Sarvan Kumar 06/11/2020

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Last Updated on 06/11/2020 by Sarvan Kumar

रावण ब्रह्मा जी से वरदान में क्या मांगा:  रावण, कुंभकरण और विभीषण ने कठिन तपस्या की तप देख कर ब्रह्मा जी उनके पास गए और बोले हे तात् मैं प्रसन्न हूं वर मांगो। रावण ने विनय करके और चरण पकड़ कर कहा- हे जगदीश्वर सुनिए वानर और मनुष्य इन दो जातियों को छोड़कर हम और किसी के मारे ना मरे। फिर ब्रह्मा जी कुंभकरण के पास गए उसे देख कर उनके मन में बड़ा आश्चर्य हुआ जो यह दुष्ट नित्य आहार करेगा तो सारा संसार ही उजाड़ हो जाएगा। ब्रह्मा जी ने सरस्वती को प्रेरणा करके उसकी बुद्धि फेर दी, उसने 6 महीने की नींद मांगी। फिर ब्रह्मा जी विभीषण के पास गए और बोले हे पुत्र वर मांगो, उसने भगवान के चरण कमलों में निर्मल प्रेम मांगा।

कैसी थी रावण की लंका

समुद्र के बीच त्रिकूट नामक पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ एक बड़ा भारी किला था। स्वर्ग से भी सुंदर उस नगरी का नाम संसार में लंका के नाम से प्रसिद्ध हुआ। लंका के चारों ओर समुद्र की अत्यंत गहरी खाई थी। लंका अत्यंत ऊंचा था, चारों ओर सोने की चहारदीवारी थी। विचित्र मणियों से जड़ा हुआ सोने का परकोटा था उसके अंदर बहुत से सुंदर-सुंदर घर थे। चौराहे, बाजार, सुंदर मार्ग और गलियां बहुत प्रकार से सजा हुआ था। हाथी,घोड़े खच्चरों के समूह और रथों के समूह को कौन गिन सकता था। अनेक रूपों के राक्षस के दल थे उनकी अत्यंत बलवती सेना का वर्णन नहीं किया जा सकता। वन, बाग, उपवन, फुलवारी, तालाब, कुएं और बावलिया नगर की शोभा बढाते थे। मनुष्य नाग, देवताओं, गंन्धर्वो की कन्या अपने सोंदर्य से नगर की शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। भयंकर शरीर वाले करोड़ों योद्धा बड़ी सावधानी से नगर की चारों दिशाओं की रखवाली करते थे।

कैसी थी रावण की राजभवन

राजभवन सूर्य सदृश चमकीले परकोटे से घिरा हुआ था। राजभवन को बड़े-बड़े राक्षस रक्षा करते थे। राजमहल का तोरण द्वार चांदी का था और चांदी पर सोने का काम किया गया था। उस भवन की डयोढियां तरह- तरह की बनी हुई थी। वहां की भूमि और दरवाजे विविध प्रकार के बने हुए थे वह देखने में सुंदर और भवन की शोभा बढ़ाने वाले थे। वहां पर ना थकने वाले शूरवीर और हाथियों पर चढ़े महावत मौजूद थे । जिनके वेग को कोई नहीं रोक सकता था, रथों में जोते जाने वाले ऐसे घोड़े उपस्थित थे। सिंह और बाघ के चर्म धारण किए हुए, सोने चांदी और हाथी दांत की प्रतिमाओं से सुसज्जित तथा गंभीर शब्द करने वाले विचित्र रथ भवन के चारों ओर घूमा करते थे। राजभवन बड़े-बड़े डील-डौल के हजारों देखने योग्य पक्षियों और मृगों से भरा हुआ था। रावण के डर के मारे राजभवन समुद्र की तरह गंभीर और नी:शब्द बना रहता था।

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