Ranjeet Bhartiya 04/10/2018
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Last Updated on 29/08/2020 by Sarvan Kumar

धर्म क्या है,इसको इस कहानी से समझने का प्रयास करते  है : काफी समय पहले की बात है. एक गांव में 6 अन्धे रहते थे.एक दिन उनके गांव में एक हाथी आया. हाथी बहुत विशाल था.उसके चार भारी स्तंभ जैसे बड़े पैर, एक मोटी और काफी लम्बी सुंड, दो लंबे दांत , सूप जैसे कान, एक बहुत बड़ा उदर और एक पूंछ था.
उन्होंने इससे पहले कभी हाथी नहीं देखा था.उनके मन में जिज्ञासा हुयी कि हाथी कैसा होता है.उन्होंने आपस में विचार किया और निर्णय लिया कि चल कर हाथी को देखा जाये. वे  महावत से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें हाथी को छूकर देखने की अनुमति दे. काफी अनुरोध करने पर महावत ने उन्हें हाथी को छूकर देखने की अनुमति दे दी. उन्होंने छूकर उस विशालकाय जीव को स्पर्श करके जानने  का पूरा प्रयत्न किया. लेकिन उनमे में कोई भी 10 फीट ऊँचे हाथी के पूर्ण स्वरुप को पूरी तरह नहीं समझ पाया और वो सब एक-एक अंग के साथ ही चिपके रहे.बाद में वो सभी एक जगह इकट्ठा हुए और हाथी के बारे में अपने-अपने अनुभवों की चर्चा करने लगे.

क्या थे उन 6 लोगों का अनुभव

पहला बोला, ‘आज मुझे पता लगा कि हाथी एक बहुत बड़े खम्भे की तरह होता है’ क्योंकि वह हाथी के पैर के साथ चिपटा हुआ था दूसरा जोकि हाथी के सुंड को पकड़े हुए था , तपाक से बोला, ‘अरे मूर्ख! हाथी तो एक मोटे रस्से की तरह होता है. तीसरा तुरंत बोला, ‘तुम दोनों ही मुर्ख हो! हाथी तो मोटे तलवार की तरह होता है ‘ वह हाथी के दांत को पकड़े हुआ था. चौथा बोला, ‘तुम तीनों ही पागल हो हाथी तो बहुत बड़े सूप की तरह होता है’, क्योंकि वह हाथी के कान को पकड़े हुआ था.” पांचवां बोला , ‘तुम चारों ही बेवकूफ़ हो. हाथी एक लचकदार झाड़ू की तरह होता है’ क्योंकि ये श्रीमान हाथी की पूंछ से लटके हुये थे. छठा बोला, ‘तुम पांचों के पांचों पागल हो. हाथी तो एक बहुत बड़े  ढोल की तरह होता है. ये महानुभाव हाथी के उदर से लिपटे हुए थे.

धर्म क्या है?

“धर्म सचमुच एक हाथी की तरह है और हम सब उन छह अंधों की तरह हैं. हम अपने-अपने पंथ को चिपक कर आँख मूंद के बैठे हुए हैं. हमने यह मान लिया है की जितना हम जानते हैं वही पूर्ण ज्ञान है. इससे ज़्यादा जानने-समझने की ज़रूरत ही नहीं है. धार्मिक कट्टरता यहीं से शुरू होती है!” फिर हम एक दूसरे के धर्म या मजहब के अच्छी बातों को सीखने के बजाय एक दूसरे के धर्म को गलत और नीचा दिखाने लगते हैं. दूसरे धर्म वालों को कमतर दिखाने का प्रयास करने में लग जाते हैं. हम धर्म से दूर चले जाते हैं. हम धर्म या मजहब के नाम पर अधर्म करने लगते हैं. फिर धर्म और मज़हब में संघर्ष शुरू हो जाता है. लेकिन इस संघर्ष का धर्म -मज़हब या मानवता- इंसानियत से कोई लेना नहीं होता. ये संघर्ष धर्म का नहीं रह जाता. यह संघर्ष केवल और केवल धार्मिक (पंथ विशेष) के वर्चस्व का रह जाता है. इसी वर्चस्ववाद से जन्म लेता है जातिवाद, संप्रदायवाद और आतकवाद!

धर्म , मजहब और RELIGION के मतलब

धर्म का मतलब 

धर्म शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘धृ’ धातु से हुई है जिसका मतलब होता है- स्वभावत: धारण करना, आलंबन देना, पालन करना. धारण करने योग्य आचरण धर्म है. शास्त्रों और पुराणों के अनुसार धर्म जीव का जन्म और मरण के बंधन से मुक्ति पाकर मोक्ष को प्राप्त करने का मार्ग है. मायासम्बन्ध से रहित होकर अपने शुद्ध ब्रह्मस्वरूप का बोध प्राप्त करना मोक्ष है. आत्मा, जो ब्रह्मस्वरूप है, उसका साक्षात्कार हो जाना मोक्ष है. मृत्यूपरांत आत्मा का ब्रह्म में विलीन हो जाना , ईश्वर का सान्निध्य ही मोक्ष है. धर्म मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग है.

मजहब का मतलब

मजहब का मतलब बताते हुए एक मुस्लिम भाई ने बताया , मजहब
म : मन के अन्दर
ज : जन { इंसान } जन के अन्दर
ह : हर दिल में बसे
ब : बसनेवाले परम तत्व परमात्मा को पहचानना

RELIGION के मतलब

धर्म/ मजहब को अंग्रेजी में “RELIGION” कहते हैं. RELIGION शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द “RELIGARE” से हुयी है. RELIGARE” दो शब्दों से बना है- “RE ” और “LIGARE ” . “RE ” का मतलब होता है “BACK” अर्थात फिर से. “LIGARE ” मतलब होता है “BIND” अर्थात बांधना. इस तरह से RELIGION का मतलब होता है जो आत्मा को परमात्मा /ईश्वर से बांध दे.
हम देख सकते हैं धर्म, मजहब या रिलिजन का एक ही लक्ष्य है.

धर्म सार्वभौमिक और सार्वकालिक होता है

धर्म सार्वभौमिक होता है. इसमें  देश, रंग रूप की कोई बाधा नहीं है. सभी पदार्थ, जीव और मानव का धर्म  एक ही होता है. ये  सार्वकालिक होता है. इसका स्वरुप प्रत्येक काल में- युग में एक ही रहता है जो कभी नहीं बदलता.

हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं. “सम्प्रदाय” एक परम्परा के मानने वाले लोगों का समूह है.

साधारण शब्दों में धर्म क्या है?

धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि. ये सभी बातें सार्वभौमिक और सार्वकालिक हैं.

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