Sarvan Kumar 23/10/2021

धानुक भारत, बांग्लादेश और नेपाल में पाया जाने वाला एक जातीय समूह है. विभिन्न क्षेत्रों में यह जाति अलग-अलग नामों से जानी जाती है‌ जैसे धानुक, धानुका, धनिक, धेनिक, धानका, धानकिया, धनूर आदि. लेकिन इन सब नामों में इस जाति का मूल नाम धानुक और धानक ही है. हरियाणा में यह डेलू के नाम से जाने जाते हैं, जो बुनकरों का एक समूह है. परंपरागत रूप से धनुष-बाण बनाना और चलाना इस जाति का पेशा रहा है. धानुक जाति प्राचीन काल मे एक वीर क़ौम थी, जिसका कार्य सेना में धनुष-बाण चलाना था. धानुक जाति का इतिहास गौरवशाली रहा है. यह जाति अपने त्याग, बलिदान और शूरवीरता के लिए जाना जाता है. इतिहास के प्रारंभिक चरण में इस जाति को एक योद्धा जाति कहा जाता था. यह एक मार्शल कौम यानी कि योद्धा जाति रही है, जिसका इतिहास हमेशा से देश की सुरक्षा और मान-सम्मान की रक्षा के लिए त्याग करने और मर मिटने का रहा है. प्राचीन काल में राजे-रजवाड़ों के समय यह अग्रिम पंक्ति के योद्धा थे जिनके बिना युद्ध करना संभव ही नहीं था. यह उच्च कोटि के धनुषधारी हुआ करते थे जो युद्ध में पहला आक्रमण करते थे. मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने पुस्तक “पद्मावत” में इस बात का उल्लेख किया है.
मध्यकाल में इन्होंने मुगलों के खिलाफ युद्ध में राजपूत राजाओं का साथ दिया था. राजपूत राजाओं के पराजय और समय के साथ धनुष-बाण की उपयोगिता खत्म होने से धनुषधारी होना इनका पारंपरिक पेशा नहीं रहा और इन्हें गुमनामी का जीवन जीना पड़ा. इन्हें अपना पारंपरिक काम छोड़ना पड़ा और जीवन यापन के लिए छोटे-मोटे कार्यों को अपनाना पड़ा, जिससे यह सामाजिक सोपान में  नीचे जाते रहे.

धानुक समाज के लोग पन्ना धाय को अपना आदर्श मानते हैं, जिन्होंने अपने बेटे चंदन का बलिदान देकर मेवाड़ राजवंश की रक्षा की थी. कर्तव्य परायणता और त्याग के लिए मेवाड़ के इतिहास में पन्ना धाय का नाम उतने ही आदर, सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है जितना महाराणा प्रताप का.

आजादी की लड़ाई में इस समाज का अहम योगदान रहा है. बंगाल विभाजन के बाद देश के स्वतंत्रता संग्राम में फांसी को गले लगाने वाले बिहार के प्रथम रामफल मंडल ही हैं जिन्होंने 24 अगस्त 1942 ई में अंग्रेज सरकार के वरीय पुलिस पदाधिकारियों को मौत के घाट उतारकर आजादी का शंखनाद किया था. हत्या के आरोप में उन्हें 23 अगस्त 1943 को भागलपुर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई.

धानुक किस कैटेगरी में आते हैं?

बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में इस जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के रूप में सूचीबद्ध किया गया है. अन्य राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली आदि में इन्हें अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

धानुक जाति की जनसंख्या, कहां पाए जाते हैं?

इस जाति के लोग भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में निवास करते हैं. भारत और नेपाल में यह अधिक मात्रा में पाए जाते हैं.

भारत में यह बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, दिल्ली, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में पाए जाते हैं. बिहार में इनकी अच्छी खासी आबादी है. यहां इन्हें कुछ अन्य जातियों के साथ राज्य की कुल आबादी का 32% बनाने वाली निम्न पिछड़ा वर्ग के रूप में वर्गीकृत किया गया है. साल 2011 की जनगणना में उत्तर प्रदेश और दिल्ली में इनकी आबादी क्रमशः 6,51,355 और 76,815 पाई गई थी.

नेपाल में यह मूल रूप से पूरब में मोरंग से लेकर पश्चिम में तराई तक फैले हैं. यह सप्तरी, सिरहा और धनुषा के तराई जिलों में निवास करते हैं. इन्हें पूर्वी तराई में कुर्मी, जबकि पश्चिमी तराई में पटेल कहा जाता है.

धर्म
धानुक हिंदू धर्म को मानते हैं.

धानुक जाति के सरनेम/उपनाम

इनके प्रमुख उपनाम महतो, मंडल, सिंह, पटेल, राय, विश्वास, सिन्हा, रावत, कठेरिया आदि हैं.

धानुक शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

धानुक शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “धनुषक:” से हुई है, जिसका अर्थ होता है- धनुषधारी, तीरंदाज या धनुष चलाने वाला.

धानुक जाति का  इतिहास

धानुक जाति की उत्पत्ति के बारे में प्रमुख मान्यताएं इस प्रकार है-

उच्च कोटि के निशानेबाज

पहली मान्यता के अनुसार, इस जाति के लोग उच्च कोटि के निशानेबाज थे. पुराने समय में राजा-महाराजाओं के काल में यह अग्रिम पंक्ति के धनुर्धर हुआ करते थे जो युद्ध में सबसे पहला आक्रमण करते थे. धानुक जाति का उल्लेख मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी पुस्तक पद्मावत में किया है. उन्होंने लिखा है-

गढ़ तस सवा जो चहिमा सोई,
बरसि बीस लाहि खाग न होई
बाके चाहि बाके सुठि कीन्हा,
ओ सब कोट चित्र की लिन्हा
खंड खंड चौखंडी सवारी,
धरी विरन्या गौलक की नारी
ढाबही ढाब लीन्ते गट बांटी,
बीच न रहा जो संचारे चाटी
बैठे धानुक के कंगुरा कंगुरा,
पहुमनि न अटा अंगरूध अंगरा।
आ बाधे गढ़ि गढ़ि मतवारे,
काटे छाती हाति जिन घोर
बिच-बिच बिजस बने चहुँकारी,
बाजे तबला ढोल और भेरी”

जिसका अर्थ है- “किले के प्रत्येक शिखर पर वीर धनुषधारी बैठे हैं जिनके ऊपर किले की रक्षा का भार है. उनके बाणों की वर्षा जब होती है तो हाथी भी धराशाई हो जाते हैं”.
आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक दिल्ली संतलत में भी इसी बात का उल्लेख किया है.

धनक ऋषि के वंशज

दूसरी मान्यता के अनुसार, यह जाति का संबंध धनक ऋषि से है. धानुक धनक ऋषि के ही वंशज हैं.

धनुकली या धानकी

तीसरी मान्यता के अनुसार, इस जाति के कुछ सदस्य धाणक शब्द को “धनुकली या धानकी” से जोड़ते हैं, जिसका उपयोग रुई धुनने के काम के लिए किया जाता है और कहते हैं कि यह पहले कपड़ा बुनाई के व्यवसाय से जुड़े थे. हरियाणा में निवास करने वाले धाणक कपड़ा बनाने का कार्य करते हैं. इस जाति के लोग कबीर दास को अपना सतगुरु मानते हैं और कबीरपंथी के नाम से जाने जाते हैं. यह भी कहा जाता है कि यह समाज पारंपरिक रूप से बांस की टोकरी बनाने का कार्य किया करता था.

धान से धानुक

इनके अनुसार इनकी जड़े राजस्थान में है और इनके रीति-रिवाजों और परंपराओं पर राजपूत प्रभाव है. यह दावा करते हैं कि राजस्थान में उनके पूर्वज बांस से धनुष बाण और टोकरियाँ बनाने का काम किया करते थे. जीवन यापन के लिए यह लघु वन उत्पादों पर निर्भर थे. लेकिन जंगलों के व्यापक कटाई के बाद उन्हें रोजगार के अन्य विकल्पों की तलाश में स्थानांतरित होना पड़ा. दूसरे राज्यों में जाकर यह अनाज मंडियों में धान की सफाई का काम करने लगे. संभवत इसी से बाद में इनका नाम धानुक पड़ा. समय के साथ इस समुदाय में व्यवसायिक विविधता आई और यह जलवाहक, संगीतकार, रखवाली, चरवाहा, शिकारी बुनकर और खेतिहर मजदूर आदि के रुप में काम करने लगे.

एक प्राचीन जाति

मानवविज्ञानी मेगन मूडी के अनुसार, इस जाति के लोग सभी जातियों में विशेष स्थान रखने का दावा करते हैं और प्राचीन ग्रंथों जैसे ऋग्वेद वेद और पुराणों से “धनक” शब्द के इतिहास की उत्पत्ति का पता लगाते हैं.

एक योद्धा जाति

प्राचीन काल में इस जाति को योद्धा जाति कहा जाता था. लेकिन पराजय के पश्चात इन्हें विजेता राजाओं द्वारा दमन-गुलामी का शिकार होना पड़ा और इन्हें छोटे-मोटे निम्न स्तर के कार्यों में लगा दिया गया. मजबूरन इन्हें भूमिहीन खेतिहर मजदूर के रूप में काम करना पड़ा. साथ ही इन्हें साफ सफाई तथा कपड़ा बुनने का काम करने वाली जातियों में शामिल होना पड़ा. इन सब कार्यों से इनके सामाजिक स्थिति में गिरावट हुई. वर्तमान में इन्हें भारत के विभिन्न राज्यों में अनुसूचित जाति में शामिल किया गया है. इसका बड़ा कारण यह है कि विदेशी आक्रमणकारियों के धर्मांतरण के लिए दबाव और प्रताड़ना के बावजूद इन्होंने घुटने नहीं टेके और अपने धर्म को नहीं छोड़ा.

यह योद्धा जाति होने का दावा करते हैं जो प्राचीन काल में धनुष और बाण से युद्ध किया करते थे. मध्ययुगीन काल में वह मुगलों के खिलाफ जंग में राजपूत राजाओं की मदद करने का दावा करते हैं. यह कहते हैं कि राजपूत राजाओं के पराजय के बाद इन्हें मुगलों तथा अन्य शासकों द्वारा परेशान किया गया जिसके कारण इन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में पलायन करना पड़ा.

धानुक समाज  की पन्ना धाय

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के तहत इस समाज के लोग पन्ना धाय को अपने समाज का नायक बताते हैं. पन्ना धाय राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह की धाय मां थी. उन्होंने अपने बेटे चंदन को बलिदान करके उदय सिंह को बचाया था और इस तरह से मेवाड़ राजवंश की रक्षा की थी. पन्ना धाय की यह गौरव गौरव गाथा उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों जैसे कानपुर, इटावा, फर्रुखाबाद और मैनपुरी के आसपास के क्षेत्रों में लोकप्रिय है. यहां निवास करने वाले धानुक समुदाय के लोग पन्ना धाय की वर्षगांठ भी मनाते हैं.

 

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