Sarvan Kumar 13/05/2022
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Last Updated on 13/05/2022 by Sarvan Kumar

मध्यावधि चुनाव (Mid-term Election) एक चुनाव है जो तब आयोजित किया जाता है जब विधानसभा या लोकसभा अपने सामान्य 5 साल के कार्यकाल पूरा करने से पहले भंग कर दी जाती है. आपके मन में जिज्ञासा होगी कि भारत में लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव कब हुआ था. तो आइए जानते हैं कि भारत में लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव कब और किस परिस्थिति में हुआ था.

लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव

1951 के बाद से जब भारत ने अपनी पहली सरकार चुनने के लिए मतदान किया, हर पांच साल के बाद चुनाव हुए. लेकिन 1971 में पहली बार लोकसभा को तय समय से एक साल पहले भंग कर दिया गया और मध्यावधि चुनाव का आह्वान किया गया. इंदिरा गांधी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आईं और लगातार पांचवीं बार कांग्रेस की सरकार बनी. हालाँकि, कांग्रेस 1967 के चुनावों से पहले जैसी थी, वैसी नहीं रही और पार्टी में विभाजन हो गया. भारत में लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव 1971 में हुआ था. 1967 में चौथी लोकसभा के लिए आम चुनाव कराए गए. इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress, INC) को 78 सीटों का नुकसान हुआ और पार्टी केवल 283 सीटें हीं जीत पाई. पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के बावजूद इंदिरा गांधी का दबंग रवैया जारी रहा. वह और भी मुखर हो गई और उन्होंने मनमाने ढंग से कई फैसले लिए. इंदिरा गांधी के मनमानी से तंग आकर कांग्रेस हाईकमान उनके खिलाफ हो गया. कांग्रेस आलाकमान ने 12 नवंबर, 1969 को “अनुशासनहीनता” के लिए इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासित कर दिया. इस ऐतिहासिक कार्रवाई ने कांग्रेस को दो गुटों में विभाजित कर दिया- कांग्रेस (ओ) जिसका नेतृत्व मोरारजी देसाई कर रहे थे; और कांग्रेस (आई) जिसकी कमान इंदिरा गांधी के पास थी. इंदिरा ने दिसंबर 1970 तक कुछ छोटे-मोटे दलों के समर्थन से अल्पमत सरकार का नेतृत्व करना जारी रखा. लेकिन इंदिरा ज्यादा दिनों तक अल्पमत सरकार का नेतृत्व नहीं करना चाहती थीं. इसीलिए उन्होंने निर्धारित समय से पूरे एक साल पहले, मार्च 1971 में लोकसभा के लिए मध्यावधि चुनाव का आह्वान कर दिया. पांचवी लोकसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को जबरदस्त फायदा हुआ और पार्टी ने पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की.

भारत में लोकसभा का पहला मध्यावधि चुनाव किस परिस्थिति में हुआ था?

पहला मध्यावधि चुनाव किन परिस्थितियों में हुआ, इस बात को समझने के लिए उस वक्त के राजनीतिक स्थिति और पूरे घटनाक्रम को समझना आवश्यक है. तो आइए जानते हैं- 1967 के चुनाव के बाद, 1966 में इंदिरा गांधी के प्रधान मंत्री के रूप में पदोन्नत होने के कारण कांग्रेस में दरार पैदा हो गई जो समय के साथ बड़ी और गहरी होती चली गई. पार्टी विभाजन के कगार पर खड़ी थी. लेकिन अंतिम झटका 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात लगा. Indian National Congress (Organisation), जिसे अक्सर सिंडिकेट के रूप में जाना जाता था, ने 11 से 13 जुलाई 1969 तक हुए कांग्रेस के सम्मेलन में पार्टी नए राष्ट्रपति पद के के उम्मीदवार के रूप में नीलम संजीव रेड्डी को नामित किया. सिंडिकेट से मतभेदों के चलते इंदिरा चाहती थीं कि उन्हें शीर्ष पद पर एक ऐसा व्यक्ति मिले जिस पर उन्हें भरोसा हो, लेकिन पार्टी द्वारा मनोनीत उम्मीदवार का खुलकर विरोध करना नहीं जानती थीं. समझौता करना इंदिरा गांधी के स्वभाव के खिलाफ था. अब लड़ाई वर्चस्व की थी. इंदिरा समझ गई कि कुछ निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है. वह एक के बाद एक फैसले लेने लगी. 18 जुलाई की बैठक के तुरंत बाद उन्होंने मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री के पद से हटा दिया और खुद पद संभाल लिया. 21 जुलाई को, उन्होंने राष्ट्रपति के अध्यादेश के माध्यम से चौदह प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने का ऐलान कर दिया. उन्होंने राजकुमारों (Princes) के विशेष विशेषाधिकार वापस लेने की अपनी योजना की भी घोषणा की. इंदिरा के इन फैसलों से सिंडिकेट नाराज हो गया. इन फैसलों के सख्त खिलाफ, सिंडिकेट किसी तरह से अपनी पसंद का राष्ट्रपति चाहता था ताकि इन आदेशों को रद्द कर दिया जा सके. सिंडिकेट ने प्रतिद्वंद्वी पार्टियों से संपर्क किया और अपने उम्मीदवार के दौड़ से बाहर होने के बाद नीलम संजीव रेड्डी के पक्ष में अपनी दूसरी-वरीयता के वोट डालने के लिए आग्रह किया. इंदिरा को सिंडिकेट के एक गलत कदम का इंतजार था. इंदिरा ने इस मौके का फायदा उठाया. सिंडिकेट पर गुप्त सौदेबाजी का आरोप लगाते हुए उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में खुले तौर पर उपाध्यक्ष वीवी गिरी का समर्थन किया, जो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में खड़े थे. राष्ट्रपति चुनाव के लिए, उन्होंने कोई पार्टी व्हिप जारी नहीं किया और कांग्रेस नेताओं को अपने ‘विवेक’ के अनुसार स्वतंत्र रूप से मतदान करने के लिए कहा. नतीजतन, कई कांग्रेस नेताओं के समर्थन से वीवी गिरी राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए. इंदिरा के इस कदम से नाराज सिंडिकेट ने “अनुशासनहीनता” के लिए उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया. इसके बाद कांग्रेस का विभाजन हो गया. अपने सहयोगियों के समर्थन से इंदिरा गांधी ने अपनी खुद की पार्टी शुरू की. नाम रखा- कांग्रेस (आर), जो बाद में कांग्रेस (I) में परिवर्तित हो गई. 220 लोकसभा सांसदों ने उनका साथ दिया. जबकि 68 लोकसभा सांसद दूसरी तरफ चले गए. इस घटनाक्रम के बाद, सरकार के पास अब सदन में बहुमत नहीं था. पूरे एक साल के लिए, इंदिरा गांधी को प्रमुख कानून पारित करने के लिए समाजवादियों, डीएमके, अकाली दल और कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों पर निर्भर होना पड़ा. इंदिरा गांधी दबाव में झुककर काम नहीं करना चाहती थी. इसीलिए उन्होंने 27 दिसंबर 1970 को लोकसभा को भंग कर दिया और फरवरी 1971 में मध्यावधि चुनाव का आह्वान किया, जो निर्धारित समय से एक साल पहले था क्योंकि सदन 15 मार्च 1972 को समाप्त होना था. इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आर) ने 518 लोकसभा सीटों में से 352 सीटों पर जीत हासिल करते हुए जोरदार वापसी की.

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