Ranjeet Bhartiya 26/01/2019

मायावती किस जाति की है, क्या वह दलित हिंदू है या उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया है ? मायावती और उनके  समर्थक अंबेडकर को मानते हैं पर अंबेडकर दलित  से बौद्ध बन गए थे. तो क्या मजबूरी है कि मायावती अभी तक अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया है. आइए जानते हैं इन सब प्रश्नों का सही उत्तर.

बौद्ध परंपराओं की रही समर्थक

2006 में कांशीराम के अंत्येष्टि समारोह के दौरान मायावती ने कहा था .  “वो और कांशीराम बौद्ध परंपराओं और रीति-रिवाजों को पालन करते हैं.” उन्होंने आधिकारिक रूप से धर्म बदलने का इरादा भी जाहिर किया था. उन्होंने कहा था जब राजनीतिक परिस्थितियां उन्हें भारत के प्रधानमंत्री बनने में सक्षम बना देंगी तब आधिकारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगी2017 में बहुजन समाजवादी पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने हिंदू धर्म छोड़ने की धमकी दी.

मायावती ने कहा कि अगर आरएसएस और बीजेपी दलित और पिछड़े वर्ग पर अत्याचार नहीं रोकते तो वो अपने करोड़ों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपना लेंगी.1935 में. नागपुर की एक सभा को संबोधित करते हुए मायावती ने भीमराव अंबेडकर के कहे बातों को याद दिलाया . अंबेडकर ने कहा था उनका जन्म एक हिंदू के रूप में हुआ है लेकिन जब दुनिया से जाएंगे तो एक हिंदू के रूप में नहीं जाएंगे.अंबेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और गुरुओं को हिंदू धर्म में सुधार के लिए 21 साल का समय दिया था.

बौद्ध धर्म अपनाने से किया इनकार

मायावती ने यू-टर्न लेते हुए बौद्ध धर्म अपनाने से इनकार कर दिया. आइए जाने इसके पीछे की असली वजह क्या है? इसके लिए आपको बाबा भीमराव अंबेडकर को समझना होगा.

छुआछूत से आहत भीमराव अंबेडकर

अंबेडकर समाज में व्याप्त छुआछूत के विरुद्ध दलितों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे. अंबेडकर गौतम बुध, संत कबीर और महात्मा ज्योतिबा फुले के विचारों से काफी प्रभावित रहे. अंबेडकर छुआछूत को गुलामी से भी बदतर मानते थे.उन्होंने छुआछूत के खिलाफ आंदोलन, सत्याग्रह और जुलूस के जरिये अछूतों को मंदिर में प्रवेश दिलाने के लिए संघर्ष किया. अंबेडकर का मानना था कि प्राचीन हिंदू ग्रंथ जैसे मनुस्मृति जातीय भेदभाव, जातिवाद और छुआछूत को बढ़ावा देते हैं. उन्होंने इसके विरुद्ध मनुस्मृति की प्रतियां भी जलाई.

हिंदू धर्म को अंबेडकर  समझ नहीं पाये

समाज में व्याप्त छुआछूत के कारण अंबेडकर ने खुलकर हिंदू धर्म की आलोचना की. साथ ही अंबेडकर दूसरे धर्म में व्याप्त कुरीतियों की भी आलोचना करते रहे. छुआछूत मिटाने के लिए , दलितों , अछूतों को समता और सम्मान दिलाने के लिए अंबेडकर लगभग 12 सालों तक प्रयास करते रहे .लेकिन ऊंची जाति वालों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. अंबेडकर का मजाक उड़ाया गया और उन्हें हिंदू धर्म को बदनाम करने वाला धर्म विनाशक बताया गया.हिंदू समाज में सकारात्मक बदलाव ना आता देख अंबेडकर ने मान लिया कि हिंदू समाज में समानता का कोई स्थान नहीं है.

दलित हिन्दू से बने बौद्ध 

13 अक्टूबर 1935 को अंबेडकर ने नासिक में धर्म परिवर्तन करने की घोषणा कर दी. धर्म परिवर्तन की घोषणा के बाद अगले 21 वर्षों तक अंबेडकर विश्व के सभी प्रमुख धर्मों का अध्ययन करते रहे. अंबेडकर बौद्ध धर्म के तीन सिद्धांतों: प्रज्ञा ( अंधविश्वास के विरुद्ध बुद्धि का प्रयोग), करुणा (प्रेम) और समता (समानता) से काफी प्रभावित हुए. 14 अक्टूबर 1956 को महाराष्ट्र के नागपुर में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने 500000 समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया.

वो 22 प्रतिज्ञायें  जिसे मानना था प्रत्येक अंबेडकर समर्थक को

1.इस अवसर पर उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने वाले अपने समर्थकों को 22 प्रतिज्ञा करवाई. जिसमें से प्रमुख प्रतिज्ञा हैं.

2.ब्रह्मा विष्णु और महेश में विश्वास नहीं करूंगा, ना ही मैं उनकी पूजा करूंगा.

3.राम और कृष्ण ,जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में आस्था नहीं रखूँगा और ना ही उनकी पूजा करूंगा.

4.गौरी गणपति और हिंदुओं के अन्य देवी देवताओं में आस्था नहीं रखूंगा, ना मैं उनकी पूजा करूंगा.

5.भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूं.

6.मैं यह नहीं मानता , ना ही कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार प्रसार मानता हूं.

7. ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूंगा.

8.मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूं जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है. मैं स्वयं स्वधर्म के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूं क्योंकि यह समानता पर आधारित है.

9. मैं विश्वास करता हूं बौद्ध ही धर्म सच्चा धर्म है.

10.अंबेडकर के विरासत का असली अधिकारी वही होगा जो ऊपर लिखे गए बातों का समर्थन करेगा.

मायावती का ‘तिलक, तराजू और तलवार- इनको मारो जूते चार’ से ‘हाथी नहीं गणेश है; ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक का सफर

मायावती ने दलितों को जोड़ने के लिए नारा दिया था- ‘तिलक ,तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार. यहां पर तिलक का मतलब है ब्राह्मण, तराजू का बनिया और तलवार का क्षत्रिय. इस नारे का प्रभाव यह हुआ कि मायावती के हाथ से हिंदू वोट खिसक गया. 2002 के विधान सभा चुनाव में दलित (और मुस्लिम) वोटों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने के कारण मायावती को केवल 98 सीटें मिलीं.मायावती समझ गयी केवल दलित वोटों से सत्ता के शिखर पर नहीं पहुंचा जा सकता. सत्ता का सफर हिन्दू वोटों के गलियारे से गुजरता है.

हालत को समझते हुए मायावती ने नारा ही बदल दिया! उन्होंने नया नारा दिया- हाथी नहीं गणेश है-ब्रह्मा, विष्णु, महेश है.रणनीति में किए गए इस बदलाव के कारण मायावती को 2007 के विधानसभा चुनाव में 403 में से 206 सीटें मिली. मायावती के जीत में हिंदू वोटों का बहुत बड़ा योगदान रहा.केवल इतना ही नहीं अपनी अपनी रणनीति में बदलाव का परिचय देते हुए मायावती ने 2019 में 10% आरक्षण का भी समर्थन किया.

मजबूरीयां जिसकी वजह से मायावती बौद्ध धर्म अपनाने से कर रही  इंकार

1.अगर मायावती बौद्ध धर्म अपना लेती हैं तो उन्हें डर है वो गैर-दलित हिंदू ओबीसी और स्वर्ण वोट खो देंगी.

2 मायावती जानती हैं कि केवल उत्तर प्रदेश में हीं 90% दलित अपनी स्वेच्छा से हिंदू धर्म में ही बने हुए हैं.

3.तीसरी वजह है आईडेंटिटी पॉलिटिक्स. अगर मायावती बौद्ध धर्म अपना लेती है तो वह अपना दलित पहचान खो देंगी. दलितों के नाम पर वोट बैंक कैसे मजबूत किया जा सकता है. दलित पॉलिटिक्स के लिए दलित होना ज़रूरी है.

4.जातिवाद का स्रोत होने के चलते अंबेडकर ने जिस मनुस्मृति को जलाया था. दलितों का अस्तित्व वहीं से है. अगर तथाकथित मनुवाद नहीं होगा तो फिर दलितवाद भी नहीं चलेगा.

5.वक्त के साथ छुआछूत और जातिवाद का प्रभाव बहुत कम होने के कारण और दलितों के शैक्षिक आर्थिक और सामाजिक स्तर में परिवर्तन होने लगा. दलित सशक्त होने लगे जिसके कारण भी दलित राजनीति पर प्रभाव पड़ा.

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