Sarvan Kumar 07/06/2022
जाट गायक सिद्धू मूसेवाला आज हमारे बीच नहीं है पर उनकी याद हमारे दिलों में हमेशा बनी रहेगी। अपने गानों के माध्यम से वह अमर हो गए हैं । सिद्धू मूसेवाला की 29 मई को मानसा जिले में उनके घर से कुछ किलोमीटर दूर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हत्या किसने और किस वजह से की यह तो जांच के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन हमने जाट समाज का एक अनमोल रत्न खो दिया है। उनके फैंस पर गमों का पहाड़ टूट पड़ा है। jankaritoday.com की टीम के तरफ से उनको एक सच्ची श्रद्धांजलि! Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 07/06/2022 by Sarvan Kumar

ढढोर यादव या ढढोर अहीर या ढढोर यदुवंशी यादवों का एक प्रसिद्ध गोत्र, खाप या उपजाति है. यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र और बिहार के दक्षिण-पश्चिमी भाग में पाए जाते हैं. लेकिन क्या यह हमेशा से यही निवास करते आए हैं या किसी दूसरी जगह से आकर यहां बस गए? आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ढढोर यादव मूल रूप से राजस्थान के रहने वाले हैं. तो आखिर यह उत्तर प्रदेश और बिहार में कैसे आए? इनके पूर्वज कौन हैं? आइए जानते हैं ढढोर यादव का इतिहास

ढढोर यादव का इतिहास

ढढोर यादवों की उत्पत्ति के बारे में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार, ढढोर यादवों की उत्पत्ति भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्र (वज्रनाभ) से हुई है. भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न हुये. प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध हुये. अनिरुद्ध के पुत्र वज्र (वज्रनाभ) हुये. मथुरा के युद्धोपरांत जब द्वारिका नष्ट हो गई, तब भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ मथुरा के राजा हुए. इन्हें के नाम पर मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है. कहा जाता है कि ढढोर यादव वज्रनाभ के ही वंशज हैं.एक दूसरी मान्यता के अनुसार, भगवान कृष्ण की पीढ़ी में 135 वें राजा विजयपाल हुए. उन्हीं के अनेक पुत्रों में से एक से “ढढोर” वंश चला.ढढोर यादवों की उत्पत्ति के बारे में एक तीसरी मान्यता भी है. रचनाकार ‘नल्ह सिह भाट’ की पुस्तक “विजयपाल रासो” में उल्लेख किया गया है कि राजा विजयपाल के समय राजस्थान और बृज में यदुवंशी क्षत्रियों के 1444 गोत्र थे. इसी 1444 गोत्रों में से एक गोत्र “ढढोर” था, ढढोर यादव उसी के वंशज हैं.

ढढोर यादव राजस्थान से उत्तर प्रदेश- बिहार कैसे आए?

ढढोर यादव मूल रूप से राजस्थान के ढूंढाड़ क्षेत्र के रहने वाले हैं. ढूंढाड़ राजस्थान राज्य का एक ऐतिहासिक क्षेत्र रहा है. यह पश्चिम राजस्थान में स्थित है. ढूंढाड़ क्षेत्र में आने वाले जिले हैं: जयपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, टोंक और करौली जिला का उत्तरी भाग. यहां ढूंढाड़ी भाषा बोली जाती है. आज भी यहां  ढढोर अहीरों के कई गांव मौजूद हैं जो इनके गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं.  कहा जाता है कि जब मोहम्मद गोरी ने राजस्थान पर आक्रमण किया तो ढढोर यादव पृथ्वीराज चौहान की सेना में शामिल हो गए और उन्होंने बड़े बहादुरी से गोरी और उसकी सेना का मुकाबला किया. युद्ध समाप्त होने के पश्चात, यह राजस्थान से विस्थापित होकर बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र और बिहार में जाकर बस गए. वर्तमान में पूर्वांचल के बलिया, गोरखपुर, गाजीपुर और आजमगढ़ तथा बिहार के बक्सर, सिवान, भोजपुर और पटना जिलों में इनकी बहुतायत आबादी है.

ढढोर यादव की कुलदेवी

इनकी आराध्य देवी या कुलदेवी कैलादेवी (कंकाली माता) हैं, जिन्हें योगमाया विंध्यावासिनी माँ भी कहा जाता है.

रियासत और जमींदारी

पूर्वांचल और बिहार के कई क्षेत्रों में ढढोर यादवों कि कई प्रतिष्ठित रियासतें और जमींदारियां रही हैं. उदाहरण के तौर पर, भीटी रावत रियासत, सहजनवा, गोरखपुर.

ढढोर यादव के उल्लेखनीय व्यक्ति

राजा विजयपाल यदुवंशी

हीरचंद यादव

बाबा बगहा सिंह यदुवंशी

बाबू शारदा प्रसाद सिंह रावत

चौधरी विश्वनाथ पहलवान यादव

यशपाल सिंह रावत (पॉलीटिशियन)

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