Ranjeet Bhartiya 04/12/2022
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Last Updated on 04/12/2022 by Sarvan Kumar

भूमिहार और यादव बिहार की प्रमुख जातियां हैं. दोनों की गिनती ताकतवर जातियों में होती है. अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें तो हम देखेंगे कि ऐसे कई अवसर आए हैं जब दोनो जातियों के बीच संघर्ष हुआ है, जिसके कारण दोनों जातियों के बीच दूरियां भी रहीं हैं. लेकिन आवश्यकता पड़ने पर यह दोनों जातियां नजदीक आने से भी परहेज नहीं करती हैं. आइए भूमिहार और यादव के सम्बन्धों को निम्न बिन्दुओं से विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं-

भूमिहार और यादव

• भूमिहार एक जमींदार जाति है. हालांकि इन्होंने अपनी काफी जमीन खो दिया है, लेकिन फिर भी इनके पास काफी जमीन है. बड़ी मात्रा में भू-स्वामित्व भूमिहार समाज को सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से प्रभावशाली बने रहने में सक्षम बनाता है. यादव, कुशवाहा और कुर्मी के साथ, मध्यवर्ती जाति समूह से संबंधित हैं, जिन्होंने समय के साथ भूमि का अधिग्रहण किया और खुद को सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से मजबूत किया.

•भूमिहार मार्शल रेस होने का दावा करते हैं. वहीं, यादवों को वैदिक क्षत्रिय माना जाता है. जब भी इन दोनों लड़ाकू जातियों में संघर्ष हुआ, संघर्ष बहुत भीषण हुआ. इन संघर्षों का असर यह हुआ कि भूमिहार समाज समय के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर आता गया, जबकि यादव समाज इन पैमानों पर मजबूत होता गया.

•अखंड बिहार राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह (श्री बाबू) का नाम आज भी बड़े सम्मान से लिया जाता है. आधुनिक बिहार के निर्माता डॉ. सिंह भूमिहार जाति से आते थे. 1990 से पहले बिहार की राजनीति में सवर्णों का दबदबा था. लेकिन 1990 में बिहार की राजनीति में एक नए सूरज का उदय हुआ- लालू प्रसाद यादव. लालू यादव सामाजिक न्याय की बात करने वाले करिश्माई नेता के रूप में जाने जाते हैं, जनता में उनका क्रेज था. तमाम पुराने समीकरणों को धराशायी करते हुए वह न केवल बिहार के मुख्यमंत्री बने बल्कि उन्होंने बिहार में यादवों को सामाजिक और राजनीतिक रूप से स्थापित किया. लालू यादव की सत्ता के शिखर तक पहुंचने में एक विवादास्पद नारे का बहुत बड़ा योगदान रहा- ‘भू-रा-बा-ल साफ करो’

•”भूरा बाल साफ करो” का अभिप्राय ऊँची जाति के लोगों; भूमिहार, राजपूत, ब्राहमण और लाला; को समाप्त करने अर्थात उनके सामाजिक और राजनीतिक वर्चस्व को खत्म करने से था. लालू यादव के इस विवाद नारे ने बिहार में विवादों का तूफान खड़ा कर दिया. इससे लालू यादव को बहुत फायदा हुआ लेकिन इससे भूमिहार और यादव समाज के बीच दूरी बढ़ गई. लेकिन लालू प्रसाद यादव ने अपनी आत्मकथा में ऐसा कोई नारा देने से इनकार इनकार करते हैं. भूमिहार ब्राह्मण एकता मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशुतोष कुमार भी दावा करते हैं कि भूमिहार और यादवों को साजिश के तहत लड़ाया गया. यहां तक कि गूगल भी भूमिहार का दुश्मन यादव और यादव का दुश्मन भूमिहार बताता है.

•बिहार की राजनीति में यादव समाज का बोलबाला है. भूमिहार जाति भी सत्ता के करीब रही है. जिन जातियों की सत्ता के गलियारों तक पहुंच होती है, वे राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक हो जाती हैं और राजनीतिक अर्थव्यवस्था को अच्छी तरह समझते लगतु हैं. यह बात भूमिहार और यादव पर लागू होती है. बिहार की बात करें तो स्वर्ण जातियां भारतीय जनता पार्टी के करीब रही हैं. लेकिन राजनीति में कब समीकरण बदल जाए कहा नहीं जा सकता. बिहार में इस वक्त एक नए राजनीतिक समीकरण की चर्चा हो रही है-‘भूमाई’, अर्थात भूमिहार-मुस्लिम-यादव. यह समीकरण कितना सफल होगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा. लेकिन एक बात स्पष्ट है कि भूमिहार समाज का एक वर्ग आरजेडी, यादवों की पार्टी, के करीब जाता दिख रहा है.


References:

•Anthropology of Weaker Sections

1993

•https://www.bhaskar.com/local/bihar/patna/news/rjd-moves-towards-bhumai-equation-129302379.html

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