Last Updated on 25/12/2021 by Sarvan Kumar
हलालखोर (Halalkhor) भारत में पाया जाने वाला एक मुस्लिम जातीय समुदाय है. इन्हें विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. बिहार में इन्हें शैखरा (Shaikhra) या शाहनी (Shahani) और उत्तर प्रदेश में मुस्लिम भंगी (Muslim Bhangi) के नाम से जाना जाता है. यह समुदाय परंपरागत रूप से मजदूर और सफाई कर्मी के रूप में काम करके अपना जीवन यापन करता रहा है. इस समुदाय को अक्सर अन्य मुस्लिम जातियों द्वारा छुआछूत, भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है. हलालखोर समुदाय गरीबी से ग्रसित है और सबसे अधिक हाशिए पर रहने वाले मुस्लिम समुदायों में से एक है. आरक्षण प्रणाली के अंतर्गत इन्हें उत्तर भारत के कुछ राज्यों में पिछड़ा वर्ग (Backward Class, BC) के रूप में वर्गीकृत किया गया है. आइए जानते हैं हलालखोर समाज का इतिहास, हलालखोर की उत्पति कैसे हुई?
हलालखोर समाज एक परिचय
यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में पाए जाते हैं. यह समुदाय दो उप समूहों में विभाजित है, कम्पू (Kampu) और शैकडा (Shaikada). बिहार में पाए जाने वाले हलालखोर मुस्लिम सफाईकर्मी हैं. इन्हें यहां मेहतर, भंगी और हलालबेगी के नाम से भी जाना जाता है. यह पूरे बिहार में पाए जाते हैं. सांप्रदायिक आधार पर यह सिया और सुन्नी में विभाजित हैं. इन दोनों संप्रदायों के बीच विवाह का संबंध नहीं है. बिहार में पाए जाने वाले कई हलालखोर नगर पालिकाओं में सफाई कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं. इनमें से कई पलायन करके दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में चले गए हैं, जहां वह दिहाड़ी मजदूर के रूप में कार्यरत हैं. अधिकांश हलालखोर सुन्नी इस्लाम को मानते हैं. इनमें से कुछ शिया इस्लाम इस्लाम का भी पालन करते हैं. यह हिंदी, उर्दू, अवधी, भोजपुरी और मैथिली बोलते हैं.
हलालखोर शब्द की उत्पति
हलालखोर शब्द की उत्पत्ति फारसी भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- “हलाल खाना खाने वाले”.इनकी उत्पत्ति के बारे में कहा जाता है कि यह मूल रूप से हिंदू भंगी समुदाय के वंशज हैं, जो धर्म परिवर्तित करके मुसलमान बन गए. इसीलिए इन्हें मुस्लिम भंगी भी कहा जाता है.
