भारत के प्रमुख हिंदू धार्मिक पंथों में से एक
नाथ संप्रदाय की उत्पत्ति मध्यकाल में 9 नाथ 12 पंथो से हुई है. इन्हीं 9 नाथों में से एक गुरु दत्तात्रेय नाथ जी थे, जिन्हें ब्रह्मा जी का स्वरूप माना जाता है. दत्तात्रेय नाथ के ही शिष्य थे जालंधर नाथ. जालंधर नाथ के जन्म के विषय में एक कथा प्रचलित है. आइए जानते हैं सपेरा जाति का इतिहास, सपेरा शब्द की उत्पति कैसे हुई?
मान्यताओं के अनुसार, एक समय की बात है जब हस्तिनापुर में बिरहद्रव नामक एक राजा सोम यज्ञ कर रहे थे तो अंतरिक्ष नारायण ने यज्ञ के भीतर प्रवेश किया. यज्ञ की समाप्ति के बाद एक तेजस्वी बालक की उत्पत्ति हुई. यही बालक जालंधर नाथ कहलाया. राजस्थान के जालौर के पास आथूणी दिस में उनका तपस्या स्थल है. यहां पर मारवाड़ के राजा मानसिंह ने एक मंदिर बनवाया है. जालंधर नाथ 12 वीं सदी के सिद्ध थे. यह मूल रूप से जालंधर (पंजाब) निवासी थे, और राजस्थान और पंजाब क्षेत्र में इनकी ख्याति थी. जालंधर नाथ ने आगे चलकर अपना एक शिष्य बनाया जिसका नाम कानिफनाथ था. इनका जन्म एक ऐतिहासिक कथा में सम्मिलित है. महाराष्ट्र की सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में गर्भगिरि पर्वत से बहने वाली पौनागिरि नदी के पास ऊंचे किले पर मढ़ी नामक गांव बसा हुआ है, और यहीं है इस महान संत की समाधि. इस किले पर श्री कानिफनाथ महाराज ने 1710 में फाल्गुन मास की वैद्य पंचमी पर समाधि ली थी, जहां लाखों श्रद्धालुओं की आस्था बसी हुई है.
9 नाथों के इतिहास में कनीफा नाथ जी की जन्म कथा इस प्रकार है. कानिफनाथ महाराज हिमालय में हथिनी के कान से प्रकट हुए थे. माना जाता है कि ब्रह्मा जी एक दिन सरस्वती के प्रति आकर्षित हुए तो उनका वीर्य नीचे गिर गया. जो हवा में घूमता हुआ हिमाचल प्रदेश में विचरण कर रही एक हथिनी के कान में समा गया. कुछ समय बाद प्रबुद्धनारायण ने उन्हें जालंधर नाथ के आदेश से कान से निकालने का निर्देश दिया और इस तरह उनका नाम कनिफानाथ जी पड़ा .
कानिफनाथ महाराज ने बद्रीनाथ में भागीरथी नदी के तट पर 12 वर्ष तपस्या की और कई वर्ष जंगलों में गुजार कर योग साधना की. इसी बीच कनीफा नाथ जी ने अपने अनुयायियों को सांपों की दीक्षा दी और सपेरा समाज सांपों के प्रति जाने लगे. तत्पश्चात उन्होंने दीन-दलितों को अपने उपदेशों के माध्यम से भक्तिमार्ग पर प्रशस्त होने की भावना जागृत की. उन्होंने दलितों के पीड़ा दूर करने के विषय पर साबरी भाषा में कई रचनाएं की.
कानिफनाथ जी 14 वीं सदी के सिद्ध थे. मूल रूप से बंगाल के निवासी थे. नाथ संप्रदाय के भीतर, एक अलग उप परंपरा की शुरुआत करने वाले, आगे चलकर इन्होंने ही सपेरा समाज की उत्पत्ति तथा इस समाज के कुछ निम्नलिखित समूहों का गठन किया.
इन्हीं समाजों में से एक मुख्य समूह था जिसे बदिया नाथ सपेरा कहा जाता है. इसकी एक कथा है, जैसे कि कानिफनाथ जी के परम गुरु जालंधर नाथ जी हैं, वह पंजाब के निवासी थे तो उन्होंने अपने गुरु के सम्मान के लिए पंजाब में बोले जाने वाले एक शब्द से इस समाज की नियुक्ति की जिसे, बधिया, बोला जाता है. पंजाबी में इस शब्द का अर्थ होता है – बहुत अच्छा. आगे चलकर यह समाज बदिया नाथ सपेरा के नाम से जाने जाने लगा.
इनके गोत्र निम्नलिखित हैं-
1. बदिया नाथ सपेरा समाज:-
•मरार (मराड़) (Mararh)
•बांम्बी (Bambi)
•लधड़ (Ladhrh)
•घारू (Gharu)
•डूम (Doom)
•ढोला वाले (Dhola Wale), इत्यादि
2. बिहाल सपेरा, धोली पौश ,काली पौश
3.कलवेलिया सपेरा
4. नकफूले सपेरा
5. सांदेनाथ सपेरा
इन सभी समाज के उपनाम निम्नलिखित हैं-
चौहान, डग्गला, बामणिया, सरसर, मलखट, सुडिया, धरान.
सन 1947 की लड़ाई में इन सभी समूहों के कबीले भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बिखर गए. फिर कांग्रेस सरकार के राज में मेनका गांधी ने एक लेटर जारी किया (वाइल्डलाइफ की तरफ से ) जिसमें यह कहा गया कि सभी वन्यजीवों को मुक्त किया जाए. इन वन्यजीवों में सांप भी शामिल थे जोकि सपेरा जाति के कमाने खाने का साधन था. यह लेटर सपेरा समाज के लोगों के लिए बहुत ही मुसीबत भरा था, जिसके कारण इनके मांगने खाने की कला- संस्कृति खत्म हो गई. क्योंकि ये लोग सांप के साथ ही गांव में जाकर खेल दिखाने और भिक्षा मांगने का कार्य करते थे. इस मुसीबत को देखते हुए कुछ लोगों ने मेहनत मजदूरी और दिहाड़ी करने लग गए और ये अपनी समाज की कला संस्कृति को भी मजबूरन खत्म करते गए और अन्य कार्य करने लग गए. परंतु अब इनके लिए यह कार्य मुसीबत बन गया है. क्योंकि कुछ लोग इन्हें अब सपेरा भी नहीं मानते हैं और अन्य समाजों के नाम से पुकारते हैं. क्योंकि इनकी पहचान सांप के साथ मांगने खाने की थी!
References:
Sanjay Nath- State Member of Denotified Nomadic Tribes semi Nomadic Tribes Development Board / Govt. of Haryana
Last updated: 26/09/2022 7:47 pm
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