Ranjeet Bhartiya 07/10/2021

कहार भारत में पाई जाने वाली एक हिंदू जाति है. इनका इतिहास प्राचीन और गौरवशाली है. यह खुद को कश्यप ऋषि और सप्तऋषियों का वंशज होने का दावा करते हैं. कश्यप ऋषि मरीचि के पुत्र थे. ऐसी मान्यता है कि मरीचि से ही सारे देवताओं और असुरों की उत्पत्ति हुई है. कहार एक बहादुर और साहसी जाति है. पारंपरिक रूप से यह जाति अपने जीवन यापन के लिए प्राचीन काल से ही डोली या पालकी उठाने और उसकी रक्षा करने का कार्य करती आई है. इन्हें गोंड, गौड़, धुरिया कहार, मेहरा, भोई, चंद्रवंशी क्षत्रिय कहार आदि नामों से भी जाना जाता है. कहार जाति के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि पुराने समय में जब डाकुओं का प्रचलन जोरों पर था. ये डाकू रास्ते में दुल्हन की डोली और गहने जेवर लूट लिया करते थे. डोली की रक्षा के लिए कहर दल का गठन किया गया था जो दुल्हन की डोली को सुरक्षित अपने गंतव्य पर पहुंचाते थे. इनके पूर्वज विकट परिस्थितियों में जान पर खेलकर राज परिवार के बहू- बेटियों को डोली में बिठाकर, जंगलों और बीहड़ों से होते हुए, उन्हें दुश्मनों और डाकुओं से बचाकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाते थे. लेकिन राजे रजवाड़ों के शासन समाप्त हो जाने के साथ डोली उठाने का कार्य खत्म हो गया. इसके बाद इन्होंने जीवन निर्वाह के लिए खेती, मत्स्य पालन, टोकरी बनाने और उसे स्थानीय बाजारों में बेचने और अन्य नौकरी-व्यवसाय करने लगे. बदलते हुए समय के साथ वर्तमान में उपलब्ध शिक्षा और रोजगार के नए अवसरों का लाभ उठाते हुए यह विभिन्न प्रकार के आधुनिक पेशा को अपनाने लगे हैं. आज यह के सभी क्षेत्रों में उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं और अपनी सफलता की कहानी लिख रहे हैं. आइए जानते है कहार जाति का इतिहास, कहार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

शान की  प्रतीक डोली

पुराने समय में जब सड़कें नहीं थी और यातायात के साधन उपलब्ध नहीं थे, कहार डोली या पालकी में बिठाकर लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाते थे. इससे मिलने वाले पारिश्रमिक पर उनका जीवन यापन चलता था. उस जमाने में डोली शान का प्रतीक हुआ करती थी. पालकी राजे-रजवाड़ों, जमींदारों और संपन्न लोगों के लिए यातायात का साधन था. बाद में डोली को शादी के अवसर पर दूल्हा-दुल्हन की सवारी के रूप में उपयोग किया जाने लगा. इसके लिए कहारों को मेहनताने के साथ-साथ वर और वधू पक्ष से दान और पुरस्कार

कहार किस कैटेगरी में आते हैं?

कहार जाति को बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है.

कहार  कहां पाए जाते हैं?

कहार जाति के लोग मुख्य रूप से बिहार, पंजाब, हरियाणा, पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में निवास करते हैं. राजस्थान में यह सीकर, नागौर, झुंझुनू, जयपुर, गंगानगर, अजमेर, टोंक आदि जिलों में इनकी अच्छी आबादी है.

चंद्रवंशी क्षत्रिय कहारों का एक समुदाय है जिनकी उत्पत्ति गंगा के मैदानी इलाकों में हुई थी. यह धार्मिक और पवित्र अवसरों पर पालकी ढोने का कार्य करते थे. चंद्रवंशी क्षत्रिय कहार भारत के अधिकांश भागों में पाए जाते हैं, लेकिन विशेष रूप से यह उत्तर भारत में केंद्रित हैं. यह मुख्य रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, सहारनपुर, फर्रुखाबाद, कानपुर, मुजफ्फरनगर, शाहजहांपुर, सुल्तानपुर, फैजाबाद, श्रावस्ती, सुल्तानपुर, जौनपुर और अंबेडकरनगर जिलों में पाए जाते हैं. यह बिहार और पश्चिम बंगाल के अधिकांश हिस्सों में पाए जाते हैं.

कहार किस धर्म  को मानते हैं?

मूलतः कहार धर्म से हिंदू हैं. यह हिंदू देवी-देवताओं जैसे शाकंभरी देवी, बालाजी, भगवान शिव आदि की पूजा करते हैं और हिंदू त्योहारों को धूमधाम से मनाते हैं. थोड़ी बहुत संख्या में मुस्लिम और सिख कहार भी पाए जाते हैं. मुस्लिम कहार का कहारों का एक समुदाय है जो उत्तर-पूर्व भारत और बांग्लादेश में पाए जाते हैं. यह पालकी ढोने के साथ-साथ कृषि का कार्य करते हैैं। सिख कहार भारत में पंजाब में पाए जाते हैं. मुस्लिम और सिख कहार बहुत पहले हिंदू थे जो धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम और सिख बन गए.

कहार  उपजातियां

राजस्थान में चंद्रवंशी छत्रिय कहारों का तीन उप विभाजन है-रवानी राजपूत, चंदेल राजपूत और कुरुवंशी. इन उप विवाह जनों में कुल शामिल हैं जिनमें प्रमुख हैं-चंदेल, रवानी, सोमवंशी, चंद्रवंशी, क्षेत्रीय ओतसानिया.

कहार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

कहार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “स्कंधहार” से हुई है, जिसका अर्थ है- कंधे की सहायता से भार उठाना. कहार को मेहरा भी कहा जाता है. मेहरा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द मिहिर से हुई है, जिसका अर्थ है-सूर्य.

कहार जाति का इतिहास

कहार जाति की उत्पत्ति के बारे में कई मान्यताएं हैं. इनमें से प्रमुख मान्यताओं का उल्लेख हम यहां कर रहे हैं.

1. यह मानते हैं कि कहार समुदाय की उत्पत्ति एक कश्यप ऋषि से हुई है. इसीलिए यह कश्यप राजपूत होने का दावा भी करते हैं. कश्यप ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद और अन्य हिंदू ग्रंथों में किया गया है. कश्यप ऋषि मरीचि के पुत्र थे. मरीचि से ही सारे देवताओं और असुरों की उत्पत्ति हुई है.

2. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, वृत्रासुर नामक असुर के वध के दौरान इंद्र को ब्रह्महत्या का पाप लग गया. ब्रह्महत्या के महादोष का प्रायश्चित करने हेतु उन्हें स्वर्ग छोड़कर किसी अज्ञात स्थान पर 1000 वर्ष तक तपस्या करना पड़ा. इंद्रासन रिक्त ना रहे इसीलिए देवताओं ने मिलकर पृथ्वी के प्रसिद्ध चंद्रवंशी धर्मात्मा राजा निहुष को इंद्र के स्थान पर स्वर्ग का राजा बना दिया. निहुष का उल्लेख ऋग्वेद में भी किया गया है.स्वर्ग का राज्य पाकर निहुष भोग-विलास में लिप्त हो गए. एक दिन अचानक उनकी दृष्टि इंद्र की साध्वी पत्नी शची पर पड़ी. शची को देखकर वह कामान्ध हो उठे और उसे प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करने लगे.

ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो जाने के बाद इंद्र फिर से शक्ति संपन्न गए, परंतु इंद्रासन पर निहुष के विराजमान होने के कारण उनकी पूर्ण शक्ति वापस नहीं मिल पाई. उन्होंने अपनी पत्नी शची से कहा कि तुम निहुष को रात्रि में मिलने का संकेत दे दो. लेकिन उनसे यह कहना कि तुमसे मिलने सप्तर्षियों की पालकी में बैठ कर आए. शची का संकेत मिलने के बाद निहुष रात में सप्तर्षियों की पालकी में बैठकर शची से मिलने जाने लगे. सप्तर्षियों को धीरे-धीरे चलता देख उन्होंने ‘सर्प-सर्प’ अर्थात शीघ्र चलो कहते हुए अगस्त ऋषि को लात मार दिया. इस पर अगस्त ऋषि ने क्रोधित होकर निहुष को श्राप दे दिया और कहा- “मूर्ख! तुम्हारा धर्म नष्ट हो और तुम 10,000 वर्षों तक सर्प योनि में पड़ा रहे”. अगस्त ऋषि के श्राप से निहुष तत्क्षण सर्प बनकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और इस तरह से इंद्र को पुनः इंद्रासन प्राप्त हो गया. इस मान्यता के अनुसार, कहार उन सप्तर्षियों के वंशज है जिन्होंने चंद्रवंशी क्षत्रिय राजा निहुष की डोली उठाई थी.

 

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