में हुआ था. यह एक स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनेता हैं.
दलितों और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए काम करने वाले भगवती देवी 1969 में बिहार विधान सभा की सदस्य बनीं. 1996 में यह 11वीं लोकसभा के लिए चुनी गई.
भोला माझी 1957 में जमुई विधानसभा सीट से एमएलए बने थे. इसके बाद 1971 में वे लोकसभा सदस्य भी रहे.
संतोष सुमन मांझी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता और बिहार सरकार में मंत्री हैं. यह जीतन राम मांझी के पुत्र हैं.
Last updated: 09/11/2023 1:15 pm
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