Sarvan Kumar 15/10/2021
नहीं रहे सबके प्यारे ‘गजोधर भैया’। राजू श्रीवास्तव ने 58 की उम्र में ली अंतिम सांस। राजू श्रीवास्तव को दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से वो 41 दिनों से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। उनकी आत्मा को शांति मिले, मुझे विश्वास है कि भगवान ने उसे इस धरती पर रहते हुए जो भी अच्छा काम किया है, उसके लिए खुले हाथों से स्वीकार करेंगे #RajuSrivastav #IndianComedian #Delhi #AIMS Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 03/12/2021 by Sarvan Kumar

‘बनारस’ नाम सुनते ही मां गंगा के किनारे घाटों का कई चित्र दिमाग में उभर आता है। जैसे बनारस को घाटों की बिना कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही घाटों के किनारे बंधी नाव के बिना  घाटों का कल्पना नहीं कर सकते हैं। इन नावों से ही लोगों को एक तट से  दूसरे तट पहुंचाया जाता है। इन नावों को जो चलाते हैं वे कौन  हैं, वे कब से यह काम कर रहे हैं। मजबूत, साहसी, मस्तमौला ये नाविक अपना पूरा जीवन इन नावों के साथ बिता देते हैं। प्राचीन समय में जब परिवहन का कोई साधन नही था नावों के ही सहायता  से  दूर तक यात्रा संभव हो पाता था। ना केवल यात्रा करने के लिए बल्कि व्यापार और सैन्य सेवाओं में भी नाव ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। कल्पना कीजिए कि कोलंबसऔर वास्कोडिगामा के पास नाव नहीं होता तो क्या होता। तो वे भारत को दुनिया को  दूसरे  हिस्से से कभी परिचय नहीं कर पाते। पूरे दुनिया में कई प्रतापी राजा हुए जो अपने साम्राज्य को दूर-दूर तक फैलाया बिना नावों के बिना यह असंभव  था। एक देश से दूसरे देश तक व्यापार नावों से ही संभव हो पाया। हम कह सकते हैं नावों के बिना मानव और समाज का इतना जल्दी विकास नही ही पाता।  अब नाव तो खुद तो  चलेगा नही  इसे चलाने वाला भी तो कोई होना चाहिए। जो साहसी, निडर और कुशल गोताखोर हो वही यह काम कर सकता है। दुनियाभर के इन नाविकों को हम मल्लाह नाम से जानते हैं। मल्लाह कोई जाति नही बल्कि उन लोगों का समुह है जो नाव खेने का काम करते हैं।
हजारों साल से नाव चलाना वंशानुगत हो जाने के कारण भारत में मल्लाह जाति बन गई। मल्लाहों को सम्मानित करने के बजाय हम उन्हे छोटी जाति कहकर अपने देश का मजाक बनाते हैं। भले ही आज समाज विकसित हो गया है यातायात के कई साधन आज उपलब्ध है पर सभ्यता के निर्माण में क्या मल्लाहों का योगदान भुलाया जा सकता है। भगवान राम के परम मित्र मल्लाहों को  लिए हम सबको सर झुकाकर धन्यवाद देना चाहिए। आइए जानते हैैं मल्लाह जाति का इतिहास, मल्लाह शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

बनारस के गंगा तट पर नाव

मल्लाह जाति का इतिहास

हमारे  देश भारत में मछुआरों , नाव चलाने वाले लोगों का एक समूह है जिसे हमें मल्लाह(Mallah) नाम से जानते हैं। ये अलग  बात है कि ज्यादातर मल्लाह लोग अपने पुश्तैनी काम को छोड़ चुके हैं। मल्लाह लोग आज हर क्षेत्र जैसे शिक्षा,  राजनीति, व्यवसाय में अपनी मजबूत  उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ये उत्तर भारत, पूर्वी भारत, पूर्वोत्तर भारत और पाकिस्तान में मुख्य रूप से पाए जाते हैं। मछुआरा ( मछली मारने वाले/ fishing) वर्ग से मिलती जुलती कुछ जातियां ( उपजातियां) है जैसे केवट (kewat/ keot ) चांय( Chain/ Chayeen), बिंद (Bind), जलिया कैबर्ता, (Jalia Kaibarta), ढीमर(Dheemar), माझी इत्यादि। मछुआरों कि ये उपजातियां अब  पूरे देश में  अलग-अलग नामों से फैले हुए हैं।
ये सारे उपजातियां कभी एक ही जाति ( Nishad) थे जो  बाद में अलग-अलग कारणों से अलग-अलग नाम के बन गए।  Nishad  शब्द काफी प्राचीन है इसका उल्लेख दुनिया के सबसे पुरानी ग्रंथ त्रगवेद के साथ- साथ  रामायण और महाभारत में हुई है। निषाद प्राचीन काल में जल, जंगल खनिज, के  मालिक थे। इस तरह से हम कह सकते हैं कि  निषाद समाज का इतिहास हजारों-हजार साल पुराना है, क्योंकि त्रगवेद कि रचना लगभग 5000 वर्ष पहले कि गई थी।

मल्लाह शब्द की उत्पति कैसे हुई?

मल्लाह, निषाद शब्द  की  तुलना में काफी आधुनिक शब्द है। यह एक अरबी शब्द मल्लाह (ملاح/mlah) से लिया गया है जिसका अर्थ है “एक पक्षी की तरह अपने पंख को हिलाना” ( boatman) हालांकि  प्रसिद्ध इतिहासकार विलियम क्रुक के अनुसार यह शब्द विशुद्ध रूप से एक व्यावसायिक शब्द है जिसका उपयोग मुख्य रूप से नौका विहार और मछली पकड़ने के जल केंद्रित व्यवसाय से जुड़े बड़े समुदाय के लिए किया जाता था। अरबी भाषा कि उत्पति लगभग 1500- 2000  साल पुराना है तो हम मल्लाह शब्द के उत्पति का यही काल मान सकते हैं। ऐसा संभव है कि अरबी लोगों के दुनिया के दूसरे हिस्से से मेलजोल के कारण हो नाव चलाने वाले लोगों को मल्लाह कहकर बुलाया जाने लगा होगा।

मल्लाह समाज या निषाद समाज

कुछ लोगों का मानना है कि मल्लाह समाज को निषाद समाज  बताना  राजनीतिक रूप से प्रेरित है। जब हम मल्लाहों और ऐसे दूसरे जातियों को निषाद समाज का अंग बताते हैं तो इस इसका महत्व दो तरीके से बढ़ जाता है।
1. निषाद शब्द का जिक्र वेद, महाभारत और रामायण में मिलता है जिससे इनके प्राचीनता का एहसास होता है।
2.हिन्दू धर्म में पूजित भगवान राम से निषादों के निकटता के कारण मल्लाहों का धार्मिक महत्व बढ जाता है।

ज्यादातर मल्लाह हिन्दू  हैं पर मुस्लिम और दूसरे धर्मो को मानने वाले भी अपने आपको निषादवंशी ही बताते हैं।
राजनीतिक द्वेष के कारण कुछ लोगों ने एक खास दल को साजिशकर्ता ठहरा दिया है। उनका कहना है कि  यह दल मल्लाह समाज को निषाद समाज बताकर अपना वोट बैंक  बनाना चाहती है। कुछ लोग मल्लाह को निषाद से ना जोड़कर उन्हे भारत के मूल निवासी बताते हैं और इन्हे ब्राह्मणों (हिन्दूओं ) से प्रताड़ित बताते हैं। ऐसा करके वे मल्लाहों को दलितों सै जोड़कर अपना एक  अलग वोट बैंक बनाना चाहते हैं। देश की वोट बैंक की राजनीति ने पिछड़ी जातियों और दलितों को विकसित होने से रोके रखा।

निषाद जाति का 1892 में लिखे किताब the tribes and castes of Bengal में निषाद जाति का कोई  उल्लेख नही है। Risley, Herbert Hope, Sir, 1851-1911 के द्वारा इस किताब को  1891 में हुए  जातिगत जनगणना के बाद लिखी गई  थी। अभी भी निषाद के जाति के  रूप में  सूचित नही है।

A Mallah

मल्लाह लोगों का शुरुआती जीवनयापन

ऐसा नहीं था की मल्लाह शुरू से ही नाव चलाया करते थे वे लोग नदी के किनारे रहते थे ।  रेत पर उगने वाले फलों और सब्जियों  जैसे तरबुज, ककड़ी, कद्दू इत्यादि की खेती करते थे। इनमें से कुछ लोग मछलियां भी पकड़ते थे और इसलिए इनके पास नाव होता था। वे कभी-कभी कुछ लोगों को नदी भी पार करा दिया करते थे। प्राचीन जमाने में परिवहन साधन के कमी के कारण नाव चलाना उनके लिए काफी फायदे का सौदा बन गया और इस तरह से वे नाविक बन गए।

डोली उठाने  और बुनकरी का काम

नदी के किनारे रहने वाले यह लोग शादियों में डोली उठाने का भी काम करते थे उस समय अक्सर डोली लूट ली जाती थी। डोली उठाने के लिए उन्हें कहा जाता था जो सारे रूप से मजबूत और साहसी होते थे। मल्लाहों इस काम को बखूबी से किया। 1871 के आसपास दूसरे परिवहन के आ जाने से और  नदियों से जुड़े पैसे कमाने के संसाधनो के कमी हो जाने से मल्लाहों ने बुनकरों( Weavers)  का काम भी करना शुरू किया।

मल्लाह जाति के सरनेम

मल्लाह जाति के लोग  अलग -अलग सरनेम  / उपनाम लगाते हैं इनमें प्रमुख  है मल्लाह , केवट राज, निषाद राज, बिंद, धीवर, साहनी, चौधरी, इत्यादी।उत्तर प्रदेश के लोग निषाद उपनाम का उपयोग ज्यादा करते हैं बिहार में साहनी, निषाद दोनों उपनामों का प्रयोग करते हैं, पंजाब चंडीगढ़, हरियाणा, लुधियाना राजस्थान आदि जगहों पर चौधरी उपनामों से रहते हैं।

रामचरण मल्लाह  और उनकी मल्लाहों के उत्थान के लिए  किया गया संघर्ष

अंग्रेजो द्वारा इंडिया को स्वराज्य देने के विषय में यह ख्याल जाहिर किया था कि पिछड़ी हुई कौमों को अलग निर्वाचन का हक दिया जाए। 1920 और 1930 के दशक के दौरान, लखनऊ के मल्लाह जाति के राम चरण वकील औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा तैयार की जा रही संवैधानिक और चुनावी सुधार की योजनाओं में एक स्थान सुरक्षित करने के लिए अपनी जाति के लिए अभियान का नेतृत्व किया था। राम चरण को संयुक्त प्रांत विधान परिषद में दलित वर्ग की आबादी का प्रतिनिधित्व करने के लिए एकमात्र नामांकित व्यक्ति के रूप में नियुक्त किया गया था, और उन्होंने संवैधानिक सुधार में उस समय की सभी जांचों में भाग लिया। हालाँकि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सुधार की कार्यवाही में अग्रणी भूमिका हासिल की, लेकिन वे मल्लाह के लिए कोई मान्यता प्राप्त असफल रहे।

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