Sarvan Kumar 21/09/2020
माता रानी ये वरदान देना,बस थोड़ा सा प्यार देना,आपकी चरणों में बीते जीवन सारा ऐसा आशीर्वाद देना। आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं। नव दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री देवी का है। ये माता पार्वती का ही एक रूप हैं हिमालयराज की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री भी कहा जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मां के शैलपुत्री रूप का पूजन होता है. Jankaritoday.com अब Google News पर। अपनेे जाति के ताजा अपडेट के लिए Subscribe करेेेेेेेेेेेें।
 

Last Updated on 21/09/2020 by Sarvan Kumar

विदुर नीति

विदुर महाभारत काल में हस्तिनापुर के महामंत्री थे। वे महाबुद्धिमान  और नीति कुशल थे।  निम्नलिखित प्रसंग महाभारत के उद्योग पर्व के 8 अध्याय 33वेंं  – 40वें  तक  की है। इसमें महामना विदुुर जी ने राजा धृतराष्ट्र को लोक -परलोक में  कल्याण करने वाली बहुत सी बातें समझायी है।  ये विदुर नीति आपकी आंखे खोल देगी। जानिए असली पण्डित कौन है और मूर्ख कौन है

विदुर नीति: असली पण्डित कौन है?

।.अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग, दुख सहने की शक्ति और धर्म में स्थिरता – ये गुण जिस मनुष्य को पुरुषार्थ से च्युत नहीं करते वही पण्डित कहलाता है।

2.जो अच्छे कर्मों का सेवन करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होने के लक्षण है।

3. क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दंडता तथा अपने को पूज्य समझना – यह भाव जिसको पुरुषार्थ से भ्रष्ट नहीं करते वह पण्डित कहलाता है।

4. दूसरे लोग जिस के कर्तव्य, सलाह और पहले से किए हुए  विचार को नहीं जानते, बल्कि काम पूरा होने पर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है।

5.सर्दी- गर्मी, भय , अनुराग संपत्ति अथवा दरिद्रता – ये जिसके कार्य  में विघ्न नहीं डालते वही पण्डित कहलाता है।

6. जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थ का ही अनुसरण करती है और जो भोग को छोड़कर पुरुषार्थ का ही वरण करता है, वही पण्डित कहलाता है।

7. विद्वान पुरुष किसी विषय को देर तक सुनता है; किंतु शीघ्र ही समझ लेता है, समझ कर कर्तव्य बुद्धि से पुरुषार्थ में प्रवृत होता है -कामना से नहीं- बिना पूछे दूसरे के विषय में कोई बात नहीं कहता है। उसका यह स्वभाव पण्डित की मुख्य पहचान है।

8. पंडितों की सी बुद्धि रखने वाले दुर्लभ वस्तु की कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तु के विषय में शोक नहीं करना चाहते और विपत्ति में पड़कर घबराते नहीं है।

9 .जो पहले निश्चय करके फिर कार्य का आरंभ करता है, कार्य के बीच में नहीं रुकता , समय को व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्त को वश में रखता है, वही पण्डित कहलाता है।

10. जो अपना आदर होने पर हर्ष के मारे फुले नहीं उठता, अनादर से संतप्त नहीं होता तथा गंगा जी के कुंड के समान जिसके चित्त को क्षोभ नहीं होता, वह पण्डित कहलाता है।

11.जो संपूर्ण भौतिक पदार्थों की असलियत का ज्ञान रखनेवाला, सब कार्यों के करने का ढंग जाननेवाला तथा मनुष्यों में सबसे बढ़कर उपाय का जानकार है वही पण्डित कहलाता है।

12. जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं, जो विचित्र ढंग से बातचीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रंथ के तात्पर्य शीघ्र बता सकता है!,वही पंडित कहलाता है।

13.जिसकी विद्या बुद्धि का अनुसरण करती है और बुद्धि विद्या का, जो शिष्ट पुरुषों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता वही पंडित की पदवी पा सकता है।

14. जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी इठलाता नहीं वही पंडित कहलाता है।

विदुर नीति: मूर्ख कौन है?

1 बिना पढे ही गर्व करने वाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनसूबे बांधने वाले और बिना काम किए ही धन पाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को पण्डित लोग मूर्ख कहते हैं।

2. जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरे के कर्तव्य का पालन करता है, तथा मित्र के साथ असत् आचरण करता है वह मूर्ख कहलाता है।

3. जो ना चाहने वालों को चाहता है और चाहने वालों को त्याग देता है तथा जो अपने से बलवान के साथ बैर बांधता है उसे मूढ विचार का मनुष्य कहते हैं।

3.जो शत्रु को मित्र बनाता और मित्र से द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुंचाता है तथा सदा बुरे कर्मों का आरंभ किया करता है, उसे मूढ चितवाला कहते हैं।

4. जो अपने कामों को व्यर्थ ही फैलाता है जो सर्वत्र संदेह करता है, तथा शीघ्र होने वाले काम में भी देर लगाता है, वह मूढ है।

5. जो पितरों को श्राद्ध और देवताओं का पूजन नहीं करता तो था जिसे सुहृद् मित्र नहीं मिलता, उसे ‘मूढ चित्तवाला’ कहते हैं।.

6.मूढ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाए ही भीतर चला आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मनुष्यों पर भी विश्वास करता है।

7.स्वंय दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरे पर जो दूसरे पर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थ का क्रोध करता है वह मनुष्य महामूर्ख है।

8. जो अपने बल को ना समझ कर बिना काम किए ही धर्म और अर्थ से विरुद्ध तथा न पाने वस्तु की इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसार में ‘मूढबुद्धि’ कहलाता है।

9. जो अनधिकारी को उपदेश देता और शून्य की उपासना करता है, तथा जो कृपण का आश्रय लेता है उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं।

 

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