Ranjeet Bhartiya 27/11/2021
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Last Updated on 28/06/2023 by Sarvan Kumar

खरवार (Kharwar) भारत में पाई जाने वाली एक प्राचीन जाति है. यह सूर्यवंशी होते हैं, इसीलिए इन्हें सूर्यवंशी क्षत्रिय खरवार भी कहा जाता है. इन्हें खड़गवंशी भी कहा जाता है. इनकी अर्थव्यवस्था और जीविका कृषि, पशुपालन, मछली पकड़ने, शिकार और वन गतिविधियों पर आधारित है.

झारखंडमें इन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe, ST) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में इन्हें अनुसूचित जनजाति, जबकि अन्य जिलों में अनुसूचित जाति (Scheduled Caste, SC) का दर्जा प्राप्त है. मुख्य रूप से यह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में निवास करते हैं. यह हिंदू धर्म का अनुपालन करते हैं. खरवार समाज 6 अंतर्विवाही उप समूहों में विभाजित है- सूरजबंशी, दौलत बंदी, परबंद, खरिया भोगती और मौझिया.यह हिंदी, नागपुरी (सादरी) और भोजपुरी भाषा बोलते हैं.आइये जानते हैैं खरवार जनजाति का इतिहास, खरवार शब्द की उत्पति कैसे हुई?

खरवार जनजाति का इतिहास

इनकी उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मान्यताएं हैं. कुछ मूल रूप से झारखंड के पलामू में रहते थे, तो आने सोन घाटी में निवास करते थे. उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले खरवार समाज के लोग रोहतास से आने और पौराणिक सूर्यवंश के वंशज होने का दावा करते हैं. Sir Herbert Hope Risley (1891) ने छोटानागपुर में निवास करने वाले के खरवार में बनिया,  बहेरा, बेल (एगल मार्मेलोस), बैर (बेरी), बामरिया, बांदिया और अन्य कुलो का उल्लेख किया है. उनके अनुसार, पलामू खरवार में पट बंद, दलबंध और खैरी उप जनजातियां हैं. जबकि दक्षिणी लोहरदगा में समुदाय में देशमारी, खरवार, भगता, राउत और मांझिया उप जनजातियां हैं. यह खुद को क्षत्रिय मानते हैं, अक्सर खुद को अट्ठारहहजारी मानते हैं और सूरजवंशी राजपूत के वंशज होने का दावा करते हैं. इनका इतिहास अति प्राचीन और गौरवशाली है. इसका प्रमाण रोहतास में स्थित प्राचीन रोहताश्व किला हैं जो खरवार राजाओं की एक प्राचीन धरोहर है.

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