Ranjeet Bhartiya 11/06/2023
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Last Updated on 17/04/2024 by Sarvan Kumar

पारंपरिक हिंदू जाति व्यवस्था में ब्राह्मणों को सर्वोच्च माना जाता है. ब्राह्मण समाज में कई परंपराएं और प्रथाएं प्रचलित हैं जो उनके धार्मिक और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. यज्ञोपवीत (जनेऊ), वेद-पाठ, ब्राह्मण भोज, दान-पुण्य और ब्राह्मण परिवारों में हीं विवाह आदि कुछ ऐसी परंपराएँ और प्रथाएँ हैं जिनका अधिकांश ब्राह्मण आज भी कड़ाई से पालन करते हैं. यद्यपि वर्तमान समय में सभी ब्राह्मण चोटी नहीं रखते, फिर भी ब्राह्मणों में चोटी रखने की परंपरा रही है. आइए इसी क्रम में जानते हैं कि ब्राह्मण क्यों चोटी रखते हैं.

ब्राह्मण क्यों चोटी रखते हैं?

सभी धर्मों की अपनी विशेष परंपराएं होती हैं जो उस धर्म को विशिष्ट बनाती हैं. हिंदू धर्म अपने विशिष्ट रीति-रिवाजों और प्रथाओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. हिंदुओं में कई परंपराओं और रीति-रिवाजों में एक, चोटी रखने की भी परंपरा है, जो ब्राह्मणों में विशेष रूप से प्रचलित है. चोटी को शिखा भी कहा जाता है. चोटी या शिखा सिर के पीछे बालों का एक गुच्छा होता है, आमतौर पर मुकुट (खोपड़ी के बिल्कुल ऊपर वाला हिस्सा) के पास, जिसे सिर मुंडा कर बिना काटे छोड़ दिया जाता है और अक्सर लट में रखा जाता है.

ब्राह्मणों द्वारा चोटी या शिखा रखने के प्राथमिक कारणों में इसका धार्मिक, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक महत्व शामिल है. माना जाता है कि शिखा धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति ब्राह्मणों की प्रतिबद्धता और सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से उनके संबंध का प्रतिनिधित्व करती है. इसे अध्ययन, सीखने और शास्त्रों के पालन के प्रति व्यक्ति के समर्पण का प्रतीक माना जाता है.

ब्राह्मणों द्वारा चोटी बनाने की प्रथा से जुड़े कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

•शास्त्रीय परंपरा (Scriptural Tradition):

ब्राह्मण अक्सर शिखा को वैदिक परंपराओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता और ज्ञान की खोज के प्रतीक के रूप में मानते हैं. यह प्राचीन शास्त्रों के अध्ययन और संरक्षण के प्रति उनके समर्पण का प्रतिनिधित्व करता है.

•आध्यात्मिक पहचान (Spiritual Identity):
शिखा को एक विशिष्ट विशेषता माना जाता है जो एक व्यक्ति की धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान को एक ब्राह्मण के रूप में दर्शाता है. यह उन्हें अन्य जातियों या समुदायों से अलग करता है.

•धार्मिक बाध्यताएं (Ritual Obligations):
विशिष्ट अनुष्ठानों और प्रथाओं के पालन के हिस्से के रूप में ब्राह्मण चोटी रख सकते हैं. यह धार्मिक समारोहों और संस्कारों को करने के उनके कर्तव्य की याद दिलाने के रूप में कार्य करता है.

•पैतृक प्रथा (Ancestral practice):
कई ब्राह्मण अपने पूर्वजों का सम्मान करने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए शिखा रखने की परंपरा को जारी रखते हैं. इसे उनके वंश और रीति-रिवाजों की एक कड़ी के रूप में देखा जाता है जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं.

अगर आप यह सोचते हैं कि शिखा महज एक परंपरा और हिंदू धर्म की पहचान का प्रतीक है तो आप बिल्कुल गलत हैं, क्योंकि सिर पर शिखा रखने के कई वैज्ञानिक कारण (Scientific Reason) बताए गए हैं.

1. ब्राह्मणों के सिर पर शिखा रखने का सबसे बड़ा कारण सुषुम्ना नाड़ी को बताया जाता है. यह नाड़ी शिखा के ठीक नीचे मौजूद होती है. इसे कपाल तंत्र की दूसरी खुली जगहों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील माना जाता है. इसके लिए शिखा को रखना आवश्यक माना जाता है

2. हिंदू जीवनशैली में, ब्राह्मण जब छोटे बालकों को दीक्षा देते हैं या संस्कारित करते हैं, तो वे सिर के बाकी बाल उतरवा देते हैं और एक चुटिया छोड़ देते हैं। हर बार साधना से पहले वह अपनी चोटी को पकड़कर उसे घुमाता, मोड़ता और खींचता है। वह चोटी को बांधने से पहले उस बिंदु पर पर्याप्त जोर डालता है।

कहा जाता है कि सिर पर चोटी रखने और उसे कसकर बांधने से मस्तिष्क पर दबाव बनता है और मस्तिष्क में रक्त का संचार बेहतर तरीके से होता है.

3. मस्तिष्क को सुचारू और क्रियाशील बनाए रखने के लिए सुषुम्ना नाड़ी के ताप को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी होता है, लेकिन शिखा न हो तो यह नामुमकिन हो जाता है. ऐसे में सिर पर शिखा रखकर आसानी से ताप को नियंत्रित किया जा सकता है.

4. इस बात से बहुत कम लोग ही वाकिफ हैं कि सिर के जिस भाग में शिखा होती है वह स्थान बौद्धिक क्षमता, बुद्धिमता और शरीर के अन्य अंगों को भी नियंत्रित करता है. सिर पर शिखा होने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली सुचारू रूप से चलती है.

5. सिर पर शिखा रखने से व्यक्ति सभी योगासन सही तरीके से कर पाता है. इससे आंखों की रोशनी भी लंबे समय तक सही सलामत रहती है और व्यक्ति लंबे समय तक निरोगी रहकर शारीरिक रूप से सक्रिय रहता है.

आधुनिकता के इस दौर में लोग सिर पर शिखा रखने से कतराने लगे हैं. इसे अधिकांश लोग रूढ़िवादिता की पहचान मानते हैं, लेकिन इसे प्राचीन काल से ही वैज्ञानिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है.

मॉडर्न दौर में भले ही लोग शिखा रखने से कतराने लगे हैं, लेकिन बहुत से ब्राह्मण ऐसे भी हैं जो अपने सिर पर नाम मात्र के लिए छोटी सी चोटी रख लेते हैं. हालांकि शास्त्रों में इस बात का जिक्र किया गया है कि शिखा की लंबाई और आकार गाय के पैर के नाखून के बराबर जरूर होनी चाहिए.

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