Last Updated on 29/05/2023 by Sarvan Kumar
वर्तमान में बहुविवाह की प्रथा विश्व के अधिकांश भागों में प्रचलित नहीं है. हालांकि यह प्रथा अभी भी दुनिया के कुछ हिस्सों में और कुछ समुदायों में मौजूद है. भारतीय हिन्दू संस्कृति में विवाह को एक संस्कार का दर्जा दिया गया है. शादी सिर्फ एक शारीरिक या सामाजिक अनुबंध नहीं है, बल्कि दो आत्माओं के बीच एक पवित्र बंधन है. एक-विवाह (Monogamy) आधुनिक भारत में विवाह का सबसे प्रचलित रूप है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि प्राचीन भारत में एक विवाह के साथ-साथ बहुविवाह का भी प्रचलन था. इसी क्रम में यहां हम प्राचीन भारत में बहुविवाह के बारे में जानेंगे.
प्राचीन भारत में बहुविवाह
बहुविवाह एक विवाह प्रथा है जिसमें एक पुरुष या महिला एक समय में एक से अधिक व्यक्तियों से विवाह करते हैं. अर्थात्, एक ही समय में एक नहीं बल्कि एक से अधिक विवाहित जीवनसाथी (पत्नी या पति) रखने की प्रथा को बहुविवाह के रूप में जाना जाता है. बहुविवाह के दो रूप हैं – बहुपत्नीत्व और बहुपतित्व. जब कोई पुरुष एक से अधिक स्त्रियों से विवाह करता है तो उसे बहुपत्नीत्व (polygyny) कहते हैं. दूसरी ओर, जब एक महिला एक से अधिक पुरुषों से शादी करती है, तो इसे बहुपतित्व (polyandry) कहा जाता है.
मानव सभ्यता के इतिहास में बहुविवाह की बात करते हुए कई मानवशास्त्रियों का मानना है कि मानव इतिहास में बहुविवाह की प्रथा रही हैं. 2003 में, न्यू साइंटिस्ट पत्रिका ने सुझाव दिया कि 10,000 साल पहले तक अधिकांश बच्चों का जन्म अपेक्षाकृत कम पुरुषों द्वारा होता था. बहुविवाह भारत में अवैध है, लेकिन प्राचीन भारत में इसकी मनाही नहीं थी.
प्राचीन काल में भारत में बहुविवाह प्रथा का प्रचलन था. ऐसा माना जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता में राजा-महाराजाओं की कई पत्नियां होती थीं. प्राचीन काल में मुख्य रूप से सम्राटों, अभिजात वर्ग और शाही परिवारों में बहुविवाह की प्रथा आम थीं. इतना ही नहीं 11वीं से 14वीं शताब्दी तक राजपूत काल में भी बहुविवाह की प्रथा थी. यह प्रथा मुगल काल में भी जारी रही.
प्राचीन भारतीय समाज में बहुपतित्व के कुछ उदाहरण मिलते हैं, लेकिन बहुपत्नी विवाह का प्रचलन अधिक था. हिंदू बहुविवाह का सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण कुलीन बहुविवाह (हाइपरगैमी) है. हाइपरगैमी एक श्रेष्ठ सामाजिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति से शादी करने को संदर्भित करता है. प्राचीन भारत में कुलीनता को बहुत महत्व दिया जाता था. सभी चाहते थे कि उनकी बेटियों की शादी संभ्रांत वरों से हो, लेकिन संभ्रांत वरों की संख्या उतनी नहीं थी. इसलिए एक ही कुलीन व्यक्ति से कई लड़कियों की शादी कर दी जाती थीं.
