Religion

चिक समाज का इतिहास, चिक की उत्पति कैसे हुई?

Share
Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।

चिक (Chik) भारत में पाया जाने वाला एक मुस्लिम जाति समुदाय है. इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे-बकर कसाब (Bakar Qassab), बुज़ कसाब  (Buz Qassab) और चिकवा (Chikwa). उत्तर प्रदेश में अक्सर इन्हें बकर कसाब या बुज़ कसाब के रूप में जाना जाता है.पारंपरिक रूप से यह बकरी का वध करने और मांस बेचने के व्यवसाय में शामिल रहे हैं. इसी से इनका जीवन यापन होता है. इस समुदाय के लोग आज भी जीवन यापन के लिए मांस बेचने के अपने पुश्तैनी व्यवसाय पर निर्भर हैं. हालांकि, इनमें से कई अब छोटे-मोटे व्यापार और दूसरे व्यवसाय भी करने लगे हैं. उत्तर प्रदेश के चिक मांस और खाल के व्यापार में शामिल हैं. इनमें से कई अब टेनरियों (Tanneries) के मालिक हैं. इनमें से कुछ अब परिवहन व्यवसाय (Transportation Business) भी करने लगे हैं. आइए जानते हैं चिक समाज का इतिहास, चिक की उत्पति कैसे हुई?

चिक समाज एक परिचय

भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था आरक्षण (Reservation) के अंतर्गत इन्हें बिहार और उत्तर प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Class, OBC) का दर्जा दिया गया है. भारत के अलावा, पाकिस्तान में भी इनकी आबादी है. भारत में यह मुख्य रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश राज्यों में पाए जाते हैं. उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से रोहिलखंड (Rohilkhand) और अवध (Awadh) क्षेत्र में निवास करते हैं. रोहिलखंड के बरेली, बिजनौर, बदायूं और शाहजहांपुर जिलों में इनकी अच्छी खासी आबादी है. अवध क्षेत्र की बात करें तो यह मुख्य रूप से लखनऊ, खीरी, उन्नाव और हरदोई जिलों में पाए जाते हैं. बिहार में यह पूरे राज्य में पाए जाते हैं, और यहां यह सबसे व्यापक मुस्लिम समूहों में से एक हैं. धार्मिक रूप से चिक एक सुन्नी मुसलमान समुदाय है. उत्तर प्रदेश के चिक सख्ती से अंतर्विवाही (endogamous) हैं और करीबी रिश्तेदारों से शादी करने की एक उल्लेखनीय प्राथमिकता है. जबकि बिहार में निवास करने वाले चिक और कसाब समुदाय के बीच विवाह संबंध है. हिंदी, उर्दू, अवधी और खड़ी बोली बोलते हैं.

चिक  समाज की उत्पत्ति कैसे हुई?

बकर शब्द की उत्पत्ति उर्दू  बकरा से हुई है. इस तरह से बकर कसाब का शाब्दिक अर्थ होता है- “मटन कसाई (mutton butcher)”.इनकी उत्पत्ति के बारे में अनेक मान्यताएं हैं, इसके बारे में विस्तार से नीचे बताया जा रहा है.

1. इस समुदाय के लोग कुरैशी अरबों (Qureshi Arabs) के वंशज होने का दावा करते हैं. कुरैशी अरबों के बारे में कहा जाता है कि वह प्रारंभिक मध्य युग में भारत आए थे.

2. दूसरी मान्यता के अनुसार, इस समुदाय के अधिकांश सदस्यों का संबंध मूल रूप से हिंदू चिकवा जनजाति (Hindu Chikwa Tribe) से है, जो धर्म परिवर्तित मुसलमान बन गए. कालांतर में उन्हें मुस्लिम चिक या चिकवा जाति के रूप में जाना जाने लगा.

3.एक अन्य मान्यता के अनुसार, यह दक्षिण एशिया में पाए जाने वाले के बृहद कसाब समुदाय (Qassab community) का हिस्सा हैं. कसाब समुदाय अनेक उप जातियों में विभाजित है. चिक कसाब समुदाय के भीतर एक उप-समूह हैं. बता दें कि चिक बकरियों का वध मे करने में माहिर होते हैं, जबकि कसाब बड़े जानवरों जैसे भैंस आदि का वध करने में विशेषज्ञ हैं.


लेख सुधार: 

छत्तीसगढ़ से एक पाठक हमें कुछ सुझाव दिए हैं: वे लिखते हैं-

महोदय ,
आपने चीक मुसलमान के बारे में विस्तार से लिखा है किन्तु छत्तीसगढ़ में निवासरत चीक जाति के बारे में स्पष्ठ नही किया है .
Census of india 1931 central province and berar vol – XII part – 1 page -425
को पढ़े और आपके लेख में सुधार करें ।
Jashpur के चीक hindu है और जिनका परपरागत कार्य कपड़ा बुनना है ।
इस लेख के बाद हमें लोग मुसलमान समझने लगेंगे , कृपया इसे जल्द से जल्द सुधार कर लें।
झरखण्ड में चीक जाति को चीक baraike कहा जाता है ।

उन्होंने हमें Chik समाज पर ज्यादा जानकारी देते हुए लिखा है-( उन्हीं के शब्दों में)

“चिक/चीक जाति एक निग्रेटो प्रकार का द्रविड़ियन जनजाति है . जिनका निवास छग के उत्तर पूर्व में जशपुर , सरगुजा , बलरामपुर , सूरजपुर एवं कोरिया जिले में है .इनका परम्परागत कार्य कपडा बुनना है .किन्तु वर्तमान में कृषि , मजदूरी एवं अन्य कार्य करते है .झारखण्ड में चिक जाति को चिक बड़ाईक के नाम से जाना जाता है . ब्रिटीश काल में छग के 5 जिले एवं झारखण्ड के लोहरदगा , सिंह भूम , मानभूम , पलामू एवं रांची मिलाकर छोटा नागपुर का पठार कहा जाता था . इस प्रकार छोटा नागपुर का पठार ही चिक जाति का मूल निवास स्थान रहा है .

इस जाति की जनसँख्या छग में लगभग 2.50 से 3 लाख के बीच है . चिक जाति की सर्वाधिक जनसँख्या जशपुर जिले में है .चिक जाति अपने आप को हिन्दू कहते है लेकिन जनेऊ का धारण नही करते .अपने पूर्वजों की पूजा करते है .गाँव का बैगा उनकी ओर से महादेव की पूजा करता है .कई तरह के मांस का सेवन करते है किन्तु गाय ,चूहा , सांप , बिल्ली और बन्दर का नही करते है .

चिक जाति का विवाह संस्कार एवं परम्परा जिले में निवासरत दिहारी कोरवा ,रौतिया एवं उरांव जनजाति के समान है .इनके गोत्र प्रकृति पर आधारित है .समगोत्र विवाह वर्जित है .

सिर उत्तर व् पैर दक्षिण एवं पीठ के बल लिटाकर शव का दफनाया जाता है .मृत्यु के 5 से 10 दिन के बाद मृत्यु भोज कराया जाता है .


 

Last updated: 05/04/2023 11:56 am

View Comments

  • वे कौन से धर्म ग्रन्थ हैं जिनके आधार पर यह लेख प्रकाशित किया गया है ? उन सभी धर्म ग्रन्थों के नाम, पृष्ठ संख्या, पृष्ठों की कॉपी क्या आपके पास उपलब्ध है ? यदि हाँ तो कृपया नीचे दी गए मेल एड्रेस पर उन्हें प्रेषित करने का कष्ट करें. आपत्ति यह है कि खटिक और चिक दोनों के बारे में किसी भी धर्म ग्रन्थ में कोई उल्लेख नहीं है. यदि है तो कृपया उनकी कॉपी सहित प्रमाण प्रस्तुत करने का कष्ट करें. आभारी रहूँगा .... धन्यवाद .... शुभकामनाएं ...... !

This website uses cookies.

Read More