Sarvan Kumar 10/10/2021

Last Updated on 12/10/2021 by Sarvan Kumar

मुसहर मजबूत शारीरिक बनावट के होते हैं. स्वभाव से यह इमानदार, मेहनती, निष्कपट और सहनशील होते हैं. बिहार के मुसहर कार्यकर्ता अमर कुमार मांझी का दावा है कि मुसहर चूहा पकड़ते हैं, यह सभी जानते हैं. दक्षिणी बिहार से उतरी बिहार की ओर पलायन करने वाले मुसहरों का इतिहास रहा है कि वह गंगा में घड़ियाल पकड़ने का काम करते थे. मुसहर समाज के लोगों की शिकायत है कि सामंतवादी घृणा और जातीय वैमनस्यता के कारण चूहा पकड़ने वाली बात सबको समझ में नहीं आती है, लेकिन यह कोई नहीं कहता कि मुसहर इतनी बहादुर जाति रही है जो गंगा नदी में घड़ियाल भी पकड़ा करती थी. कई साहित्यकारों ने लिखा है कि भुईयां इस देश में सबसे पहले जंगलों को काट कर कृषि कार्य आरंभ करने वाला समाज है. मुसहर गंगा के पूर्वी मैदान और तराई में पाया जाने वाला एक दलित समुदाय या‌ जाति है. इन्हें मुशहर, बनवासी, भुइयां, मांझी और रजवार के नाम से भी जाना जाता है.भूमि खोदने के काम के कारण इन्हें भुइयां कहा जाता है. झारखंड (छोटा नागपुर) में इन्हें भुइयां कहा जाता है. उत्तर बिहार में इन्हें मुसहर के नाम से जाना जाता है, जबकि मध्य बिहार में इन्हें भुइयां और मुसहर दोनों नामों से जाना जाता है. आइए जानते हैं मुसहर जाति का इतिहास, मुसहर शब्द की उत्पत्ति कैैैसे हुुई?

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मुसहर शब्द की उत्पत्ति कैैैसे हुुई?

पुराने समय में मुसहर की स्थिति बंधुआ मजदूर जैसी थी. जमींदार और किसान जब इनसे फसल कटवाते थे तो मजदूरी के बदले इनको अनाज देते थे. इसी से इनका गुजर-बसर चलता था. लेकिन मजदूरी में मिलने वाले अनाज से इनका पेट नहीं भर पाता था. अनाज की कमी होने की स्थिति में ये इन्होंने गेहूं और धान के बालों को इकट्ठा करना शुरू किया जो चूहे अपनी मांद में ले जाते थे. फिर उससे अन्न निकालकर भोजन के रूप में प्रयोग करते थे. मांद से गेहूं और धान के बाल निकालने के दौरान इन्हें वहां चूहा मिला. साग-सब्जी के अभाव में यह चूहों को सब्जी के रूप में खाने लगे. इस तरह से अनाज के अभाव में पेट भरने के चूहा का शिकार करने वाले और उसे आहार के रूप में ग्रहण करने वाले “मुसहर” कहलाए. मुसहर का शाब्दिक अर्थ है- चूहा खाने वाला. चूहा पकड़ने और खाने के कारण इनका नाम मुसहर पड़ा.

मुसहर जाति का इतिहास

ब्रिटिश नृवंशविज्ञानशास्री (ethnographer) हर्बट होप रिस्ले ने बंगाल प्रेसिडेंसी की जातियों और जनजातियों का व्यापक अध्ययन किया था. रिस्ले ने अपने 1881 के सर्वेक्षण में अनुमान लगाया था कि मुसहर छोटा नागपुर पठार के शिकारी-संग्रहकर्ता भुईयां की एक शाखा थे. यह 1881 के सर्वेक्षण से लगभग 6-7 पीढ़ी पहले यानी कि वर्तमान से लगभग 300-350 वर्ष पहले गंगा के मैदानों में चले गए थे. आधुनिक अनुवांशिक अध्ययनों में भी इस सिद्धांत को आमतौर पर सही पाया गया है. डीएनए गुणसूत्रों के अध्ययन में मुसहर समुदाय को मुंडा समुदाय जैसे संथाल और होस के करीब पाया गया है. मातृ और पितृ वंश (maternal and paternal lineages) दोनों में समान हैपलोग्रुप आवृत्तियों से पता चलता है कि इन सब के पूर्वज एक थे. हैपलोग्रुप या वंश समूह जीन के ऐसे समूह होते हैं जिससे यह पता चलता है कि उस दिन समूह को धारण करने वाले सभी प्राणियों के पूर्वज एक थे. मुसहर इस बात का दावा करते हैं कि कभी उनकी अपनी भाषा थी, जो स्थानांतरगमन के कारण विलुप्त हो गई.

मुसहर जाति की उत्पत्ति के बारे में प्रमुख मान्यताएं इस प्रकार हैं-

ब्रह्मा जी का शाप

एक स्थानीय किवदंती के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने मनुष्य को बनाया और उसे सवारी करने के लिए घोड़ा दिया. पहले मुसहर ने घोड़े के पेट में छेद बना दिया ताकि सवारी करने के दौरान वह उसमें अपने पैरों को अच्छे से रख सके. इससे ब्रह्मा जी  क्रोधित हो गए और मुसहर के वंशजों को चूहे पकड़ने का श्राप दे दिया.

मुसहर और भुइयां

जैसा कि हम जानते हैं कि भोजन और रोजगार की तलाश में इस समुदाय के लोग पलायन करते आ रहे हैं. इस क्रम में कुछ लोग गांव में रह गए तो कुछ लोगों ने जंगलों की ओर रुख किया. जब इन्होंने जंगलों की कटाई करके खेती आरंभ किया तो सामंती मानसिकता के लोग यह कहने लगे- “देखो यह भुइयां जैसा कर रहा है”. बता दें कि सितुआ को स्थानीय भाषा में भुइयां कहते हैं. यह नदी और तालाब में पाए जाते हैं. जब यह जमीन पर चलते हैं तो हल जैसी आकृति पैदा करते हैं. इस तरह से कालांतर में यह “भुइयां” के नाम से जाने जाने लगे.

मुसहर किस कैटेगरी में आते हैं?

बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मुसहर जाति को अनुसूचित जाति (Scheduled Caste) के रूप में वर्गीकृत किया गया है.

मुसहर जाति की जनसंख्या

मुसहर भारत, नेपाल और बांग्लादेश में पाए जाते हैं. लगभग सारे मुसहर ग्रामीण इलाकों में निवास करते हैं, केवल 3% शहरी इलाकों में रहते हैं. यह भोजपुरी, मगही, मैथिली और हिंदी बोलते हैं. भारत में यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में रहते हैं. पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी नेपाल में इनकी बहुतायत आबादी है. नेपाल में 2,30,000 से ज्यादा मुसहर नेपाल में निवास करते हैं.

2011 की जनगणना में उत्तर प्रदेश में मुंह शहर की जनसंख्या लगभग 2,50,000 लाख थी. इसी जनगणना में बिहार में मुसलमानों की आबादी 2,50,000 के करीब बताई गई थी. लेकिन मुसहर कार्यकर्ता इस आंकड़े को सही नहीं मानते. उनका दावा है कि बिहार में मुसहर की आबादी 40 लाख से अधिक है. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी दावा करते हैं कि पूरे देश में इस समाज के लोगों की आबादी 80 लाख के करीब है.

बिहार में गया, रोहतास, अररिया, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, भागलपुर, मुंगेर, पूर्णिया, गया, दरभंगा, सारण, चंपारण, भोजपुर, बेगूसराय और खगड़िया में इनकी घनी आबादी है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज जिलों में मुसहर समाज समुदाय की बड़ी आबादी निवास करती है.

मुसहर उपजातियां  सरनेेम

मुसहर जाति में तीन अंतर्विवाही कुल शामिल हैं: भगत, सताकिया और तुर्ककहिया। मांझी, सदा और मंडल इनके प्रचलित सरनेम हैं. ज्यादातर मुसहर हिंदू धर्म को मानते हैं. कुछ मुसहर बौद्ध भी हैं.

मुसहर जाति की वर्तमान स्थिति और मुसहर समाज के प्रमुख व्यक्ति 

 

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