Ranjeet Bhartiya 16/12/2021
नहीं रहे सबके प्यारे ‘गजोधर भैया’। राजू श्रीवास्तव ने 58 की उम्र में ली अंतिम सांस। राजू श्रीवास्तव को दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से वो 41 दिनों से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। उनकी आत्मा को शांति मिले, मुझे विश्वास है कि भगवान ने उसे इस धरती पर रहते हुए जो भी अच्छा काम किया है, उसके लिए खुले हाथों से स्वीकार करेंगे #RajuSrivastav #IndianComedian #Delhi #AIMS Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 16/12/2021 by Sarvan Kumar

कलवार (Kalwar) भारत में पाई जाने वाली एक जाति है. इन्हें कलार या कलाल (Kalar or Kalal) के नाम से भी जाना जाता है. परंपरागत रूप से यह जाति शराब के आसवन और बिक्री के कार्य से जुड़ी हुई है. ऐतिहासिक रूप से यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और उत्तर-मध्य भारत के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं. भारत के अलावा यह नेपाल में भी पाए जाते हैं. यह हिंदू धर्म का पालन करते हैं. अधिकांश कलवार अहलूवालिया या जायसवाल सरनेम का प्रयोग करते हैं.आइये जानते हैं कलवार जाति का इतिहास, कलवार शब्द की उत्पति कैसे हुई?

कलवार शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

कलवार शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द “कल्यापाल’ से हुई है, इसका अर्थ होता है- “शराब आसवक’.इस समाज के लोग “कलार” शब्द का एक अन्य अर्थ भी बताते हैं. उनके अनुसार, कलार शब्द का शाब्दिक अर्थ है- “मृत्यु का शत्रु, या काल का भी काल”. हैहय वंशियों को बाद में “काल का काल” की उपाधि दी जानें लगी जो कालांतर में शाब्दिक रूप में बिगड़ते हुए काल का काल से “कल्लाल” हुई और फिर “कलाल” और अब “कलवार” हो गई.

कलवार जाति का इतिहास

इस जाति के लोग हैहय वंशी क्षत्रिय होने का दावा करते हैं. उनका कहना है कि राजपाट नष्ट हो जाने के कारण, आपातकाल में इन्हें जीवन यापन के लिए व्यापार का सहारा लेना पड़ा. इसीलिए कालांतर में यह वैश्य कहलाने लगे. लेकिन यह धारणा गलत है कि कलवार आदिकाल से शराब बनाने और बिक्री के कार्यों से जुड़े हुए थे.चूंकि शराब बनाने और बेचने के पुश्तैनी व्यवसाय को तुच्छ और अपमानजनक माना जाता था, इसीलिए कलवारों को दक्षिण एशिया के जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में नीचे समझा जाता था. इसीलिए, बीसवीं शताब्दी के शुरुआत के आसपास, संस्कृतिकरण प्रक्रिया के माध्यम से सामाजिक स्थिति को सुधारने के उद्देश्य से, यह अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़कर अन्य व्यवसायों को अपनाने लगे. इनकी सामाजिक स्थिति विशेष रुप से तब बदली जब 18वीं शताब्दी में कलवार प्रमुख जस्सा सिंह राजनीतिक सत्ता में आए. उन्होंने अपने पैतृक गांव के नाम पर खुद को अहलूवालिया के रूप में पेश किया, और कपूरथला राज्य के शासक वंश की स्थापना की. जस्सा सिंह के उदय के बाद, अन्य सिख कलालों ने भी अहलूवालिया को अपनी जाति के नाम के रूप में अपना लिया और अपना पारंपरिक व्यवसाय छोड़ना शुरू कर दिया. बीसवीं शताब्दी के शुरुआत तक, अधिकांश कलालो अपने पारंपरिक व्यवसाय को छोड़ दिया था. इस समय तक, अहलूवालिया ने अपनी सामाजिक स्थिति को और बढ़ाने के लिए खत्री या राजपूत मूल का दावा करना शुरू कर दिया. इलाहाबाद के कलवार 1890 दशक से खुद को क्षत्रिय होने का दावा कर रहे हैं. ब्रिटिश शासन के दौरान, कलालों ने पारंपरिक व्यवसाय को त्याग कर, व्यापार, कृषि, सैनी सेवा (विशेष रूप से आहलूवालिया), सरकारी सेवा और वकालत आदि करने लगे.

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