Ranjeet Bhartiya 17/01/2019

लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे.उन्हे सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री के रुप में जाना जाता है.वे निडर थे.एक बार उन्हे नदी पार करना था और उनके पास पैसे नहीं थे.नदी पार करने के लिए वे उफनती नदी में कूद गए थे.उस समय पूरा देश शोक में डूब गया था जब उनकी असामयिक मृत्यू  ताशकंद में हो गया था.आइए जानते है लाल बहादुर शास्त्री की 15 अनकही बातें.

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परिवार में सबसे छोटा होने के कारण परिवार वाले प्यार से शास्त्री जी को नन्हे कहकर बुलाया करते थे.

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उन दिनों उर्दू या पर्शियन अधिकारिक भाषा हुआ करती थी. इसीलिए उर्दू सीखना बहुत जरूरी हुआ करता था.तब शास्त्री  तीन-चार साल के रहे होंगे.उन्होंने अपने पहले शिक्षक बुधन मियां से उर्दू सीखना शुरू किया.

 3.श्रीवास्तव से बने शास्त्री

शास्त्री जी कायस्थ परिवार से आते थे. उनके पिता का नाम मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव था. काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने अपने नाम से जाति सूचक शब्द ‘श्रीवास्तव’ हमेशा के लिए हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया.

4.स्कूल में जगी देशभक्ति की भावना

शास्त्री जी का परिवार राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं था. स्वतंत्रता आंदोलन मे शास्त्री जी का परिवार भाग नहीं लेता था. शास्त्री जी की स्कूली शिक्षा हरिश्चंद्र स्कूल से हुई. स्कूल का माहौल राष्ट्रवादी था.स्कूल में एक शिक्षक हुआ करते थे जिनका नाम था निसकामेश्वर प्रसाद मिश्रा. मिश्रा जी का बहुत आदर था.
मिश्रा जी के देशभक्ति से प्रभावित होकर लाल बहादुर शास्त्री आजादी के आंदोलन में दिलचस्पी लेने लगे.

5.बचपन में ही जाना पड़ा जेल

बात 1921 के जनवरी महीने की है. शास्त्री जी उस वक्त दसवीं क्लास में पढ़ते थे. कुछ महीनों बाद फाइनल वार्षिक परीक्षा होने वाली थी. शास्त्री जी बनारस में गांधी जी और मदन मोहन मालवीय की एक रैली में शामिल हुए. महात्मा गांधी ने छात्रों से अपील किया कि वह स्कूल और कॉलेज छोड़कर के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले. गांधी जी के आह्वान पर शास्त्री जी ने अगले दिन ही हरिश्चंद्र स्कूल छोड़ दिया. वह कांग्रेस के लोकल शाखा में जाकर कार्यकर्ता बन गए और वह बढ़-चढ़कर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने लगे. जल्दी ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और जेल में डाल दिया गया. लेकिन नाबालिग होने के चलते उन्हें छोड़ दिया गया.

6.’करो या मरो’ नारा को बदला ‘मरो नहीं मारो’ मेंं

द्वितीय विश्व युद्ध में  इंग्लैंड बुरी तरह से उलझने लगा . गांधी जी ने इस अवसर को पहचाना . 8 अगस्त 1942 को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ का नारा दिया.शास्त्री जी 9 अगस्त 1942 को इलाहाबाद पहुंचे.  गांधीवादी नारे को बड़ी चालाकी से ‘मरो नहीं मारो’ में बदल दिया. जिसके चलते क्रांति की अग्नि और प्रचंड हो गई.

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शास्त्री जी के जीवन पर कई लोगों का प्रभाव रहा. लेकिन तीन नेताओं का उनके जीवन पर काफी  प्रभाव था. ये थे पुरुषोत्तम दास टंडन, गोविंद बल्लभ पंत और जवाहरलाल नेहरू.

8.पहली बार की महिला कंडक्टर नियुक्ति

लाल बहादुर शास्त्री उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में शामिल थे. उन्हें पुलिस एवं परिवहन मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया था. उन्होंने पहली बार महिला कंडक्टर की नियुक्ति की थी.

9.पानी के बौछार का इस्तेमाल की शुरूआत करवाया

शास्त्री जी को बाद में पुलिस मंत्री बनाया गया था. उन्होंने भीड़ नियंत्रण के लिए लाठी की जगह पानी के बौछार का इस्तेमाल का शुरूआत करवाया था.

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लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने में तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के. कामराज का बहुत बड़ा योगदान था.

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27 मई 1964 को नेहरू की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री पद के मुख्य दो दावेदार थे .एक लाल बहादुर शास्त्री और  दूसरे मोरारजी देसाई.मोरारजी देसाई की छवि एक कंजरवेटिव दक्षिणपंथी नेता के रूप में थी.पार्टी के कई लोग मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहते थे.ऐसे में मृदुभाषी और ईमानदार छवि के शास्त्री जी का नाम आगे कर करके उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया.

12.हिंदी विरोधी आंदोलन का शांत किया

शास्त्री जी के कार्यकाल के दौरान 1965 में मद्रास में हिंदी विरोधी आंदोलन शुरू हो गए.सरकार काफी वर्षों से प्रयास कर रही थी कि पूरे भारतवर्ष में हिंदी को एक राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित किया जाये .हालात की गंभीरता को देखते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने गैर हिंदी राज्यों को भरोसा दिलाया .इन राज्यों में अंग्रेजी तब तक आधिकारिक भाषा बनी रहेगी जब तक वह चाहेंगे. इसके बाद वह आंदोलन शांत हो गया.

13.नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की स्थापना

शास्त्री जी ने नेहरू के समाजवादी आर्थिक नीतियों को  ज्यादा जोर नहीं  दिया.देश में दूध के प्रोडक्शन को बढ़ाने के लिए सफेद क्रांति का बढ़ावा दिया.उन्होंने अमूल मिल्क कोऑपरेटिव गुजरात को मदद दिया और नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की स्थापना की.

14.गरीबी और भुखमरी की समस्या  का अनोखा निदान शास्त्री व्रत

शास्त्री व्रत-
देश आजाद हुए लगभग 18 साल बीत चुके थे.देश के लिए गरीबी और भुखमरी की समस्या गंभीर होती जा रही थी. गरीबों को भूखे पेट सोना पड़ रहा था. भुखमरी की समस्या देखते हुए शास्त्री जी ने देश की जनता से एक अपील किया .वह सप्ताह में एक वक्त का खाना ना खाएं और उपवास रखें . बचा हुआ खाना उन लोगों तक पहुंचाया जा सके जिनके पास खाने को नहीं है.शास्त्री जी के इस अपील का देश पर व्यापक प्रभाव पड़ा. रेस्टोरेंट और होटल भी सोमवार के शाम को बंद कर दिए जाते थे. देश के कई भागों में लोगों ने सप्ताह में एक शाम खाना बंद कर दिया था.इसे वह शास्त्री व्रत कहते थे.

15.निवास पर लॉन में खेती

देश के लोगों का पेट भरा जा सके और वह भूखे ना सोए इसके लिए जरूरी था की पैदावार को बढ़ाया जाए.
लोगों को खाद्य सामग्री उपजाने के लिए प्रेरित करने के लिए शास्त्री जी ने दिल्ली स्थित अपने निवास पर लॉन में खेती करना शुरू कर दिया था.

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