जाति-व्यवस्था एक अत्यंत हीं जटिल सामाजिक व्यवस्था है और पूरे भारत में अलग तरह से कार्य करती है. भारत में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न सिद्धांत हैं. धार्मिक सिद्धांत के अनुसार, वर्ण ब्रह्मांड के निर्माता ब्रह्मा के शरीर से बने थे, जो बाद में बड़ी संख्या में जातियों में विभाजित हो गए. सामाजिक ऐतिहासिक सिद्धांत के अनुसार, जाति व्यवस्था की उत्पत्ति भारत में आर्यों के आगमन से हुई. भारत में मिश्रित मूल की कई जातियां हैं जो अपने उत्पत्ति की अनूठी और रोचक कहानी प्रस्तुत करती हैं. इसी क्रम में जानते हैं ‘यादव-जाटव’ के बारे में.
‘यादव-जाटव’ मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और इससे सटे राजस्थान के हिस्सों में पाए जाते हैं. भारतीय हिंदू जाटव महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दलित चिंतक शांत प्रकाश जाटव के अनुसार, जाटव भी यादव और राजपूत ही हैं. यादवाें और राजपूताें में से ही कुछ लाेग निकलकर जाटव बने. अर्थात, यादवाें और राजपूताें से कनवर्ट हाेकर ही जाटव जाति बनी है और जाटव यादवों और राजपूतों के अंश हैं. इस कथन के समर्थन में शांत प्रकाश जाटव कहते हैं कि जहाँ जाटवों की बस्ती होगी, वहाँ यादवों की बस्ती नहीं मिलेगी. यहां यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि राजपूत अपेक्षाकृत नया शब्द है जबकि यादव वैदिक क्षत्रिय हैं. ये दोनों समुदाय अपनी वीरता और मार्शल गुणों के लिए जाने जाते हैं और दोनों ही योद्धा जातियों के रूप में पहचाने जाते हैं. यहां पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या जाटव समुदाय में मार्शल गुण है या नहीं?
जाटव चमार जाति समूह के महत्वपूर्ण घटकों में से एक है. चमार का सैन्य सेवा का इतिहास रहा है. कई चमार परिवार क्षत्रिय समुदायों के वंशज होने का दावा करते हैं. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विभिन्न रैंकों पर ब्रिटिश भारतीय सेना में कई चमारों की भर्ती की गई थी. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चमार रेजिमेंट का गठन किया गया था, और चमार रेजिमेंट के बहादुर लड़ाकू ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था जो कि इतिहास के किताबों में स्वर्णाक्षर में अंकित है. इससे पता चलता है कि अंग्रेजों ने इस समुदाय में लड़ाकू प्रवृत्ति अवश्य देखा होगा और स्पष्ट रूप से चमार और जाटव आदि में मार्शल गुण है.
जाटव समुदाय के लोग बहुत पहले से क्षत्रिय होने का दावा करने लगे थे. देश की आजादी से पूर्व चमारों की पहचान को लेकर एक बड़ा महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुआ था. आगरा के चमारों ने खुद को यदुवंशी यादव-जाटव कहा था. आगरा के कुछ चमार आर्यसमाज में जाकर अपनी पहचान यदुवंशी क्षत्रियों से जोड़ रहे थे. साल 1929 में ‘यादव जीवन’ और 1942 में ‘यदुवंश का इतिहास’ नामक दो किताबें लिखी गयी थीं. इन किताबों के द्वारा यह साबित करने का प्रयास किया गया था कि हम चमार नहीं हैं, जाटव हैं और हम मूल रूप से हमारा मूल यदुवंशी क्षत्रिय है. अर्थात, हम यादव का पर्याय हैं. जाटव बने चमार चमारों और निम्न जातियों से दूरी बनाने लगे. लेकिन इससे एक दूसरी समस्या उत्पन्न हो गई. लोग सवाल उठाने लगे कि जाटव यदि क्षत्रिय हैं और इनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता तो इन्हें किसी प्रकार के आरक्षण देने की क्या जरूरत है? जाटवों को आरक्षण देने के लिए तैयार की जा रही सूची से बाहर कर दिया गया, फिर आगरा के चमार नेताओं ने सरकार के सामने एक आवेदन पेश किया, सबूत इकट्ठा किए और साबित किया कि जाटव वास्तव में मूल रूप से चमार हैं. वे सम्मान पाने के लिए क्षत्रिय बनना चाहते हैं. चमार मूल के आधार पर जाटव को चमार के पर्यायवाची के रूप में दर्ज किया गया, जो आज भी कानूनी रूप से प्रासंगिक है.
निष्कर्ष:
हमारा मानना है कि आरक्षण के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन सी जाति क्षत्रिय है और कौन सी नहीं। इसलिए इस दिशा में और शोध की जरूरत है.
References:
•चमार की चाय
By Śyorājasiṃha Becaina · 2017
•समकालीन हिंदी पत्रकारिता में दलित उवाच
By श्यौराजसिंह बेचैन · 2007
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