भारत में जाति आधारित हिंसा का पुराना इतिहास रहा है. जातिगत हिंसा ज्यादातर बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और बंगाल के ग्रामीण इलाकों में हुई है. तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में कुछ राजनीतिक रूप से प्रेरित जाति संघर्ष देखे गए हैं. जातिगत हिंसा के कई सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कारण रहे हैं. अंतर्जातीय हिंसा के कई रूप हैं जैसे उच्च जाति (सवर्ण) बनाम दलित, पिछड़ा वर्ग बनाम दलित, पिछड़ा बनाम पिछड़ा, पिछड़ा बनाम अति पिछड़ा और सवर्ण बनाम सवर्ण. आइए इसी क्रम में जानते हैं भूमिहार और राजपूत के बीच हिंसा के बारे में.
भूमिहार और राजपूत उत्तर प्रदेश और बिहार की प्रमुख सवर्ण जातियाँ हैं. इन दोनों जातियों की पहचान योद्धा जाति के रूप में रही है. अतीत में, दोनों जातियों के पास बड़ी ज़मींदारी और रियासतें थीं. जमींदार समूहों की एक विशेषता यह थी कि उनका राजनीतिक सुदृढ़ीकरण पूर्व-औपनिवेशिक काल से ही शुरू हो गया था. भूमिहारों और राजपूतों ने स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, इसका लाभ उन्हें स्वतन्त्रता के बाद मिला तथा दोनों जातियों की सत्ता में महत्वपूर्ण भागीदारी रही. इन दोनों जातियों को परंपरागत रूप से संसाधन संपन्न, शक्तिशाली और प्रभावशाली माना जाता है. लेकिन इन दोनों जातियों के बीच आपसी कलह और भयंकर प्रतिस्पर्धा रही है जिसके परिणामस्वरूप कई बार हिंसक घटनाएं भी हुई हैं.
रणवीर सेना का गठन जन्म 15 अगस्त 1994 को भोजपुर जिले के बेलाउर गांव में किया गया था. भोजपुर जिले के उदवंत नगर प्रखंड का बेलाउर गांव बिहार के उन गिने-चुने गांवों में से एक है, जो सवर्ण सामंती में प्रभुत्व की दृष्टि से सबसे बड़ा है. लगभग 7200 बीघा जमीन और करीब 17 हजार की आबादी वाले इस गांव में करीब दो सौ साल पहले राजपूतों की बड़ी आबादी रहती थी. राजपूतों का उसी गांव के भूमिहारों से झगड़ा रहता था. उन दिनों सेना के एक सेवानिवृत्त जवान रणवीर ने अपनी ताकत दिखाते हुए बेलाउर से राजपूतों को खदेड़ दिया था. तभी से रणवीर यानी बाबा रणवीर बेलाउर के भूमिहारों के रोल मॉडल बन गए. यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि भूमिहार और राजपूत समान स्थिति वाली जातियाँ हैं. दो समान स्टेटस की जातियों में वर्चस्व की लड़ाई एक आम बात है. बिहार में जातीय सेनाओं का इतिहास रहा है. उदाहरण के तौर पर भूमिहारों की रणवीर सेना और राजपूतों की कुंवर सेना. भूमिहार और राजपूत के बीच प्रतिद्वंद्विता का एक लंबा इतिहास रहा है. यही वजह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों के टिकट बंटवारे, मंत्रिमंडल के गठन में दोनों की बराबरी का हमेशा ख्याल रखा जाता रहा है.
References:
•Agralekha
By Ghanaśyāma Paṅkaja · 1995
•Bihar men samajik parivartan ke kuchh ayam
2001
•दलित उत्पीड़न की परम्परा और वर्तमान
By मोहनदास नैमिशराय · 2006
Last updated: 25/11/2022 10:54 am
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