Religion

भारत में 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला कौन सा है?

Share
Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।

भगवान शिव सनातन हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में से एक हैं। उन्हें विनाश के देवता के रूप में पहचाना जाता है। वेदों में इनका वर्णन रुद्र नाम से किया गया है। भगवान शिव एक ऐसे हिंदू देवता हैं जिनकी पूजा साकार और निराकार दोनों रूपों में की जाती है। सरकार का अर्थ है मूर्ति और चित्र के रूप में भगवान शिव की पूजा, जबकि निराकार का अर्थ है शिवलिंग के रूप में भगवान शिव की पूजा। भगवान शिव की आराधना में ज्योतिर्लिंगों का विशेष महत्व है। वैसे तो शिव पुराण में 64 ज्योतिर्लिंगों का वर्णन मिलता है, लेकिन इनमें से 12 ज्योतिर्लिंगों को प्रमुख माना जाता है। इसी क्रम में हम यहां जानेंगे कि भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग कौन सा है।

12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग कौन सा है?

12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग कौन सा है, इसके बारे में जानने से पहले ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में जानना जरूरी है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के ये 12 ज्योतिर्लिंग वे विशेष ‌स्थान हैं जहां भगवान शिव ज्योति के रूप में प्रकट हुए थे। ये 12 ज्योतिर्लिंग भारत के विभिन्न राज्यों जैसे गुजरात, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र आदि में स्थित हैं। इन सभी ज्योतिर्लिंगों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं और उनकी उत्पत्ति के संबंध में अपनी-अपनी पौराणिक कथाएं हैं। भगवान शिव के 12 प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंगों में से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की गिनती प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में की जाती है। ‌ यह महाराष्ट्र के सौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में गिर सोमनाथ जिले में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि इसका निर्माण चंद्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख कई प्राचीन हिंदू ग्रंथों में किया गया है जिसमें ऋग्वेद वेद भी शामिल है।‌ भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों में प्रथम होने के कारण सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का अपना विशेष महत्व है और इसकी महिमा और प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई है। जिसके कारण दूर-दूर से श्रद्धालु यहां सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आते हैं।

इस मंदिर को कई बार नष्ट करने का प्रयास किया गया।यह वही मंदिर है जिसे इस्लामिक आक्रमणकारी महमूद गजनवी ने भी तोड़ने की कोशिश की थी और इसे लूटा था। लेकिन हर बार इसका पुनर्निर्माण करवाया गया। ‌ इस मंदिर के वर्तमान भवन का पुनर्निर्माण भारत की आजादी के बाद लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने शुरू कराया था और 1 दिसंबर, 1955 को भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया था।

This website uses cookies.

Read More