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भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया?

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बाबा साहब भीमराव अंबेडकर भारत माता के महान सपूतों में से एक थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बाबा साहेब अंबेडकर न केवल एक राजनीतिज्ञ थे बल्कि एक प्रोफेसर, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, अर्थशास्त्री और एक उत्कृष्ट लेखक भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज, देश और निचली जातियों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। बाबा साहब अंबेडकर ने जीवन भर सामाजिक न्याय, जातिगत भेदभाव, छुआछूत और असमानता के उन्मूलन के लिए काम किया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बाबा साहब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। इसी क्रम में यहां हम जानेंगे कि बाबा साहब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया।

बाबा साहब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म क्यों अपनाया?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि लोग धर्म परिवर्तन क्यों करते हैं। धर्मांतरण का अर्थ है एक नया धर्म अपनाना, जो परिवर्तित होने वाले व्यक्ति के धर्म से भिन्न हो। लोग कई कारणों से अलग-अलग धर्मों में परिवर्तित होते हैं, जिनमें स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन, या किसी लाभ या प्रलोभन के कारण धर्म परिवर्तन, वैवाहिक धर्म परिवर्तन, या जबरन धर्म परिवर्तन शामिल हैं। लोग स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन तब करते हैं जब उन्हें उनका मौजूदा धर्म पसंद नहीं आता है या उसमें कुछ गलत परंपराएं शामिल होती हैं जिसके कारण उन्हें सामाजिक भेदभाव उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।

बाबा साहब अंबेडकर की बात करें तो उनका जन्म एक महार परिवार में हुआ था। महार जाति को हिंदुओं में अछूत जाति माना जाता था। अछूत दलित जाति में जन्म लेने के कारण बाबा साहब का प्रारंभिक जीवन बड़ी कठिनाइयों में बीता। ‌ बाबा साहब को न सिर्फ समाज में बल्कि स्कूल में भी कई तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा। ‌ जिस स्कूल में वे पढ़ते थे, वहां उन्हें उन बर्तनों को छूने या पानी पीने की इजाजत नहीं थी, जिनसे दूसरी जाति के बच्चे पानी पीते थे। बाबा साहेब अस्पृश्यता को गुलामी से भी बदतर मानते थे और जीवन भर इसके खिलाफ लड़ते रहे। ‌ कई वर्षों तक हिंदू समाज में समानता का स्तर हासिल करने की कोशिश में असफल रहने के बाद, अंततः उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को नासिक के पास येवला में बौद्ध धर्म अपना लिया।

आइये अब इस लेख के मुख्य विषय पर आते हैं और जानते हैं कि बाबा साहेब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म हीं क्यों अपनाया। बाबा साहब अंबेडकर हिंदू धर्म के सिद्धांतों जैसे वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को जातिगत भेदभाव, शोषण और असमानता का कारण मानते थे। वे कई वर्षों तक हिंदू धर्म में सामाजिक सुधार के माध्यम से समानता के लिए संघर्ष करते रहे। ‌ लेकिन जब उनके सभी प्रयास व्यर्थ साबित हुए, तो वे निराश हो गए और यहां तक ​​कहा, “हालांकि मैं एक अछूत हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं, लेकिन मैं कभी एक हिंदू के‌ रूप में नहीं मरूंगा!”

हिंदू धर्म छोड़ने और दूसरा धर्म अपनाने का निर्णय लेने के बाद, उन्होंने इस्लाम, ईसाई धर्म, सिख धर्म और बौद्ध धर्म सहित अन्य धर्मों का गहराई से अध्ययन किया। अंबेडकर के अनुसार सच्चा धर्म वह है जिसका केंद्र मनुष्य और नैतिकता हो, जो विज्ञान या बौद्धिक तत्व पर आधारित हो, न कि धर्म का केंद्र ईश्वर, मुक्ति और आत्मा की मुक्ति हो। बाबा साहेब बौद्ध धर्म को सभी धर्मों में सर्वश्रेष्ठ और सबसे तार्किक मानते थे। बाबा साहेब अम्बेडकर का मानना था कि बौद्ध धर्म सही अर्थों में स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, प्रेम और करुणा को बढ़ावा देता है। अंबेडकर का मानना था कि बौद्ध धर्म अंधविश्वास और अलौकिकता की बजाय बुद्धि के इस्तेमाल पर अधिक जोर देता है। इसीलिए अंततः काफी विचार विमर्श के बाद बाबा साहेब अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाया था।


References:
•Cohen, Stephen P. (May 1969). “The Untouchable Soldier: Caste, Politics, and the Indian Army”. The Journal of Asian Studies. 28 (3): 460. doi:10.2307/2943173. JSTOR 2943173. S2CID 145769248.

•”डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म क्यों छोड़ा?”. Navbharat Times Reader’s Blog. 26 जून 2015. मूल से 2 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 25 अप्रैल 2019.

•https://www.aajtak.in/education/history/story/baba-bhimrao-ambedkar-converted-10-lakh-dalit-in-buddhism-tedu-466929-2017-10-14

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