व्यवसाय से तात्पर्य व्यक्ति के उस कार्य से है जिससे वह धन कमाता है, अपना जीवन यापन करता है तथा अपनी आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति करता है. भारत की सामाजिक संरचना वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था पर आधारित है, जिसका प्रभाव आज भी व्यक्ति के व्यवसाय के निर्धारण और व्यवसाय के चयन में देखा जाता है. आइए इसी क्रम में जानते हैं राजभर जाति का मुख्य व्यवसाय क्या है?
मुख्य बिंदु पर आने से पहले आइए उन कारकों को समझें जो व्यावसायिक विकल्पों को प्रभावित करते हैं. मुख्य रूप से चार कारक किसी व्यक्ति के व्यावसायिक विकल्पों को प्रभावित करते हैं – मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक. पारिवारिक वातावरण, नैतिक मूल्य, शारीरिक क्षमता, मानसिक क्षमता, बुद्धिमता और वित्तीय स्थिति जैसे कारक किसी व्यक्ति के व्यवसाय का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. भारत के संदर्भ में सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों की बात करें तो वर्ण व्यवस्था भारतीय हिंदू समाज को चार भागों में बांटती है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. इन चारों वर्णों के लिए अलग-अलग कार्य निर्धारित हैं. भारत में जाति सबसे बड़े कारकों में से एक बनी हुई है जो किसी व्यक्ति के व्यवसाय को निर्धारित करती है. भारत में ऐसे कई समुदाय हैं जो अभी भी अपने पूर्वजों के पारंपरिक व्यवसाय का पालन करते हैं, उदाहरण के लिए लोहार, सुनार, माली, कहार आदि. राजभर जाति की बात करें तो उत्तर प्रदेश में भारत के कई राज्यों में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया गया है. वहीं लंबे समय से देश के कई राज्यों में इस समुदाय को अनुसूचित वर्ग में शामिल करने की मांग की जाती रही है. राजभर जाति के मुख्य व्यवसाय की बात करें तो यह समुदाय मुख्य रूप से छोटे किसानों और भूमिहीन श्रमिकों से बना है. इस समुदाय की अधिकांश आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और आजीविका के लिए कृषि और कृषि संबंधी गतिविधियों पर निर्भर करती है. इनमें से कई पशुपालन से अपना घर चलाते हैं. जबकि इनमें से कुछ ने छोटा-मोटा कारोबार और दुकानदारी करना शुरू कर दिया है. आरक्षण और सरकार द्वारा की गई सकारात्मक कार्रवाई के कारण समुदाय में शिक्षा का प्रसार हुआ है. इस समुदाय के शिक्षित लोगों की सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों में उपस्थिति है.
Last updated: 13/03/2023 12:23 pm
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