Sarvan Kumar 04/11/2020
नहीं रहे सबके प्यारे ‘गजोधर भैया’। राजू श्रीवास्तव ने 58 की उम्र में ली अंतिम सांस। राजू श्रीवास्तव को दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से वो 41 दिनों से दिल्ली के एम्स में भर्ती थे। उनकी आत्मा को शांति मिले, मुझे विश्वास है कि भगवान ने उसे इस धरती पर रहते हुए जो भी अच्छा काम किया है, उसके लिए खुले हाथों से स्वीकार करेंगे #RajuSrivastav #IndianComedian #Delhi #AIMS Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 05/11/2020 by Sarvan Kumar

रावण पिछले जन्म में कौन था: सत्यकेतु कैकय देश का राजा था। वह धर्म की धूरी को धारण करने वाला, नीति की खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान था। उसके दो वीर पुत्र हुए जो सब गुणों के भंडार और बड़े ही रणधीर थे। राज्य का उत्तराधिकारी जो बड़ा लड़का था, उसका नाम प्रतापभानु था। दूसरे पुत्र का नाम अरिमर्दन था, जिसकी भुजाओं में अपार बल था और युद्ध में पर्वत के समान अटल रहता था। ब्राह्मणों के शाप के कारण प्रतापभानु और अरिमर्दन अगले जन्म में पुलस्तय  ऋषि के पवित्र कुल में उत्पन्न होकर भी पापरूूूप हुए। भानुप्रताप का जन्म रावण के रूप में और अरिमर्दन का जन्म कुंभकरण के रूप में हुआ। प्रतापभानु का, हित करने वाला और शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान धर्मरूचि नाम का मंत्री था। धर्मरूचि ही अगले जन्म में विभीषण के रूप में जन्म लिया। धर्मरूचि मंत्री का श्रीहरि के चरणों में प्रेम था। वह राजा के हित के लिए सदा उसको नीति सिखाया करता था। आईये जानते हैं किस तरह प्रतापभानु शाप के कारण अगले जन्म में एक राक्षस(रावण) बने।

रावण पिछले जन्म में कौन था

अपनी भुजाओं के बल से राजा प्रतापभानु ने सात द्वीपों को वश में कर लिया और राजाओं से कर ले- ले कर उन्हें छोड़ दिया। संपूर्ण पृथ्वी मंडल का उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र राजा था। एक बार राजा प्रतापभानु एक अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर, विंध्याचल के घने जंगल में गया और वहां उसने बहुत से उत्तम -उत्तम हिरन मारे।

राजा वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। नील पर्वत के शिखर के सामान विशाल शरीर वाले उस सूअर को देखकर राजा घोड़े को चाबुक लगा कर तेजी से चला और उसने सूअर को ललकारा कि ‘अब तेरा बचाव नहीं हो सकता।’ राजा तक -तक कर तीर चलाता है परंतु सूअर छल करके शरीर को बचाता जाता है। भागते- भागते सूअर बहुत दूर ऐसे घने जंगल में चला गया जहां हाथी घोड़े का निबाह नहीं था। राजा बिल्कुल अकेला था और वन में क्लेश भी बहुत था, फिर भी राजा ने उस पशु का पीछा नहीं छोड़ा। राजा को बड़ा धैर्यवान देखकर सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में जा घुसा। उसमें जाना कठिन देखकर राजा को बहुत पछताकर लौटना पड़ा; पर उस घोर वन में वह रास्ता भूल गया।

बहुत परिश्रम करने से थका हुआ और घोड़े समेत भूख प्यास से व्याकुल राजा नदी- तालाब खोजता -खोजता पानी बिना बेहाल हो गया। वन में फिरते- फिरते उसने एक आश्रम देखा। वहां कपट से मुनि का वेश बनाए एक राजा रहता था, जिसका देश प्रतापभानु ने छीन लिया था और वह  सेना को छोड़कर युद्ध से भाग गया था। दरिद्र की भांति मन ही में क्रोध को मारकर वह राजा तपस्वी के वेश में वन में रहता था ।

प्रतापभानु उसके समीप गया उसे महामुनि समझ कर, घोड़े से उतर कर प्रणाम किया और पानी मांगा। राजा को प्यासा देखकर उसने एक सरोवर दिखला दिया। हर्षित होकर राजा ने घोड़े समेत उसमें स्नान और जलपान किया।

मुनि ने राजा से उसका पहचान पूछा; राजा ने झूठ कह दिया कि वह  प्रतापभानु नाम के राजा का  मंत्री है, पर मुुुनि ने देखते ही उसे पहचान लिया था। मुनि ने कहा घोर अंधेरी रात है, घना जंगल है रास्ता नहीं है तुम आज यहीं ठहर जाओ सवेरा होते ही चले जाना।

मुनि ने बातों -बातों में राजा को प्रभावित कर लिया। राजा उस तपस्वी के वश में आ गया और अपना असली नाम बताना चाहा। उस कपटी मुनि ने राजा के बोलने से पहले ही बोल दिया कि तुम प्रतापभानु के मंत्री नहीं खुद  प्रतापभानु हो। अब तो राजा को विश्वास हो गया कि यह कोई साधारण मुनि नहीं है।

महामुनि समझकर राजा उस तपस्वी के चरणों में गिर पड़ा। उसने मुनि से कहा हे महाात्मा, मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुख से रहित हो जाए, मुझे युद्ध में कोई जीत ना सके और पृथ्वी पर मेरा  एकछत्र राज्य हो, ऐसा कोई उपाय बताइए।

मुनि बने राजा के पास बस यही मौका था प्रतापभानु को अपने जाल में फंसाने और अपने हार का बदला लेने का। उसने कहा हे राजन् केवल ब्राह्मण कुल को छोड़कर काल भी तुम्हारे चरणोंमें सिर झुकाएगा, बस तुमको एक काम करना होगा।

वह कुटिल कपटी मुनि ने कहा ‘मैं यदि रसोई बनाऊं और तुम उसे परोसो तो जो उसको खाएगा वह  तुम्हारे अधीन हो जाएगा। तुम नित नए एक लाख ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमंत्रित करना मैं तुम्हारे संकल्प तक प्रतिदिन भोजन बना दिया करूंगा।

मुनि ने कहा कि मैं तुम्हारे यहां तुम्हारे पुरोहित का रूप धर कर आऊंगा। मैं तुम्हारे पुरोहित को हरण कर अपने आश्रम में रख दूंगा। प्रतापभानु उस कपटी मुनि के बातों में आ गया।

[सूअर था कालकेतु राक्षस: जिस सूअर के पीछे -पीछे प्रतापभानु वन में भटक गया था वह कोई और नहीं कालकेतु राक्षस था। उसके 100 पुत्र और 10 भाई थे जो बड़े ही दुष्ट, किसी से ना जीते जाने वाले और देवताओं को दुख देने वाले थे। प्रतापभानु ने उन सबको पहले ही युद्ध में मार डाला था। इस वजह से वह प्रतापभानु  से वैर रखता था और वह भी बदला लेना चाहता था।]

जब प्रतापभानु सो गया तो कालकेतु अपने दोस्त मुनि से मिलने  आया। मुनि ने सारा वृतांत कालकेतु को बता दिया ,फिर उन दोनों ने प्रतापभानु को सबक सिखाने की  एक योजना बनाई। योजना यह थी की कालकेतु अपने माया से प्रतापभानु को घोड़े सहित उसके महल में पहुंचा देगा और फिर पुरोहित का वेश धरकर रसोईया बन जाएगा।

कालकेतु ने ऐसा ही किया अपने माया बल से उसने प्रतापभानु को घोड़े सहित महल में पहुंचा दिया और पुरोहित को हरण करके ले आया। कालकेतु खुद पुरोहित का वेश धरकर रसोइए का काम करने के लिए पहुंच गया।

पुरोहित बने कालकेतू ने कई प्रकार के भोजन बनाए। उसने भोजन में अनेक प्रकार के पशुओं का मांस पकाया और उस दुष्ट ने उसमें  ब्राह्मणों का मांस मिला दिया।

सब ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलाया गया। ज्यों ही राजा परोसने लगा उसी समय आकाशवाणी हुई ‘हे ब्राह्मणों उठ कर अपने घर जाओ यह अन्न मत खाओ इसमें ब्राह्मणों का मांस मिला है’

ब्राह्मण सुनकर चकित रह गए वे क्रोध से भर गए उन्होंने राजा को शाप दे दिया ‘अरे मूर्ख राजा तू  परिवार सहित राक्षस हो’ हे क्षत्रिय तुमने तो परिवार सहित ब्राह्मणों को बुलाकर उसे नष्ट करना चाहा अब तू परिवार सहित नष्ट होगा एक वर्ष के भीतर तेरा नाश हो जाए। तेरे कुल में कोई पानी देने वाला तक ना रहेगा’।

शाप सुनकर राजा भय के मारे व्याकुल हो गया। फिर दूसरी आकाशवाणी हुई ‘हे ब्राह्मणों तुमने विचार कर शाप नहीं दिया, राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया’ आकाशवाणी सुनकर सब ब्राह्मण चकित हो गए। तब राजा वहां गया जहां भोजन बना था। वहां देखा तो वहां ना भोजन था ना रसोईया ब्राह्मण ही था। तब राजा मन में अपार चिंता करता हुआ लौटा उसने ब्राह्मणों का सब वृतांत सुनाया। ब्राह्मणों ने सारी बात सुनकर कहा यद्यपि तुम्हारा दोष नहीं है तो भी होनी को कौन टाल सकता है?  ब्राह्मणों का शाप भयानक होता है, वह किसी भी तरह टल नहीं सकता।

उधर कपटी तपस्वी ने कालकेतु से जब यह सारी बात सुनी तो उसने प्रतापभानु के राज्य पर हमला कर दिया जिसमें प्रतापभानु समेत सारे वधूबांधव मारे गए। सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचा। समय पाकर वही राजा परिवार सहित रावण नाम का राक्षस हुआ उसके दस सिर और बीस भुजाएं थी और वह बड़ा ही प्रचंड शूरवीर था। अरिमर्दन नाम का जो राजा का छोटा भाई था वह कुंभकरण हुआ। धर्मरूचि विभीषण के रूप में जन्म लिया जोकि विष्णु भक्त और ज्ञान विज्ञान का भंडार था। राजा के पुत्र और सेवक बड़े भयानक राक्षस के रूप में जन्म लिए।

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