Last Updated on 26/12/2021 by Sarvan Kumar
राठवा (Rathwa, Rathawa or Rathava) भारत में पाया जाने वाला एक आदिवासी जनजाति समुदाय है. इन्हें रहवा (Rahava) और राठिया (Rathia or Rathiya) के नाम से भी जाना जाता है. यह ऐतिहासिक रूप से खड़ी, घने जंगलों, अपेक्षाकृत दुर्गम इलाकों में विशिष्ट समुदायों के रूप में रहा करते थे. यह सादा जीवन जीते हैं और स्वभाव से बहुत धार्मिक होते हैं. राठवा जनजाति के लोग पिथोरा चित्रकला का चित्रण और विकास में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए जाने जाते हैं. भारत सरकार के सकारात्मक भेदभाव की व्यवस्था आरक्षण के अंतर्गत गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में इन्हें अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribe, ST) के रूप में वर्गीकृत किया गया हैै. यह अपने पारंपरिक आदिवासी धर्म और हिंदू धर्म को मानते हैं. यह अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं. यह बाबा पिथौरा या बाबा देब को सर्वव्यापी मानते हैं. यह बाबा पिथौरा को अपने घरों की दीवारों और धार्मिक चित्रों में तथा अन्य दृश्यों के साथ चित्रित करते हैं. यह राठवी, गुजराती और हिंदी बोलते हैं. आइए जानते हैं राठवा जनजाति का इतिहास, राठवा की उत्पति कैसे हुई?
राठवा जनजाति कहां पाए जाते हैं?
यह मुख्य रूप से गुजरात में पाए जाते हैं. गुजरात सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, यह वर्तमान में वडोदरा जिले के छोटा उदयपुर, जबुगाम और नसवाड़ी के तालुकों तथा पंचमहल जिले के बरिया, हलोल और कलोल तालुकों में निवास करते हैं. गुजरात के अलावा, यह मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी पाए जाते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, गुजरात में भारत में इन की कुल आबादी 6,42,881 दर्ज की गई थी. इस जनगणना में गुजरात में इनकी आबादी 642,348 थी, जबकि महाराष्ट्र और कर्नाटक में इनकी जनसंख्या क्रमश: 488 और 45 दर्ज की गई थी.
राठवा जनजाति की उत्पत्ति कैसे हुई?
राठवा शब्द की उत्पत्ति रथबिस्तर शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है- जंगल या पहाड़ी इलाके का निवासी. इनकी उत्पत्ति के बारे में कई बातें कही जाती है. लेकिन आधुनिक, व्यवस्थित, मानवशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय या ऐतिहासिक अध्ययन के अभाव में भ्रम की स्थिति बनी हुई है. इनकी भौगोलिक उत्पत्ति के बारे में मान्यता है कि यह मध्य युग में मध्य भारत, जिसे वर्तमान में मध्य प्रदेश के नाम से जाना जाता है, से गुजरात में आए थे. कभी-कभी इन्हें राठवा कोली के रूप में संदर्भित किया जाता है, तथा यह खुद भी पहचान के रूप में अपने आप को राठवा कोली बताते हैं. हालांकि, कोली समुदाय के लोग सामाजिक स्थिति में इन्हें अपने से कमतर मानते हैं. कुछ अन्य स्रोतों के अनुसार, यह वास्तव में भील समुदाय के लोगों के वंशज हैं. पुरातत्वविद् और लेखिका शिरीन एफ रत्नागर (Shereen F. Ratnagar) ने उल्लेख किया है कि अपने अपने मानवशास्त्रीय अध्ययनों के दौरान उन्होंने राठवा समुदाय के लोगों से बात किया था. इस बातचीत में राठवा समुदाय के लोगों ने कोली और भील जाति से संबंध को खारिज कर दिया था. उनका कहना था कि कोली और भील जैसे लेबल ऐतिहासिक रूप से बाहरी प्रशासनिक लोगों द्वारा समुदायों पर थोपे गए थे. दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अरविंद शाह के मुताबिक, भील और कोली ऐतिहासिक रूप से गुजरात की पहाड़ियों में सह-अस्तित्व में थे. इसीलिए व्यापक अध्ययन के अभाव में राठवा समुदाय की उत्पत्ति के बारे में भ्रम की स्थिति है.
