Ranjeet Bhartiya 01/11/2021
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Last Updated on 13/01/2022 by Sarvan Kumar

पनिका (Panika) भारत में पाई जाने वाली एक हिंदू जाति है. इन्हें पंक और पनिकर के नाम से भी जाना जाता है.
यह परंपरागत रूप से बुनकर रहे हैं. वर्तमान में यह समुदाय बड़े और मध्यम आकार के जमीनों के मालिक हैं तथा कृषि का कार्य करते हैं. कुछ पनिका अभी भी बुनाई का कार्य करते हैं. यह समुदाय अपनी ईमानदारी, प्रतिबद्धता और बहादुरी के लिए जाना जाता है.पनिका जाति का इतिहास, पनिका शब्द की उत्पति कैसे हुई?

पनिका जाति कहाँ पाए जाते हैं?

यह मुख्य रूप से छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में पाए जाते हैं.
उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से सोनभद्र और मिर्जापुर जिले में पाए जाते हैं. मध्य प्रदेश के मंडला, डिंडोरी, बालाघाट, शहडोल और रीवा जिला में इनकी अच्छी खासी आबादी है. यह हिंदी, छत्तीसगढ़ी और उड़िया भाषा बोलते हैं.

पनिका किस धर्म को मानते हैं?

यह हिंदू धर्म को मानते हैं. पनिका जाति दो व्यापक समूहों में विभाजित है: कबीरपंथी बागत (सबसे बड़ा समूह) और साकट (शाक्त). कबीरपंथी संत कबीर दास के उपदेशों का अनुसरण करते हैं तथा शराब मांस और अन्य चीजों से परहेज करते हैं. जबकि शाक्त प्रकृति से अधिक आदिवासी हैं और मांस-मदिरा का सेवन करते हैं.

पनिका शब्द की  उत्पत्ति कैैैसे हुुई?

परंपराओं के अनुसार, इस जाति का नाम हिंदी के शब्द पंखा पर पड़ा है. ऐतिहासिक रूप से यह समुदाय पंखा बनाने का काम करता था, इसीलिए इसका नाम कालांतर में पंखा से अपभ्रंश होकर पनिका पड़ा.

पनिका किस कैटेगरी में आते हैं?

भारत सरकार के आरक्षण प्रणाली के तहत इन्हें विभिन्न राज्य में अलग-अलग ढंग से वर्गीकृत किया गया है. साल 1949 में भारत सरकार ने इस पूरे समुदाय को अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe) के रूप में सूचीबद्ध किया था. लेकिन 1971 में मध्य प्रदेश सरकार ने उस समय राज्य के छत्तीसगढ़ क्षेत्र में निवास करने वाले पनिका समुदाय को अन्य पिछड़ा (OBC) में शामिल कर दिया. 2001 में स्वतंत्र छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद इन्हें ओबीसी में ही रखा गया. इस समुदाय के लोग फिर से खुद को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग कर रहे हैं. मध्यप्रदेश में इन्हें कुछ जिलों में अनुसूचित जनजाति तो अन्य में ओबीसी के रूप में वर्गीकृत किया गया है. पेचीदा आरक्षण व्यवस्था का असर शादी-विवाह पर भी पड़ा है. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बसे परिवारों के बीच 1971 से निरंतर शादी होती आ रही है. अगर कोई लड़की शादी के बाद छत्तीसगढ़ आती है, तो उसे अपनी आदिवासी साख खोनी पड़ेगी. यदि मध्य प्रदेश का कोई लड़का छत्तीसगढ़ की लड़की से शादी करता है, तो उसे एक आदिवासी की मान्यता मिलेगी.

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