राजभर भारत में पायी जाने वाली एक ऐसी जाति है, जिसके स्वर्णिम इतिहास के बारे में अधिकांश लोगों को पता नहीं है. राजभर समाज के लोग भी अपने महान इतिहास को भूल चुके हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि इनके इतिहास को अन्य शासकों विशेषकर आक्रमणकारी शासकों द्वारा या तो नष्ट कर दिया गया या छिपा दिया गया. मुख्यधारा के इतिहासकारों का भी इस जाति के इतिहास के प्रति उदासीन रवैया रहा है. लेकिन राजभर समाज के बारे में अन्य साहित्य, लोककथाओं और लोकगीतों से हमें बहुत सी जानकारियां मिलती हैं जो इनके स्वर्णिम इतिहास की गवाही देती हैं. यहां हम जानेंगे कि राजभर का गोत्र कौन सा है?
परम्पराओं, उपलब्ध साहित्य और लोक कथाओं को खंगालने पर ज्ञात होता है कि राजभर जाति उत्तर भारत की महान भर जाति की एक शाखा है. ऋग्वैदिक काल से लेकर मुस्लिम शासन तक भर राजाओं की कड़ी मिलती है. इस शूरवीर जाति ने देश, धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा के लिए आक्रमणकारियों के खिलाफ कई लड़ाईयां महत्वपूर्ण लड़ी हैं, जैसे कि बहराइच का युद्ध (Battle of Bahraich). इसलिए ब्रिटिश सिविल सेवक रॉबर्ट वेन रसेल (8 अगस्त 1873 – 30 दिसंबर 1915) ने भर को महान भर जनजाति (The Great Bhar Tribe) कहा है. मुख्य बिंदु पर आने से पहले आइए एक नजर राजभर समुदाय के सामाजिक ताने-बाने और सामाजिक संरचना पर एक नजर डाल लेते हैं. उत्तर प्रदेश में भर और राजभर को पर्यायवाची माना जाता है. विलियम क्रुक के अनुसार इस जाति को भरत, भरपतवा, राजभर आदि अनेक नामों से जाना जाता है. इस समुदाय में कई बहिर्विवाही इकाइयाँ पाई जाती हैं. यह समुदाय बंगाली, मघाया, कनौजिया, भारद्वाज, राजभर आदि कई उप-जातियों और उपसमूहों में बंटा हुआ है. आइए अब इस ब्लॉग के मुख्य विषय पर आते हैं और जानते हैं कि राजभर का गोत्र कौन सा है. वैदिक साहित्य, ऐतिहासिक दस्तावेजों और पंडित पुजारियों के अनुसार भर या राजभर का गोत्र भारद्वाज है. राजभर जाति के गोत्र के बारे में अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनका उल्लेख नीचे किया जा रहा है-
•पौराणिक साहित्य, ऋग्वैदिक काल से इतिहास पढ़ने और ‘भारद्वाजव दर्शनम्’ नामक पुस्तक से पता चलता है कि इस समुदाय की उत्पत्ति भारद्वाज ऋषि से हुई है. ऐसा माना जाता है कि भारद्वाज ऋषि भरत जनजाति के थे. भर/राजभर समुदाय के लोग उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में ऋषि भारद्वाज की जयंती भी मनाते हैं.
• जब भर/राजभर परिवार में किसी भी प्रकार की पूजा, विवाह और धार्मिक अनुष्ठान होता है, तो पंडित-पुरोहितों द्वारा भर/राजभर को हमेशा भारद्वाज गोत्र का बताया जाता है.
•समुदाय के कई लोगों का मानना है कि भार/राजभर का गोत्र भारद्वाज है. उनके दावे का आधार यह है कि वे भरत जनजाति के राजभर क्षत्रिय राजा भारद्वाज के वंशज हैं.
Last updated: 13/03/2023 11:57 am
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