उत्तरप्रदेश के महोबे जिले में छतरपुर रोड पर स्थित नईगंवा रेबाई एक प्रतिष्ठित और धनवान Princely state था जो Bundelkhand Agency के अंतर्गत एक यादव रियासत था. एक समय नईगंवा समस्त Bundelkhand Agency की राजधानी हुआ करती थी। इस राजघराने के वंशज मूलतः महाबली बलराम जी के वंशज माने जाते हैं। बुंदेलखंड तथा चंबल संभाग में दाऊ वंशी अहीर क्षत्रियों के 84 गोत्रों के भिन्न -भिन्न ठिकाने और घराने आबाद हैं जो अपना निकास मथुरा स्थान और भगवान बलभद्र जी से मानते हैं। आइए जानते हैं ‘Naigaon Rebai princely state’ बुन्देलखण्ड की यादव रियासत का इतिहास।
इस रियासत की स्थापना 1802 में श्री बलराम जी के पीढ़ी के वंशज यदुवंशी अहीर क्षत्रिय राजा साहब ठाकुर लक्ष्मण सिंह जूदेव ने की थी । दाऊ श्री ठाकुर लक्ष्मण सिंह जूदेव बुंदेलखंड के बड़े घराने से थे। निम्नीपार की जागीर भी इन्ही के सगोत्रीय भाई बंधू की थी जिनके एक वंशज अजयगढ़ रियासत वालों के द्वारा गोद लिए गए थे। 1802 में बांदा के नवाब को हरा ठाकुर लक्ष्मण सिंह ने तलवार के दम पर स्वतंत्र रेबाई स्टेट की स्थापना करी और ‘ जूदेव ‘ की पदवी धारण की। हालांकि 1808 में खराब स्वास्थ्य के कारण राजा साहब का स्वर्गवास हो गया। 1808 में राजपरिवार के उत्तराधिकारी और राजा लक्ष्मण सिंह के सुपुत्र युवराज जगत सिंह जूदेव राजगद्दी पर नशीन हुए। इन्होंने कई जनकल्याण के कार्य किए और ” सवाई” की पदवी धारण कर 31 वर्षों तक राज किया। 1839 में रेबाई स्टेट के तत्कालीन राजा श्री सवाईं जगत सिंह जूदेव की मृत्यु के बाद रेबाई रियासत खतरे में पड़ गई थी। दूसरी रियासत वाले रेबाई रियासत पर आक्रमण कर हथियाने की लालसा पाल रहे थे। इस मुसीबत के वक्त राजा संवाई जगत सिंह जूदेव की रानी साहिबा ठकुरानी दुलया बाई ने शमशीर हाथों में ले रियासत की कमान अपने हाथों में ली और अखंड होंसले के साथ राजगद्दी पर बैठ रियासत और अपने राजपरिवार की ना सिर्फ रक्षा की बल्कि उत्तर प्रदेश की सबसे महान महिला शासकों में से एक कहलाईं । रेबाई रियासत की रानी Her Highness ठकुरानी दुलया बाई को ब्रिटिश काल में 10 घुड़सवार, 51 पैदल सैनिक व 1 तोप का सम्मान प्राप्त था। रानी साहिबा ठकुरानी दुलया बाई ने रेबाई रियासत पर 12 वर्षों तक राज किया इसके बाद जब 1851 में कुल के उत्तराधिकारी बड़े हुए तब ठकुरानी ने अपने बड़े बेटे युवराज कुंवर विश्वनाथ प्रताप सिंह जूदेव का कुलपुरोहितों और रियाया के उपस्थिति में राज्यभिषेक किया। राजा संवाई विश्वनाथ प्रताप सिंह जूदेव के बाद उनके पुत्र युवराज रतन सिंह जूदेव सिंहासन पर नशीन हुए। ऐसा भी कहते हैं कि युवराज रतन सिंह जूदेव गोद लिए गए थे। रेबाई की “रज़िया सुल्तान” के नाम से विख्यात ठकुरानी दुलया की हिम्मत और दिलेरी ने ही उनके राजपरिवार और रियासत की रक्षा करी। ठकुरानी के ही कारण उनकी रेबाई रियासत भारत की आज़ादी यानी 1947 तक कायम रही। आज़ादी के बाद तक राजपरिवार की इस सूबे में धाक रही और जब पहली बार यहां विधानसभा के चुनाव हुए थे तो इस रियासत के राजा को सर्वसम्मति से जनता ने ही विधायक बना दिया था। इस राजपरिवार ने सूबे में कई भव्य महलों, हवेलियों , राजसरोवरों, शाही छत्रियों, मंदिरों आदि का निर्माण करवाया। प्रत्येक वर्ष यहाँ आज भी रियासत के स्थापना दिवस के अवसर पर भव्य जश्न होता है और मेला लगता है। इस गौरवशाली राजपरिवार के वंशज आज भी यहाँ स्थित अपने पुश्तैनी भव्य राजमहल में निवास करते हैं। 2004-5 में यहाँ के राजा श्री ठाकुर विजयबहादुर सिंह जूदेव का एक दुर्घटना में स्वर्गवास हो गया, उनके पुत्र राजा श्री ठाकुर राजबहादुर सिंह जूदेव यहाँ के हाल के उत्तराधिकारी हैं। इस रियासत का एक ख़ास शाहीध्वज रहा है जो आज भी राजमहल के ऊपर शान से लहराता है और इस रियासत का राजचिह्न आज भी इस राजमहल में सुरक्षित है।
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